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हे गोरक्षकों! बूचड़ख़ानों से ज़्यादा प्लास्टिक से हो रही गायों की मौत

रथिन दास | Updated on: 13 May 2017, 16:39 IST

गुजरात में कथित गोरक्षक अक्सर अपने ‘बिजनेस ट्रिप्स’ पर आते हैं और कुछ ना कुछ दंगा-फ़साद कर जाते हैं. ये अक्सर उन इलाक़ों का दौरा करते हैं, जहां मरने के बाद गायों की खाल उतारी जाती है. उन्हें लगता है, बूचड़ख़ानों में उनकी हत्याएं हो रही हैं. पर उन्हें असली वजह नहीं मालूम कि उनकी गाय माता आखिर समय से पहले क्यों मर रही हैं. ज्यादातर गाएं चारे और पानी के लिए भटकती हुईं प्लास्टिक खा जाती हैं और यही उनके मरने की वजह है.

इन गोरक्षकों को असलियत से वाकिफ कराने के लिए दलितों ने एक अनूठी रैली निकाली. रैली में सैकड़ों दलितों ने हिस्सा लिया. यह वाधवान में एक दलित के घर से 10 मई को शुरू हुई और भोगावो नदी के पार सुरेंद्रनगर में कलेक्टर कार्यालय पहुंची. रैली में उन्होंने गायों के पेट से निकला प्लास्टिक का बाकायदा डिस्प्ले किया.

प्लास्टिक गाय

रथिन दास/ कैच न्यूज़

यह रैली आम रैलियों जैसी नहीं थी. एक ट्रैक्टर पर लकड़ी के पोलों पर सूखी प्लास्टिक के बंडलों का डिस्प्ले किया गया था. यह प्लास्टिक मरी गायों की खाल उतारने के दौरान उनके पेट से निकली थी. चमड़ी उतारने की तय जगह नतूभाई परमार के घर से 8 किलोमीटर दूर है. परमार नवनिर्माण सार्वजनिन ट्रस्ट के सदस्य हैं. उन्होंने ही इस नायाब रैली का आयोजन किया था. रैली दो जुड़वां शहरों से होकर निकली थी.

पोल से लटका सूखी प्लास्टिक का हर बंडल गाय के पेट से निकला था. बुधवार के दिन प्लास्टिक के चार बंडल डिस्प्ले किए गए थे. उनका वजन 20 से 36 किलो था. प्लास्टिक के बंडलों पर उनके वजन की पर्चियां चिपकी थीं. यह सूखी प्लास्टिक का वजन था. परमार कहते हैं, "जब प्लास्टिक का गुच्छा गाय के पेट से ताज़ा निकला था, उसमें नमी के कारण ज़्यादा वजन था." परमार अब मृत गायों की चमड़ी उतारने का काम नहीं करते. इस रैली में प्रदर्शन के लिए उन्होंने प्लास्टिक पिछले कुछ महीनों में इकट्ठा किया था.

नतूभाई ने कैच को बताया, "शहरी इलाकों में मरने वाली लगभग हर गाय के पेट से काफी मात्रा में प्लास्टिक निकलता है. अब तक 60 किलो तक प्लास्टिक (सूखी हुई) निकल चुका है." उन्होंने आगे कहा, "अगर किसी गाय के पेट में प्लास्टिक नहीं है, तो वह निश्चित रूप से ग्रामीण परिवार की होगी. वे अपनी गायों को कभी खुले में चरने नहीं भेजते." दलितों ने ट्रैक्टर पर आठ फीट ऊंची धातु की गाय का भी डिस्पले किया. इस गाय के पेट में उन्होंने शहरी गायों के पेट से निकला 100 किलो प्लास्टिक भरा था.

प्लास्टिक पर रोक

रथिन दास/ कैच न्यूज़

सुरेंद्रनगर में कलेक्टर के कार्यालय तक पहुंचने के रास्ते में जितनी भी घोषणाएं, भाषण, नारेबाजी हुईं और पन्ने बांटे गए, उन सबकी एक थीम थी. गाएं बूचड़खानों से ज़्यादा प्लास्टिक खाने से मरती हैं. रैली में हिस्सा लेने वालों ने मांग की कि अगर गाय-प्रेमी सच में अपनी ‘माता’ को असमय मौत से बचाना चाहते हैं, तो प्लास्टिक पर पूरी रोक लगनी चाहिए. पर यह असंभव ही लगता है. जो बड़े व्यवसायी अपने माल के साथ इनका भी उत्पादन करते हैं, उनकी सरकार तक अच्छी-खासी पहुंच है.

रैली में एक और दिलचस्प बात देखने को मिली. प्लास्टिक के सैंपलों को गुजरात के 182 विधायकों को देने के लिए कांच की छोटी बोतलों में पैक किया गया. आंदोलनकर्ताओं ने मांग की कि विधायक ऐसा कानून बनाएं, जिसमें प्लास्टिक से मरने वाली गायों को गाय की हत्या माना जाए और इस हत्या के जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया जाए.

कलेक्टर कार्यालय पहुंचने के बाद रैली वालों ने प्लास्टिक गाय का मॉडल और प्लास्टिक बंडलों का ट्रेलर कार्यालय परिसर में रखा. उन्होंने कांच की वे बोतलें रेजिडेंट कलेक्टर को देते हुए अनुरोध किया कि वे इन बोतलों को राज्य के 182 विधायकों के पास पहुंचा दें. उन्हें मालूम होना चाहिए कि राज्य में गायों की अस्वाभाविक मौतों की असल वजह क्या है.

उन्होंने रेजिडेंट कलेक्टर को तांबे की एक प्लेट भी दी. इस पर एक ज्ञापन पत्र की नक्काशी की हुई थी. सरकार और सभी गाय-प्रेमियों को याद दिलाने के लिए कि ज्यादातर गाएं चारे और पानी के लिए भटकती हुईं प्लास्टिक खा जाती हैं और यही उनकी असमय मौत की वजह है.

First published: 13 May 2017, 10:38 IST
 
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