Home » राज्य » Chandigarh doctor lays out blueprint for 'ethical healthcare' in India. What's in it?
 

मेडिकल सेक्टर की स्याह दुनिया से रूबरू कराती एक डॉक्टर की किताब

राजीव खन्ना | Updated on: 28 February 2017, 9:31 IST

 

नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग ऑथोरिटी (एनपीपीए) द्वारा स्टेंट की कीमतें निर्धारित करने से प्राइवेट डॉक्टरों, अस्पतालों द्वारा मरीजों से की जाने वाली ठगी उजागर हो गई है और इसी सब के बीच चंडीगढ़ के एक वरिष्ठ डॉक्टर की एक किताब सामने आई है, जो चिकित्सक समुदाय में खलबली मचा देगी.


किताब ‘एथिकल हैल्थकेयर इन इंडिया’ चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रीसर्च से सेवानिवृत्त नेत्र विशेषज्ञ डॉ. राम कुमार ने लिखी है, जो अरसे से पारम्परिक स्वास्थ्य के लिए प्रचार कर रहे हैं. इस किताब के आमुख में पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव अजित सिंह चाथा ने लिखा है, ‘जिस तरह से हर क्षेत्र में घोटालों, दलाली, रिश्वतखोरी, गड़बडि़यां, गिरोहबाजी की खबरें आ रही हैं उससे तो लगता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है.


मरीजों की अनावश्यक जांचों में कमीशनखोरी की बात हो, सर्जरी या कार्पोरेट अस्पतालों में लक्ष्य पूरा करने के लिए अनावश्यक इलाज की. इन सब अफवाहों में कुछ न कुछ सच्चाई तो अवश्य है. तभी तो आए दिन जांच प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और ऐंजियोप्लास्टी जैसे इलाज करवाने वाले मरीजों से अस्पतालों के बेड भरे पड़े हैं. खैर, जो भी हो, केवल 5 प्रतिशत लालची डॉक्टरों की वजह से पूरा का पूरा डॉक्टर समुदाय ‘बेईमान’ माना जा रहा है.

 

70 फीसदी जांच ग़ैरज़रूरी

 

डॉ.कुमार कहते हैं डॉक्टरों द्वारा लिखे गए 70 फीसदी टेस्ट अनावश्यक होते हैं. वे कहते हैं जनता चिकित्सकीय अंधकार के दौर में जी रही है यानी जनता को चिकित्सा विज्ञान के बारे में कुछ खास मालूम नही है और कुछ लालची डॉक्टर इसी का फायदा उठाते हैं. साथ ही वे लोगों के अपना इलाज खुद करने की आदतों की भी ठीक नहीं मानते, जिससे बहुत से लोग डॉक्टरों के कहने से पहले ही पैथेलॉजिकल लैब में एमआरआई जैसे टैस्ट करवाने पहुंच जाते हैं.


वे कहते हैं आजकल इंटरनेट वैसे ही लोगों के लिए हर मर्ज की दवा हो गया है. यहां तक कि अगर लोगों को छोटी सी छींक भी आती है तो वे इसे अनदेखा नहीं कर पाते और ऐसे ही उन्हें डॉक्टर मिल जाते हैं जो अनावश्यक जांचें लिख देते हैं. कुल मिलाकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है.


अपनी किताब में डॉ. कुमार ने भारत में ‘‘मौलिक स्वास्थ्य’’ को लेकर बहुत सी चुनौतियों का जिक्र किया है. वे बताते हैं कि डॉक्टर कैसे इस पूरी प्रक्रिया केलिए जिम्मदार हैं. किताब के एक अध्याय ‘‘हिप्पोक्रेट्स ओथः डॉक्टर्स और सोसायटी’’ में उन्होंने ‘‘डॉक्टर-राजनेता संबंधों’’ के बारे में लिखा है.


उन्होंने लिखा है कि कुछ डॉक्टर राजनेताओं को खुश करने या अपने निजी फायदे के लिए यह सब करते हैं. हृदय रोग के नाम पर राजनेता कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए आईसीयू में भर्ती हो जाते हैं और निश्चित रूप से वे डॉक्टर की मिलीभगत से ही वे ऐसा करते हैं. प्राइवेट मेडिकल कॉलेज भी राजनेताओं की मेहरबानी से ही चलते हैं.

