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वेस्ट मैनेजमेंटः बंगलुरू से क्या सीख सकते हैं तेजी से बढ़ते छोटे शहर

स्कंद विवेक धर | Updated on: 22 February 2017, 7:42 IST
कैच न्यूज़
QUICK PILL
  • बंगलुरू में वेस्ट मैनेजमेंट को शोधित करने का फॉर्म्यूला अब कारगर होता दिखाई दे रहा है.
  • यहां कूड़े को निकालने से पहले उसे गीला, सूखा और सेनेटरी के आधार पर अलग-अलग करना अनिवार्य है.
  • बड़ी सोसायटी और कमर्शियल कॉम्पलेक्स को अपने कूड़े को खुद करना पड़ता है मैनेज, कम्पोस्ट यूनिट भी जरूरी है.

ऐसे समय में जब हम एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के रिकॉर्ड पर गर्व कर रहे हैं, हमें इस बात पर शर्मिंदा होना चाहिए कि आज भी हमारे शहर अपने कूड़े-कचरे को संभाल नहीं पा रहे. भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, हमारे शहरों से रोजाना 1 लाख 57 हजार 479 टन कचरा निकलता है, जिसमें से महज 21.51 फीसदी कचरा ही शोधित किया जाता है. बाकि तकरीबन 1.23 लाख टन कचरा शहरों के बाहर बने लैंडफिल साइट्स में डाल दिया जाता है.

तेजी से बढ़ रहे हमारे शहर कुछ ही वर्षों में एक लैंडफिल साइट को पाट देते हैं और अगले कुछ वर्षों में वहां कूड़े का पहाड़ खड़ा हो जाता है. इसके बाद एक नए लैंडफिल साइट की तलाश शुरू हो जाती है. ज्यादातर महानगरों के बाहर आज कूड़े के जो पहाड़ नजर आते हैं, वो हमारे इस कचरे के मिसमैनेजमेंट का नतीजा हैं.

बंगलुरू में कारगर प्रयोग

चीन की सिचुआन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर बेंगलुरु की वेस्ट मैनजमेंट पॉलिसी पर रिसर्च कर चुकीं अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरमेंट (एट्री) की एडजंक्ट फेलो मेघा शिनॉय कहती हैं, 'बढ़ते शहरों के सामने वेस्ट मैनेजमेंट एक बड़ी चुनौती है. इन शहरों को देश की आईटी राजधानी बंगलुरू से सबक लेना चाहिए. बेंगलुरु ने वेस्ट मैनेजमेंट में कई ऐसे कदम उठाए हैं, जो दूसरे शहरों में भी कारगर साबित हो सकते हैं.'

बेंगलुरु देश के उन चुनिंदा शहरों में से एक है जहां वेस्ट सेग्रीगेशन (कूड़े को बाहर निकालने से पहले उसे उसके प्रकार गीला, सूखा और सेनेटरी के आधार पर अलग-अलग करना) अनिवार्य कर दिया गया है. गीले कचरे को कंपोस्ट कर खाद बनाया जा सकता है, सेनेटरी कूड़े को इंन्सीनरेटर से जला दिया जाता है. ऐसे में सिर्फ सूखा कूड़ा बच जाता है, जिसमें से कई चीजें दोबारा इस्तेमाल कर ली जाती हैं और अंत में बचे हिस्से को ही लैंडफिल साइट पर भेजा जाता है. ऐसे में कूड़ा न टॉक्सिक होता है और न इसे ज्यादा जगह की जरूरत होती है.

छोटे प्लांट्स लगाएं

बृहत बेंगलुरू महानगर पालिके (बीबीएमपी) ने दूसरा बड़ा निर्णय जो लिया है, वह है वेस्ट मैनेजमेंट के विकेंद्रीकरण करने का. बीबीएमपी ने प्रति दिन 10 किलोग्राम से अधिक कूड़ा पैदा करने वाले कमर्शियल स्पॉट्स जैसे मॉल, रेस्तरां, होटल और 50 यूनिट से अधिक वाले रेसिडेंशियल अपार्टमेंट के लिए उनके कूड़े का मैनेजमेंट खुद करने को अनिवार्य कर दिया है. इसमें भी गीले कूड़े को परिसर में ही कम्पोस्ट करने के लिए प्लांट लगाना भी शामिल है. हालांकि, उनकी मदद के लिए कई वेंडर्स को इम्पैनल भी किया गया है, जिन्हें शुल्क चुकाकर सेवाएं ली जा सकती हैं.

