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क्या जालंधर छावनी सीट कांग्रेस को वापस मिल सकती है?

राजीव खन्ना | Updated on: 30 January 2017, 7:28 IST

जालंधर छावनी वह निर्वाचन क्षेत्र है, जो पिछले एक साल से सुर्खियों में रहा है. शुरू में यहां अकाली विधायक, ओलिंपियन हॉकी स्टार परगट सिंह का अपने पार्टी नेतृत्व से मोहभंग हुआ, खासकर शिरोमणि अकाली दल से. फिलहाल यह सभी तीन पार्टियों के उम्मीदवारों की सीट है- कांग्रेस, आप और अकाली दल. इसके लिए इन पार्टियों ने उम्मीदवारों की घोषणा के लिए अपने-अपने हाई कमान से संघर्ष किया है. 

इस सीट पर कांग्रेस का हमेशा से वर्चस्व रहा है, सिवाय दो मौकों के. लगता है पार्टी परगट के माध्यम से वापसी की कोशिश कर रही है. वह कुछ महीनों पहले तक अकाली विधायक के तौर पर अकाली के शीर्ष नेता के साथ खड़े परगट से फायदा उठाना चाह रही है. पर दो अन्य सशक्त उम्मीदवार अकाली दल के सरबजीत मक्कड़ और एचएस वालिया आसान समस्या नहीं हैं, क्योंकि उनके पक्ष में काम करने के उनके अलग कारण हैं.

दो बार से अकाली विधायक

इस सीट ने पिछले दो मौकों पर 2007 में जगबीर बराड़ और 2012 में परगट अकाली विधायक चुने हैं. विडंबना है कि दोनों कार्यकाल पूरा होने से पहले ही कांग्रेस में शामिल होने के लिए उसे छोड़ आए और अब यहां टिकट पाने की होड़ में हैं. कांग्रेस में काफी पहले आने से यहां बराड़ ने वोटर्स के लिए काफी काम किया है, पर अंतत: टिकट परगट को मिल गया. 

सूत्रों का कहना है कि यह क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू की वजह से संभव हुआ, जो हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं. बराड़ को मनाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें नाकोदर से खड़ा किया है, पर लोग बराबर सवाल कर रहे हैं कि निर्वाचन क्षेत्र बदल जाने पर कोई उम्मीदवार 20 दिनों में क्या कर सकता है? 

माना जा रहा है कि बराड़ के साथी परगट के लिए शायद काम नहीं करें, पर इससे उलट नजरिया यह है कि यह मुद्दा बेअसर रहेगा क्योंकि बराड़ भी अकाली कैंप से कांग्रेस में आए हैं. 

परगट बना पाएंगे माहौल?

एक स्थानीय राजनीतिक समीक्षक ने कहा, ‘परगट सिंह के लिए अच्छी बात यह है कि वे अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल के विरोध में खड़े किए गए हैं, जिन्होंने स्थानीय लोगों की मांग पर जमशेर गांव में सोलिड वेस्ट प्लांट लगाया था. पर दूसरा नजरिया यह है कि वे सत्तासीन पार्टी के विधायक होने के नाते सरकार पर विभिन्न मुद्दों पर दबाव नहीं डाल सकेंगे. 

उन्हें सुखबीर ने पिछली बार बड़े उत्साह से टिकट दिया था, पर धीरे-धीरे वे अलग हो गए. परगट खेल के लिए कुछ करना चाहते थे और आम धारणा थी कि वे खेल मंत्री बनाए जा सकते हैं, पर ऐसा नहीं हुआ.’

परगट का दूसरा अच्छा पहलू यह है कि उनकी छवि साफ-सुथरी है और अपने मतदाताओं के साथ उनके अच्छे संबंध हैं. वे अपने कामों में काफी ईमानदार रहे हैं. 

आप में आंतरिक चुनौती

आप उम्मीदवार एचएस वालिया कार डीलर हैं. आप काडर में उनकी उम्मीदवारी को लेकर काफी विरोध हुआ था. पार्टी नेतृत्व पर आरोप था कि वह पैसे वालों को टिकट दे रहा है. जिन बड़े नामों को टिकट की उम्मीद थी, वे नाराज छोड़ दिए गए. इनमें वरिष्ठ पत्रकार मेजर सिंह थे, जिन्होंने आप में शामिल होने के लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक की नौकरी छोड़ दी थी. 