 

ख़स्ताहाल मेडिकल कॉलेज

 

मेडिकल कॉलेजों में लगातार अच्छे शिक्षकों की कमी इसीलिए है कि इन शिक्षकों का ज्यादातर समय अपना तबादला रुकवाने और प्रमोशन करवाने के लिए राजनीतिक गलियारों में बीतता है. दूसरा, प्राइवेट कॉलेजों के विज्ञापनों से आकर्षित होकर शिक्षक बेहतर वेतन भत्तों के लालच में निजी कॉलेजों में नौकरी करने चले जाते हैं. इसके चलते सरकारी मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की संख्या में कमी होती जा रही है.


डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि एक फ्रेशर डॉक्टर के लिए शुरुआत में मरीज मिलना मुश्किल होता है और इसलिए वे दूसरे डॉक्टरों के रैफरेंस(संदर्भ) पर निर्भर रहते हैं और इसी तरह ‘कट प्रैक्टिस’ की परम्परा बनती है. डॉ. कुमार का दावा है उन्हें डॉक्टरों ने खुद बताया है कि मेडिकल कॉलेजों में भर्ती होना काफी मुश्किल है और फाइव स्टार अस्पतालों में भी.

यहां मरीज को भर्ती करने के साथ ही सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जांचें ‘‘जरूरी’’ हो जाती हैं. इसके अलावा सीजेरियन प्रसव और ऑपरेशन से यूट्रस हटाना इन असपतालों में आम बात है. डॉक्टरों का यह भी अनुभव रहा है कि सार्वजनिक अस्पतालों में प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसरों के बीच इस बात की होड़ रहती है कि वीआईपी मरीजों का इलाज कौन करेगा और गरीब मरीजों का जिम्मा जूनियर डॉक्टरों को दे दिया जाता है.

 

संस्था की दरकार

डॉ. कुमार का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रभावी संचालन के लिए तुरंत ही एक केंद्रीय संस्था बनाने की जरूरत है क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. यहां तक कि प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों से मनमानी फीस वसूली जाती है. नेशनल हैल्थ प्रोफाइल 2015 के अनुसार सस्थ्य क्षेत्र का 81 प्रतिशत फंड इन्हीं प्राइवेट अस्पतालों से आता है. साथ ही उन्होंने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में भी सुधारों की सिफारिश की है, खास तौर पर काउंसिल में गैर चिकित्सकीय
सदस्यों को शामिल करने की.

 

डॉ. कुमार की इस किताब का विमोचन करते हुए न्यूरोलॉजिलस्ट डॉ. अमरीक चाथा ने भारत में ‘‘मेडिकल सक्रियता’’ को ज़रूरी बताया. उन्होंने कहा ‘‘गलत चीजों’’ पर लगाम लगनी चाहिए. साथ ही बताया कि अमेरिका में ऐसी गड़बडि़यों पर निगरानी रखने के लिए एक अलग विभाग है जो धोखाधड़ी पर निगरानी रखता है.

 

किताब में आर कुमार और उनके सहयोगियों द्वारा समाज में मौलिक और सबके लिए स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए जो सिफारिशें की गई हैं, उनकी लिस्ट भी प्रकाशित की गई है. यही बात प्रधानमंत्री और हर मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की बात कही गई है. उन्होंने प्राइवेट अस्पतालों से निजी अस्पतालों तक सारे तंत्र में बदलाव की वकालत की है. सार्वजनिक अस्पतालों में व्यक्तिगत इलाज का खर्च 80 प्रतिशत से घट कर 20 प्रतिशत रह जाएगा.

 

बहुत सी सिफारिशों के बीच डॉ. कुमार और उनके साथियों की एक और सिफारिश यह भी है कि सरकार को सेवानिवृत्त डॉक्टरों और अन्य डॉक्टरों को वॉल्येटरों के तौर पर काम करने देना चाहिए. जहां जरूरत हो, वहां ये डॉक्टर अपनी निशुल्क सेवाएं दें. साथ ही ऐसा नियम लागू किया जाए कि मेडिकल छात्रों को पढ़ाई के बीच में ही अपना कोर्स बदलने की छूट दी जाए. साथ ही मेडिकल स्थानों में भर्ती का आधार परजाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र न हो.

First published: 28 February 2017, 9:31 IST
 
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