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सरकार में संघ काडरों की भर्ती, खट्टर पर भड़के विधायक

राजीव खन्ना | Updated on: 7 March 2017, 1:05 IST

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए उनकी अपनी ही पार्टी के विधायक मुश्किल खड़ी कर सकते हैं. 2014 में राज्य सरकार के गठन के साथ ही पार्टी में असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे थे और अब करीब एक दर्जन से अधिक विधायक और सांसद कथित तौर पर सरकार के रवैये को लेकर नाराजगी जता रहे हैं. खट्टर इन असंतुष्ट विधायकों को अमित शाह की ओर से संतुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि इस असंतोष को यहीं दबाया जा सके. पार्टी 11 मार्च को पांच राज्यों में हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद इस मुद्दे का हल करेगी.

चालू बजट सत्र शुरू होने से पहले ही विधायकों ने मुद्दा उठाया था कि सरकार उनकी उपेक्षा कर रही है. उनका आरोप है कि राज्य को राजनीति नहीं बल्कि नौकरशाही चला रही है. आंदोलनकारी नेताओं का कहना है कि राज्य को जो लोग चला रहे हैं, वे निर्वाचित जन प्रतिनिधि नहीं हैं. खट्टर ने कई महत्वपूर्ण पदों पर बाहरी लोगों की नियुक्ति कर दी. उसी के बाद से विधायकों में असंतोष व्याप्त है. हालांकि नियुक्त किए गए लोगों में से कई आरएसएस कार्यकर्ता हैं लेकिन कुछ तो संघ के प्रतिनिधि भी नहीं है. इन विधायकों की दूसरी शिकायत यह है कि इन्हें पार्टी में संगठनात्मक स्तर पर वरिष्ठता के अनुसार पद नहीं दिया जा रहा.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन नेताओं ने भाजपा के संगठनात्मक नेतृत्व के समक्ष पहले भी यह मुद्दा उठाया था लेकिन उन्हें शांत रहने को कह दिया गया और संकेत दिया गया कि उनकी यह हरकत अनुशासनहीनता मानी जाएगी. लेकिन इसकी परवाह न करते हुए इस बार इन विधायकों ने सार्वजनिक तौर असंतोष जाहिर कर दिया है. पिछले ढाई सालों से खट्टर हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि वे आरएसएस कार्यकर्ताओं से राय लेते रहते हैं.

संघ चला रहा सरकार

एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, हो सकता है आरएसएस अपने सुशासन के सिद्धान्तों के अनुसार काम करने पर जोर देता हो लेकिन रोजमर्रा के कामकाज निपटाने के राज्य सरकार के अपने नियम कायदे होते हैं, जो सीधे मुख्यमंत्री या उनके कैबिनेट मंत्री के निर्देशानुसार निपटाए जाने होते हैं. ऐसे में इस तरह दो प्रक्रियाएं अपनाने के चलते सरकार का रोजमर्रा का कामकाज प्रभावित होता है.

गत वर्ष अक्टूबर में कांग्रेस नेता रण सिंह मान ने 34 सहायकों की सूची जारी की थी, जिनमें से 24 संघ कार्यकर्ता हैं और वो भी दूसरे राज्यों के. कथित तौर पर ये ही लोग खट्टर सरकार चला रहे हैं.

पिछले बीस सालों से राज्य के राजनीतिक घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखने वाले एक राजनीतिक विश्लेषक डॉ. गुरमीत सिंह ने कहा, यहां यह समझना होगा कि खट्टर सरकार का आधा कार्यकाल तो खत्म हो चुका है. इसलिए ये विधायक अब ‘सत्ता का सुख भोगना’ चाहते हैं. वे अब मोल भाव पर उतर आए हैं. यही सच है कि सरकार बिल्कुल सुस्त चाल से काम कर रही है. नौकरियों में भर्ती में देरी की जा रही है.’