2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की उम्मीदवार ज्योति मान और भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान राजबीर कौर भी इनमें शामिल हैं. वालिया को अपनी पार्टी का अंदरूनी संघर्ष झेलना पड़ रहा है. पर उनको फायदा इससे है कि आप की लहर है, जहां लोग पार्टी की अंदरूनी खटपट की परवाह नहीं कर रहे हैं. 

वे दशकों से कांग्रेस और अकाली को आजमाने के बाद तीसरी शक्ति को आजमाना चाहते हैं. यहां दिल्ली से आप के स्वयंसेवक चौराहों पर खड़े होकर सभी आने-जाने वालों से समर्थन मांग रहे हैं. यहां काफी प्रवासी भारतीय भी मतदाताओं से फोन से संपर्क कर रहे हैं. वालिया यहां कुछ गांवों में नशे के आदी लोगों के लिए पुनर्वास केंद्र खोलने पर जोर दे रहे हैं.

समीक्षकों का कहना है कि यदि गणित उनके लिए सही रहीऔर विरोधी वोट टूट जाते हैं, तो परगट और वालिया की असुविधाएं, मक्कड़ की सुविधाएं बन जाएंगी. अन्यथा उनकी पूर्व एसजीपीसी सदस्य परमजीत सिंह रायपुर और जिला सद अध्यक्ष गुरुचरण सिंह चननी की नजर में अच्छी छवि नहीं हैं. इन्होंने उन्हें पहले भूमि हड़पने वाला बताया था. मक्कड़ पहले अकाली हल्का प्रभारी थे, और अन्य हल्का प्रभारियों की तरह उनकी भी छवि अच्छी नहीं है.  

मक्कड़ को अन्य फायदा यह है कि बसपा उम्मीदवार अमरीक बागड़ी कांग्रेस और आप समर्थकों को तोड़ सकते हैं. मक्कड़ को सुखबीर का भी समर्थन प्राप्त है, जो प्रकट रूप से परगट को सद छोडऩे के लिए कठोर मैसेज देना चाहते हैं. ‘उन्होंने परगट के कहने पर जमशेर में सोलिड वेस्ट प्लांट लगाने की योजना वापस नहीं ली थी, पर परगट के छोड़ते ही वापस ले ली थी. 

सरकार के कार्यकाल के उत्तरार्ध में सुखबीर ने यह भी घोषणा की थी कि जालंधर में चुंगी वसूली को खत्म कर दिया जाएगा. पंजाब में जालंधर और जलालाबाद ही वो जगहें हैं, जहां चुंगी वसूली जाती है. उन्होंने इलाके में मोबाइल टावर लगाने की घोषणा भी की, जिसकी सुरक्षा कारणों से सेना की अनुमति नहीं थी. ’

नोटबंदी का असर

राजनीतिक समीक्षक केसर सिंह कहते हैं, इस निर्वाचन में लोगों को लेकर कई मुद्दे हैं. वे कहते हैं, ‘एक महत्वपूर्ण मुद्दा लघु उद्योगों को बनाए रखने का है, जिस पर हाल ही में नोटबंदी का बहुत बुरा असर हुआ है. ग्रामीण इलाकों में ड्रग सेवन का भी मुद्दा है. लोग पानी के प्रदूषण का भी दीर्घावधि हल चाहते हैं. समस्या बेरोजगारी की भी है.’ 

इस निर्वाचन क्षेत्र में 100 से ज्यादा गांव हैं और 14 म्यूनिसिपल वार्ड. यहां ग्रामीण और शहरी दोनों तरह की समस्याएं हैं, क्योंकि इसमें जालंधर की पोश लोकेलिटीज हैं. पूर्व सीएम बैंत सिंह ने 1992 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था, जबकि उनके बेटे तेज प्रकाश और बेटी गुरकनवाल कौर बाद के दो लगातार होने वाले चुनावों में मतदाताओं द्वारा चुने गए थे. कौर पहले भाजपा में शामिल हुई थीं और फिर कांग्रेस में लौट गई थीं. सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस बार इस सीट पर वापस आ सकती है? 

First published: 30 January 2017, 7:28 IST
 
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