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एक और परिवार: बेटे लोकेश के लिए सत्ता की राह तैयार कर रहे चंद्रबाबू नायडू

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 February 2017, 8:05 IST

वीके शशिकला मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम को अपदस्थ करके तमिलनाडु की ‘सरपरस्त’ बनने की तैयारी में हैं लेकिन तेलगु जनता सहित कई लोगों को यह बात नागवार गुजरी है. सोशल मीडिया में भी शशिकला के इस ‘रक्तहीन तख्तापलट’ पर थू-थू हो रही है.

गौरतलब है कि जो लोग शशिकला की ताजपोशी का विरोध कर रहे हैं, वही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश के प्रशासन में शामिल होने को लेकर खुशी जता रहे हैं. लोकेश की ताजपोशी का मुहूर्त कुछ ही दिनों में तय हो जाएगा. नारा के पद और गोपनीयता की शपथ लेकर नायडू मंत्रिमंडल में मंत्री बनने के बाद प्रशासन में उनकी भूमिका बढ़ जाएगी और आधिकारिक भी हो जाएगी. साथ ही यह भी तय है कि वे अपने पिता और पार्टी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के प्रति निष्ठावान रहेंगे और मंत्रालय में उनके पास आने वाले किसी भी मामले के बारे में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर किसी को नहीं बताएंगे.

सही मायनों में देखा जाए तो लोकेश अपने पिता के मार्गदर्शन में ‘प्रशिक्षु मुख्यमंत्री’ रहेंगे. चंद्रबाबू नायडू हर काम पूरे ध्यान से करते हैं. अपने इकलौते बेटे लोकेश को उत्तराधिकारी बनाने के लिए उन्होंने सोच समझ कर यह कदम उठाया. नायडू नहीं चाहते थे, ऐसा लगे कि लोकेश को प्रशासन पर जबरन थोप दिया गया है.

कौन हैं लोकेश

लोकेश कुछ समय से पार्टी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं. उन्हें 2014 में टीडीपी कार्यकर्ता कल्याण कोष का समन्वयक बनाया गया. तभी से पार्टी के कुछ नेता मांग करने लग गए कि जैसे तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे के.टी. रामाराव उर्फ केटीआर की तरह ही लोकेश को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए. हालांकि लोकेश और केटीआर की तुलना करना बेमानी है, क्योंकि तेलंगाना के आईटी और नागरिक प्रशासन मंत्री ने तेलंगाना आंदोलन में काम किया था, उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा और वे एकीकृत आंध्र प्रदेश में विपक्षी पार्टी के विधायक रह चुके हैं. 

केटीआर और लोकेश के बीच कोई तुलना करना इसलिए भी उचित नहीं है क्योंकि केटीआर ने अपने आपको एक खास तरह का राजनेता बनाने के लिए काफी मेहनत की है. आज वे गांव के ग्रामीणों से लेकर कॉर्पोरेट जगत की हस्तियों से जुड़े नेता हैं. इस कद का नेता बनने के लिए लोकेश को अभी मीलों का सफर तय करना है.

आंध्रप्रदेश राज्य के बंटवारे के बाद टीडीपी ने एक ‘‘राष्ट्रीय समिति’’ का गठन कर स्वयं को एक राष्ट्रीय पार्टी घोषित कर दिया, जबकि जनप्रतिनिधि कानून के अनुसार नहीं है. आज चंद्रबाबू नायडू टीडीपी के अध्यक्ष हैं और उनके बेटे लोकेश पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव. वे पार्टी की नीति निर्धारक इकाई पोलितब्यूरो के सदस्य भी रह चुके हैं.

दी जाएगी कमान

ताजा घटनाक्रम इस बात का संकेत माना जा सकता है कि लोकेश को पार्टी में कोई बड़ी भूमिका दी जा सकती है. उन्हें ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन चुनाव की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां टीडीपी 150 सीटों में से केवल एक ही सीट पर जीत पाई थी. यानी पार्टी की हालत हैदराबाद आौर सिकन्दराबाद में पूरी तरह खराब है. इस पृष्ठभूमि के साथ लोकेश आंध्र की राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं.

