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देहरादून छावनी: त्रिकोणीय मुक़ाबले में भाजपा को मिल सकती है बढ़त

राजीव खन्ना | Updated on: 11 February 2017, 1:33 IST

देहरादून छावनी उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों का एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र है, पर राजनीतिक रूप से बहुत ही ढीला और लापरवाह. भाजपा के पुराने सिपाही हरबंस कपूर को कांग्रेस के सूर्यकांत धस्माना से कड़ी चुनौती झेलनी पड़ रही है. इस चुनावी जंग में स्वतंत्र उम्मीदवार अनूप नौटियाल भी हैं, जो अब तक राज्य में आप का चेहरा थे. अपेक्षाकृत कमजोर विकेट के बावजूद इस लड़ाई में उनकी स्थिति काफी निर्णायक हो सकती है.

हरबंस कपूर

राज्य में कपूर की राजनीतिक रूप से काफी मजबूत स्थिति है. वे अविभाजित उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में सात चुनाव जीत चुके हैं. अब वे अपनी देहरादून छावनी को दूसरी बार बचा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि 70 वर्षीय राजनेता की इच्छा थी कि भाजपा इस सीट पर उनके बेटे को टिकट दे. पर पार्टी या तो उन्हें या फिर किसी और को वोट देना चाहती थी. इसलिए वे एक बार फिर चुनाव में खड़े हुए हैं. 

कपूर इलाके के लोगों के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों के लिए जाने जाते हैं. जिन चुनावों में वे जीते हैं, उन सभी में ये संबंध ही उनके लिए तुरुप का पत्ता साबित हुए. लोगों ने उनकी कमजोरियों को अनदेखा किया और सिर्फ यह याद रखा कि वे उनके दुख-सुख में मौजूद रहे हैं. उन्हें पंजाबियों और मैदानी इलाके से इस निर्वाचन क्षेत्र में आए मतदाताओं का अच्छा-खासा समर्थन प्राप्त है. लोगों का कहना है कि इस इलाके में 22,000 पंजाबी मतदाता हैं. स्थानीय रामलीला में उनकी सक्रिय भागीदारी भी उनके हित में रहेगी. 

स्थानीय स्तर पर मतदाताओं को अपने काम की याद दिलाते हुए, कपूर नरेद्र मोदी की केंद्र सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर स्थानीय लोगों से समर्थन पाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. जिसे भाजपा ने बड़े स्तर पर खेला था. 

सूर्यकांत धस्माना

दूसरी ओर धस्माना बहुत ही तेज राजनेता हैं, जो पिछले पांच सालों से इस निर्वाचन क्षेत्र में काम कर रहे हैं. उन्हें गढ़वालियों का तो मजबूत समर्थन है ही, साथ ही अन्य समुदाय के लोगों में भी जगह बना ली है, खासतौर से गरीब और उपेक्षित वर्गों में. वे समाजवादी पार्टी नेता रह चुके हैं और इसके लिए उनके विरोधी उन पर इल्जाम लगाते हैं. 

कहा जाता है कि समाजवादी पार्टी ने ही उत्तराखंड के निर्माण और उस क्षेत्र के लोगों की भावनाओं का विरोध किया था, जहां के वे हैं. उनके विरोधी उस घटना की भी याद दिलाते हैं, जिसमें उनके सुरक्षाकर्मियों ने उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके घर को बचाने के लिए लोगों पर गोलियां चलाई थीं. इसमें दो लोग मारे गए थे. पर उनके समर्थक आश्वस्त हैं कि अब यह मुद्दा नहीं रहा. कोर्ट ने उन्हें दोषी नहीं पाया. 

अपनी तेज राजनीतिक तिकड़म से वे कपूर को कड़ी चुनौती दे रहे हैं. उनकी कैंपेनिंग विकास के मुद्दों के ईर्द-गिर्द है, खासकर संयुक्त विकास के. वे निर्वाचन क्षेत्र के सभी राजनीतिक घटनाक्रमों में हिस्सा लेने के लिए जाने जाते हैं. उन्हें प्रशासन से काम कराने की राजनीतिक चतुराई और काबिलियत का भी लाभ मिलेगा. 

अनूप नौटियाल

चुनावी जंग के तीसरे खिलाड़ी नौटियाल ने जन-मुद्दों पर मेहनत करके अपना मजबूत आधार बनाया है. वे आप की ओर से रोजाना स्थानीय आंदोलन कर रहे थे. देहरादून में एक स्थानीय दैनिक के प्रमुख ने कहा, ‘हमारे पहले पन्ने पर अक्सर उनकी फोटोज लगती थीं.’ वे मतदाताओं से स्वच्छ राजनीति का वादा कर रहे हैं. उन्होंने उनसे इस हलफनामे के साथ संपर्क किया है कि जीतने के बाद वे किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ नहीं रहेंगे और स्वतंत्र रूप से जन-मुद्दों के लिए कोशिश करते रहेंगे.

देहरादून छावनी का निर्वाचन क्षेत्र 2012 में बना था. 2002 में इसे देहरादून कहते थे और परिसीमन के बाद इसकी प्रोफाइल बड़े स्तर पर बदल गई. यह प्रमुख रूप से मध्यम वर्ग का इलाका है, जिसमें वसंत विहार क्षेत्र भी शामिल है. वसंत विहार में शीर्ष राजनेता रहते हैं. यहां नई बस्तियां भी हैं, जो आधारभूत सुख-सुविधाओं की मांग कर रही हैं. 15 फरवरी को वोट करते समय एक मतदाता लाल सिंह गुजर के जेहन में सबसे ऊपर नागरिक चिंताओं का सवाल रहेगा. उनका मानना है कि कपूर को अपनी लाठी किसी और को सौंप देनी चाहिए.

निर्वाचन क्षेत्र पर हमेशा से भाजपा का वर्चस्व रहा है. इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि कपूर ने कांग्रेस उम्मीदवार को पिछली बार 5,095 वोटों से हराया था, जबकि मैदान में 10 उम्मीदवार थे. कांग्रेस की कमी यह रही कि उसने इस सीट पर हमेशा नया चेहरा खड़ा किया और सभी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र से थे. इस बार भी यही कहानी है.  

कई इलाकों के मतदाता अब शिकायत कर रहे हैं कि यहां पोश कालोनियों की तुलना में स्वच्छता, बिजली और पानी की पूरी व्यवस्था नहीं है. उनका कहना कि यहां नई सडक़ें, उचित जल निकासी की व्यवस्था और इंदिरा नगर में सोलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट अब भी अधूरा है.

छोटे कारोबारी और जो रियल एस्टेट सेक्टर में हैं, भाजपा से नोटबंदी को लेकर नाराज हैं. एक बिल्डर ने कहा, ‘मेरे ऑफिस में 20 से 8 लोग रहे गए हैं. लघु काल के प्रोपर्टी बिजनेस के लोगों ने अब बेकरियां या छोटे रेस्टोरेंट खोल लिए हैं. इस बार वोटिंग पर इन सबका असर पड़ेगा.’ जब मतदान होगा, मतदाता राज्य की अस्थाई राजधानी में जिस तरह के हालात हैं, उस पर भी अपने विचार व्यक्त करेंगे.

First published: 11 February 2017, 8:09 IST
 
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