मेघा कहती हैं, 'जब बीबीएमपी के कांट्रैक्टर को ही पूरे शहर से कचरा जमा करना होता था, तब उनका फोकस सिर्फ हाउसिंग सोसायटीज पर रहता था. दरअसल, हाउसिंग सोसायटीज से कचरा कम समय में और आसानी से इकट्ठा हो जाता था. इस काम के लिए कांट्रैक्टर को इन सोसायटी से पैसे भी मिल जाते थे. इसके बाद इन ठेकेदारों के पास सिर्फ इंडीवुजुअल हाउसहोल्ड से ही कूड़ा जमा करने का काम रह गया है. ऐसे में बीबीएमपी का कम कूड़े का ही प्रबंधन संभालना होता है, जो आसानी से किया जा सकता है.

लंबे संघर्ष का नतीजा

बंगलुरू में बेहतर वेस्ट मैनेजमेंट कोई बीबीएमपी की दूरदृष्टि का नतीजा नहीं है. दरअसल, इसके लिए वर्ष 2012 में क्रमवार हुईं कुछ घटनाएं जिम्मेदार हैं. पहली, मवल्लीपुरा में कूड़े की ढेर की वजह से होने वाली बीमारियों के विरोध में वहां के निवासियों का विरोध-प्रदर्शन. दूसरी, बीबीएमपी के सफाई कर्मचारियों का भुगतान न मिलने की वजह से हड़ताल पर जाना, जिसकी वजह से शहर में जगह-जगह कूड़ों के ढेर लग गए और तीसरी घटना वेस्ट मैनेजमेंट पॉलिसी में बदलाव के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर होना रही.

इसी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान 31 जुलाई 2012 से लेकर 23 जून 2016 तक हाई कोर्ट ने कुल 45 आदेश दिए. कोर्ट के ये आदेश ही बीबीएमपी के नए नियम बने और कर्नाटक म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट को भी इन आदेशों के मुताबिक संशोधित कर दिया गया.

बेंगलुरु की वेस्ट मैनजमेंट पॉलिसी पर हुई रिसर्च की एक अन्य सदस्य पूर्णिमा वासदानी के मुताबिक, यह पूरी तरह बेंगलुरु के नागरिकों के मूवमेंट था. इसमें नागरिकों ने ही आगे रह कर दूसरों को जागरूक किया और अधिकारियों को कदम उठाने पर मजबूर किया. ये नागरिकों का ही दबाव था, जिसने शहर में मजबूत जड़ें जमा चुके कलेक्शन एंड ट्रांसपोरेटेशन माफिया को जड़ से उखाड़ दिया.

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि बेंगलुरु ने शहरों से निकलने वाले कचरे का पूरा समाधान कर लिया है. अब भी कई हाउसिंग सोसायटीज अपना कचरा बिना सेगरिगेट किए बीबीएमपी ठेकेदारों को दे देती हैं, तो कई सोसायटीज कम्पोस्टिंग यूनिट लगाने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करती हैं. इसके अलग-अलग कारण हैं. फिर भी वेस्ट मैनेजमेंट में भारत की यह आईटी राजधानी मुंबई या दिल्ली जैसे मेगा शहरों से भी काफी आगे है.

जयपुर, इंदौर और भोपाल जैसे तेजी से बढ़ते शहर कूड़े के निपटारे के लिए बेंगलुरु के अनुभवों से अपना वेस्ट मैनेजमेंट बेहतर बना सकते हैं. अगर ये शहर अभी नहीं सीखे तो कल को बेंगलुरु की तरह उनके नागरिक भी सड़कों पर उतर आएंगे.

First published: 22 February 2017, 7:42 IST
 
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