केसीआर की राजनीतिक चतुराई के चलते तेलंगाना विधानसभा में टीडीपी की महज 2 सीटें रह गई हैं. हाल ही एक बैठक में तेलंगाना टीडीपी के अध्यक्ष एल.रामन्ना ने बताया कि तेलंगाना के लिए लोकेश को पार्टी में सेवाएं बढ़ानी पड़ेंगी. अब यह तो कोई नहीं जानता कि रामन्ना की यह मांग क्या वक्त को देखते हुए थी? 

चंद्रबाबू नायडू ने ऐसे ‘संकेत’(राजनीतिक स्तर पर यह तय था) दिए थे कि लोकेश को आंध्र प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में स्थान दिया जाएगा. इसलिए इस बात की कोई गुजाइश थी ही नहीं कि लोकेश को तेलंगाना इकाई की जिम्मेदारी दी जाएगी. रामन्ना की मांग एक तरह से नायडू की इस बड़ी योजना की वजह बनी. इस अवसर का उपयोग यह देखने के लिए किया गया कि लोग इस खबर पर क्या प्रतिक्रया देते हैं. 

फर्ज़ी सर्वेक्षण

इसी  बीच, टीडीपी के ही एक वफादार चैनल ने एसएस के जरिये एक सर्वे किया कि लोकेश को मंत्रिमंडल में शामिल करने का निर्णय सही था या नहीं? इसका परिणाम भी उम्मीद के अनुरूप ही पाया गया. सर्वे में शामिल 90 फीसदी लोगों ने इस निर्णय का स्वागत किया. मतलब यह सर्वे पूरी तरह से गढ़ा गया था. हालांकि बहुत से नेताओं ने लोकेश को विधानसभा में चुने जाने के लिए अपनी सीट कुर्बान करने का भी ऑफर दिया लेकिन नायडू ने अपने बेटे को उपरी सदन से ही मंत्रिमंडल मे शामिल करना ज्यादा आसान समझा. लोकेश फिलहाल ‘‘अनुभव हासिल’’करने के अपने उद्देश्य के चलते काफी ‘विनम्र’ बने हुए है.

लोकेश पर फिलहाल आरोप लगाया जा रहा है कि उनका पद संविधान के अनुरूप नहीं होगा. नायडू पर भी अपने जमाने में ऐसा ही आरोप लगा था, जब वे अपने ससुर और टीडीपी के संस्थापक एन.टी. रामाराव के मुख्यमंत्रित्व काल में पार्टी में नम्बर दो की हैसियत से काम कर रहे थे. इसलिए नायडू बेहतर जानते हैं कि इस प्रकार के आरोपों से पार पाना मुश्किल है. इसके बजाय कोई संवैधानिक पद चुनना बेहतर होता है. 

कुछ भी नया नहीं

मुख्यमंत्रियों द्वारा अपनी संतान को राजनीतिक वारिस बनाना कोई नई बात नहीं है. मैरी चन्ना रेड्डी ने अपने बेटे शशिधर रेड्डी को इसी प्रकार एन. जनार्दन रेड्डी के केबिनेट में शामिल किया था जो उनके बाद मुख्यमंत्री बने थे. यहां तक कि कोटला विजय भस्कर रेड्डी ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अपने पुत्र कोटला सूर्य प्रकाश रेड्डी को लोकसभा के लिए निर्वाचित करवा दिया. 

सूर्य प्रकाश रेड्डी केद्र में मनमोहन सिंह सरकार में राज्य मंत्री रहे. जहां एनटीआर के दामाद टीडीपी के प्रमुख हैं, वहीं वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के बेटे वाई.एस. जगमोहन रेड्डी अपने पिता के बाद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन ऐसा हो नहीं सका और वे अभी तक कोशिश कर रहे हैं. फिलहाल वे आध्र प्रदेश में विपक्ष के नेता हैं.

टीडीपी की सोशल मीडिया ब्रिगेड मुख्यमंत्री नायडू से इत्तेफाक नहीं रखती. कुछ का मानना है कि लोकेश को मंत्रिमंडल में शामिल होने से पहले सम्मानजनक तरीके से चुन कर विधानसभ आना चाहिए था जबकि कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि जल्दी क्या है; लोकेश 2019 के चुनाव तक प्रतीक्षा कर सकते थे. हालांकि ऐसे चापलूसों की भी कमी नहीं है, जो कह रहे हैं कि आजादी के बाद से ही राजनीति में वंशवाद चला आ रहा है. ऐसे में, लोकेश को मंत्रिमंडल में शामिल करने का निर्णय सही है.

First published: 7 February 2017, 8:05 IST
 
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