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बुद्धदेव भट्टाचार्य का नया संस्मरण: सिंगुर, नन्दीग्राम के लिए गोपाल कृष्ण गांधी ज़िम्मेदार

सुलग्ना सेनगुप्ता | Updated on: 4 February 2017, 7:49 IST
(फाइल फोटो )

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने 'फिरे देखा' शीर्षक से अपने संस्मरणों को लेकर जो किताब लिखी थी, उसका दूसरा खंड 'फिरे देखा-2' बाजार में आ गया है. इस दूसरे खंड में वाम मोर्चा सरकार के 10 सालों की उपलब्धियों और गल्तियों का लेखा-जोखा है. इस दूसरे खंड में उन्होंने सिंगुर और नंदीग्राम आन्दोलन, जो पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के पतन का कारण तो बना ही, उन्हें मुख्यमंत्री पद से भी हाथ धोना पड़ा था, के बारे में अपने संस्मरणों को लिखा है.

इस दूसरे खंड में उन्होंने 2000 से 2011 के बीच नन्दीग्राम और सिंगुर के आन्दोलन के साथ ही विपक्ष की नेता ममता बनर्जी द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में प्रबल तरीके से चलाए गए आन्दोलन पर प्रकाश डाला है. इस दौरान बुद्धदेब राज्य के मुख्यमंत्री थे और ममता बनर्जी राज्य में प्रमुख विपक्षी नेता थीं.

अपनी इस पुस्तक में भट्टाचार्य ने राज्य के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी को निशाने पर रखा है और पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण की निराशाजनक प्रगति के लिए उन्हें जवाबदेह ठहराया है. भट्टाचार्य लिखते हैं कि सिंगुर में टाटा मोटर्स के नैनो प्रोजेक्ट के संदर्भ में गोपाल कृष्ण गांधी ने उनके और ममता बनर्जी के बीच मध्यस्थता की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें असफल रहे. गांधी के इस हस्तक्षेप की वाम मोर्चा की ओर से कड़ी आलोचना हुई थी.

किताब में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि किस तरह से भट्टाचार्य ने खुद आगे आकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पद के लिए गांधी के नाम की सिफारिश की थी.

पूर्व राज्यपाल पर निशाना

भट्टाचार्य लिखते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब राज्य में राज्यपाल पद के लिए उनसे किसी के नाम पर अपनी राय देने का अनुरोध किया तो वह काफी खुश हुए थे क्योंकि आमतौर पर नई दिल्ली किसी को राज्यपाल बनाने के लिए इतना भी शिष्टाचार नहीं निभाती है. वह लिखते हैं कि मैंने गांधी के नाम का सुझाव दे दिया. बाद में हमारे सम्बंध उनसे बहुत अच्छे रहे. लेकिन अचानक ही पता नहीं क्यों उन्होंने (गांधी) विपक्ष के हितों को इतना अधिक संरक्षण देना शुरू कर दिया.

भट्टाचार्य ने राजभवन में गांधी, वाम मोर्चा के दो मंत्रियों सूर्यकांत मिश्रा, निरुपम सेन और ममता बनर्जी के बीच हुई एक बातचीत का हवाला देते हुए उजागर किया है कि किस तरह से गड़बड़ी हुई. उन्होंने लिखा है कि राज्य लम्बे समय तक याद रखेगा कि जब गांधी के कारण राज्य के औद्योगीकरण में बाधा पहुंची.

अपनी पुस्तक में भट्टाचार्य ने नन्दीग्राम में फायरिंग की घटना, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी, को लेकर भी सवाल उठाए हैं. भट्टाचार्य ने नन्दीग्राम की फायरिंग की घटना के बाद ताजा हिंसा पर गांधी द्वारा जारी वक्तव्य (इस वक्तव्य में गांधी ने वाम मोर्चा सरकार पर कड़ा प्रहार किया था) को याद किया है. 

उन्होंने लिखा है कि गांधी की 'ठंडी' प्रतिक्रिया से मुझे अत्यन्त आश्चर्य हुआ. भट्टाचार्य अपनी किताब में सवाल करते हैं कि वह (राज्यपाल) जानते थे कि लोग वहां (जंगल महल में) निर्दयतापूर्वक मारे गए हैं. माओवादियों की सक्रियता अचानक ही बढ़ गई थी. 

राज्य सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वहां पुलिस बल भेजा हुआ था. लेकिन इसके बाद बाद भी उन्होंने पुलिस कार्रवाई का समर्थन करने के बजाए अपनी सीमाएं पार करते हुए ऐसा बयान जारी कर दिया. वह सवाल करते हैं कि वह किसको खुश करना चाहते थे? 

अपना पल्ला झाड़ा

'फिरे देखा-2' को पढऩे से यह एहसास हो जाता है कि भट्टाचार्य नन्दीग्राम और सिंगुर आन्दोलन पर नियंत्रण कर पाने में अपनी सरकार की विफलता का आरोप झेलने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं. और उन्होंने अपनी किताब में यह लिखा भी है कि टाटा के बंगाल छोडऩे से राज्य को काफी आघात पहुंचा है. 

वह लिखते हैं कि राज्य की यह अपूर्णीय क्षति थी. कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि क्या मैंने गलती की.  क्या यह केवल भूमि अधिग्रहण का मुद्दा था अथवा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया गलत थी? भट्टाचार्य यह भी लिखते हैं कि क्या मेरा भी विपक्ष की तरफ नरम रवैया था? हमें उस अनुभव से कुछ सीखना चाहिए.

First published: 4 February 2017, 7:49 IST
 
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