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बीजेडी को तोड़ने की कोशिश में भाजपा, जल्द हो सकते हैं चुनाव: तथागत सत्पथी

आकाश बिष्ट | Updated on: 29 March 2017, 9:14 IST


बीजू जनता दल के सांसद तथागत सत्पथी ने दावा किया है कि भाजपा उनकी पार्टी बीजेडी को तोड़ने की कोशिश कर रही है. उन्होंने भाजपा के एक सांसद पर आरोप लगाया है कि वह इस मामले में डील कर रहे हैं. लगातार कई ट्वीट कर सत्पथी ने भगवा पार्टी पर आरोप लगाया कि वह बीजेडी का नाम तथा सिंबल हथियाने की कोशिश कर रही है और इस दिशा में भरपूर प्रयास कर रही है कि विधानसभा समेत संसद में भी पार्टी के भीतर टूट हो जाए.

सत्पथी ने ट्वीट किया, 'बीजेपी भारी मेहनत कर रही है कि संसद और यहां तक कि विधानसभा में बीजेडी एआईडीएमके की तरह की टूट हो जाए. इसके बाद सतपथी ने बिना किसी का नाम लिए एक और ट्वीट किया कि वे पार्टी का सिंबल और नाम लेना चाहते हैं. अफवाह तेज उड़ी हुई है कि केवल एक सांसद उनके लिए यह डील करके देगा.

सत्पथी ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के साथ अब ओडिशा में भी चुनाव करा सकती है. सत्पथी ने कहा, देखना होगा कि क्या चुनाव आयोग इसमें केंद्र का साथ देगा. सत्पथी ने कहा कि अगर पार्टी टूटती है, तो वह टूट कितनी ही छोटी क्यों न हो भाजपा गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश के साथ ओडिशा में भी चुनाव के लिए प्रयास करेगी.


भाजपा के नेशनल कन्वेंशन की बैठक जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होने जा रहे हैं, के ओडिशा में आयोजित किए जाने के बारे में सत्पथी ने सवाल उठाए हैं. तथागत सत्पथी के अनुसार इस आयोजन को ओडिशा में आयोजित किए जाने के पीछे इरादा राज्य सरकार पर दबाव बनाना और उसके काम को मुश्किल करना है.


नोटबंदी की तरफ इशारा करते हुए सत्पथी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा है. सत्पथी ने “मैं धारक को वचन देता हूं कि...” को टवीट करते हुए कहा है कि मोदी ने देश का विश्वास तोड़ा है. उसके बाद सत्पथी ने टि्वट किया है, भाजपा का कहना है कि “मैं प्रत्येक दलबदलू को नई नकदी तथा टिकट देना का वचन देता हूं....”


किसी ने इस सारे मुद्दे पर बीजेडी के सांसद बैजयंत पांडा की ट्विटर पर टिप्पणी मांगी तो उन्होंने जवाब दिया कि, “ वे विशेषज्ञता के साथ बोल रहे हैं. उनको एक बार पार्टी से निलंबित किया जा चुका है और वे दूसरी पार्टी में रह चुके हैं. मेरा पास ऐसा अनुभव नहीं है इसलिए मेरी राय इस तरह की नहीं है. ”

राज्य में हाल में हुए पंचायती राज चुनाव में भाजपा की मिली शानदार सफलता को देखें तो साफ संकेत मिलते हैं कि इस तटीय राज्य में भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ाया है. पार्टी ने 2012 के स्थानीय निकायों के चुनाव की तुलना में 270 अधिक सीटें जीती हैं.