सूत्रों के अनुसार, ये असंतुष्ट विधायक अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि ये अपने समर्थकों को क्या मुंह दिखाएंगे, जिनसे इन्होंने चुनावों के दौरान कई वादे किए थे, जिन्हें बिना अधिकारों के ये पूरे नहीं कर पा रहे हैं. जो वादे पूरे नहीं किए जा सके हैं, उनमें से प्रमुख है-रोजगार या सरकारी फायदे. ये विधायक चाहते हैं कि सरकार नौकरियों में भर्ती में जल्दबाजी दिखाए और तबादलों और नियुक्ति के लिए उनकी भी राय ली जाए.

चुनाव नतीजों के बाद हल

वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार बलवंत तक्षक एक कदम आगे की बात करते हुए कहते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही कुछ हो सकेगा. सब कुछ इन राज्यों के चुनाव परिणामों पर निर्भर है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजों पर. चुनाव परिणाम 11 मार्च को आएंगे. ‘अगर भाजपा जीत जाती है तो इन विधायकों को चुप रहने के ‘निर्देश’ दे दिए जाएंगे.

साथ ही यह संदेश देने की कोशिश होगी कि अगले विधानसभा चुनाव में भी राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगे जाएंगे न कि खट्टर के नाम पर. और अगर इसके विपरीत राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा हार जाती है तो नजारा कुछ और होगा और ये असंतुष्ट विधायक शांत नहीं हुए तो पार्टी हो सकता है इन विधायकों की मांगों पर कुछ गौर कर ले.

तक्षक कहते हैं कि ये सारे विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में दिखाने के लिए अब राजनीतिक पदों पर लाभ उठाने की फिराक में हैं. वे कहते हैं कि चुनाव नतीजे आने के एक सप्ताह बाद पार्टी के शीर्ष नेता इन विधायकों से मुलाकात करेंगे. तब तक स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है.

खट्टर ने विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने से पहले इन विधायकों से कई चरणों में बातचीत की थी ताकि ये विधानसभा सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही में बाधा न पहुंचाएं. विधायकों ने कथित तौर पर खट्टर को कहा है कि राज्य में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है. मंत्री तो अपने-अपने काम में व्यस्त हैं लेकिन विधायक एक छोटा सा भी काम नहीं करवा पा रहे क्योंकि अफसर वर्ग उनकी परवाह ही नहीं करता.

मुसीबत में खट्टर

उन्होंने राज्य सरकार के कामकाज में सक्रिय भूमिका की मांग की. 90 विधायकों के साथ हरियाणा विधानसभा में 47 विधायक भाजपा के हैं. पार्टी को चार निर्दलीयों व एक बसपा विधायक का भी सहयोग प्राप्त है. सदन में इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) के 19, कांग्रेस के 17 और शिरोमणि अकाली दल का एक सदस्य है. भाजपा सरकार का समर्थन करने वाले 5 विधायकों ने भी खट्टर के साथ अलग से मुलाकात की.

लगता है खट्टर चारों तरफ से मुसीबतों से घिरने वाले हैं. एक ओर प्रदेश भर में जाट आंदोलन चल रहा है तो दूसरी ओर पंजाब के नदी जल बंटवारे को लेकर भी राजनीति गरमा गई है. उस पर, अपनी पार्टी के विधयकों की नाराजगी ने खट्टर की परेशानियां बढ़ा दी हैं.

राजननीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा गैर जाट मतदाताओं के मतदान पर सत्ता में आई है. यानी कि जीटी रोड के जाट बेल्ट का भाजपा को कोई समर्थन हासिल नहीं है. उन्होने यह भी कहा कि पंजाबी होने के नाते खट्टर के हरियाणा की राजनीति से अपने अलग हित जुड़े हुए हैं. अब देखना यह है कि क्या वे अपने ही रूठे विधायकों और सांसदों को मना पाएंगे?

First published: 7 March 2017, 8:12 IST
 
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