वर्तमान परिदृश्य में नवीन पटनायक से राज्य की कमान अपने हाथ में लेने का स्पष्ट अवसर भाजपा को दिख रहा है. नवीन पिछले 17 वर्षों से राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं और भाजपा उम्मीद कर रही है कि 2019 के चुनाव के पहले पार्टी में एक और टूट से बीजेडी और भी कमजोर हो जाएगी.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राज्य में चुनाव जल्दी कराने की योजना इसी रणनीति का भाग हो सकती है. ओडिशा में विधानसभा चुनाव 2019 में होने हैं तथा जानकारों का मानना है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उनकी टीम 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ होने वाले राज्य के विधानसभा चुनाव पर पूरा ध्यान नहीं दे पाएंगे इसलिए बेहतर यह होगा कि राज्य में विधानसभा चुनाव अन्य राज्यों के साथ कराए जाएं.

 

दलबदलू और भाजपा


2014 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से ही, भाजपा के रणनीतिकार दिनरात इस कोशिश में लगे हुए हैं कि कैसे दूसरी पार्टियों के नेताओं को तोड़कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अमलीजामा पहनाया जाए. मणिपुर और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव जीत इसका एक उदाहरण हैं कि किस तरह से कांग्रेस से तोड़े गए नेताओं ने राज्यों में भाजपा की सरकार बनवाने में मदद की. सच तो यह है कि मणिपुर में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री नांगथोबम बीरेन सिंह पहले कांग्रेस में ही थे और उन्हें पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री ओकरम इबोबी सिंह का दायां हाथ माना जाता था.

उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री के साथ जिन नौ मंत्रियों ने शपथ ली उनमें से पांच पहले कांग्रेस में ही थे. इतना ही नहीं भाजपा ने उन 14 सीटों में 12 पर जीत दर्ज की है जहां कि उन्होंने कांग्रेस से आए उम्मीदवार खड़े किए थे. गोवा में भी कांग्रेस के समर्थन से खड़े निर्दलीय विधायकों ने अपनी निष्ठा बदलकर भाजपा की सरकार बनवाने में जरा भी देर नहीं लगाई, जबकि भाजपा राज्य में जीती हुई सीटों के मामले में दूसरे नंबर पर ही थी.


अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा कांग्रेस की सरकार को उस समय अस्थिर करने में सफल रही जबकि कांग्रेस के 43 विधायक भगवा पार्टी की गठबंधन सहयोगी पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) में एक झटके में शामिल हो गए. इसके एक महीने बाद ही इसमें से 34 विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया और पीपीए में सिर्फ 10 विधायक ही बचे रह गए.

 


भाजपा इसके बाद भी दूसरी पार्टियों के स्थानीय नेताओं को तोड़ने के अपने अभियान में सक्रिय रही और 2017 फरवरी में कांग्रेस को एक और झटका उस समय लगा जबकि पूर्वी केमांग जिले के 549 चुने हुए पंचायत सदस्यों ने भाजपा का दामन थाम लिया. इसमें से अधिकांश कांग्रेस के नेता ही थे.


2015 में भाजपा को उत्तर पूर्व की राजनीति में सबसे तेज माने जाने वाले कांग्रेसी नेताओं में से एक हिमंता विस्वा सरमा को तोड़ने में सफलता मिल गई. सरमा ने पार्टी को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने और एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनने में बहुत मदद की है. जबसे सरमा भाजपा में आए हैं तब से अब तक वे एक ऐसे क्षेत्र में तीन राज्यों में भाजपा की सरकार का गठन करवा चुके हैं जहां कि भाजपा की मुश्किल से ही कुछ मौजूदगी थी. हाल ही में कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एसएम कृष्णा ने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का हाथ थाम लिया, जबकि राज्य में चुनाव होने में कुछ ही महीने बचे हैं.


इससे बिल्कुल साफ है कि भाजपा किस तरह से उन राज्यों में जीत दर्ज करना चाहती है जहां कि अब तक उसकी उपस्थिति बहुत मामूली है या नहीं है. यह तो समय ही बताएगा कि बीजेडी का भी हाल कांग्रेस की तरह ही होगा या नहीं.

 

First published: 29 March 2017, 9:14 IST
 
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