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नोटबंदीः तृणमूल के अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष कशमकश में

चारू कार्तिकेय | Updated on: 12 December 2016, 7:49 IST
QUICK PILL
  • नोटबंदी पर मोदी सरकार को घेरने में लगीं पश्चिम बंगाल की सुप्रीमो ममता बनर्जी की पार्टी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का मन बना रही है. 
  • वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने का कोई मतलब नहीं है. यह एक तरह से सरकार को पीछे के रास्ते से निकल जाने का मौक़ा देना होगा. 

नोटबंदी को लेकर तृणमूल कांग्रेस केंद्र सरकार को पूरी तरह से घेरने की तैयारी में है. सरकार के इस कदम पर विरोध की अगुवाई करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने जैसे बयान देने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस शायद इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है. हालांकि इसका शायद ही कोई बहुत बड़ा प्रभाव पड़े, हो सकता है यह केवल नाम मात्र का विरोध बनकर ही रह जाए.

तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने 9 दिसम्बर को संसद में पत्रकारों को कहा था कि वे नोटबंदी पर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रसताव लाने की तैयारी कर रहे हैं. चार दिन की छुट्टी के बाद जब दोबारा लोकसभा की बैठक होगी तब यह प्रस्ताव लाया जाएगा. विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाने का मतलब होता है कि मौजूदा सरकार में संसद ने अपना विश्वास खो दिया है, लिहाजा, वह इस्तीफा दे.

पहली बात तो यह प्रस्ताव लाना ही इतना आसान नहीं है. केवल लोकसभा में यह प्रस्ताव लाया जा सकता है और इसके लिए पहले अध्यक्ष की अनुमति लेनी होती है. इसमें कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन मिलना जरूरी है. इसके बाद सदन में इस प्रस्ताव पर बहसें होती हैं और वोट किया जाता है. अगर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में बहुमत में वोट पड़ता है तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है. 

अड़चनें

तृणमूल कांग्रेस की अगर बात की जाए तो यह प्रस्ताव लाने में उसे ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी, क्योंकि उसके अपने ही 34 सांसद हैं. अगर यह प्रस्ताव लाती है और अध्यक्ष इसे पढ़ने की अनुमति दे देते हैं तो इसे 16 और सांसदों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. 

सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के 44 सदस्यों में से 16 का समर्थन मिल सकता है. इसके अलावा सीपीआई (एम) के 9, सीपीआई के 1, आप के 4, राजद के 4, वाईएसआरसीपी के 9 और एनसीपी के 6 सांसद मिलाकर भी प्रस्ताव के लिए जरूरी 16 की संख्या जुटा सकते है.

बड़ी समस्या यह है कि इस प्रस्ताव का हश्र क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता क्योंकि निचले सदन में सरकार बहुत ही भारी बहुमत में है. अगर प्रस्ताव गिर जाता है तो तृणमूल के हाथ क्या लगेगा? बस यही कि नोटबंदी का विरोध करने में तृणमूल ने कोई कसर नहीं छोड़ी, यहां तक कि वह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक ले आई. लेकिन इसे कोई बड़ी सफलता माना जाएगा?

विपक्ष में एका नहीं

चूंकि अभी तृणमूल की यह योजना शुरुआती स्तर पर है. इसलिए पार्टी ने फिलहाल इस पर साथ देने के लिए किसी अन्य पार्टी से बात ही नहीं की है. कांग्रेस और सीपीआई (एम) के इस प्रस्ताव पर समर्थन करने की उम्मीद कम ही है, क्योंकि वे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार के धुर विरोधी हैं.

और तो और, राज्य में वे सरकार के इतने विरोधी हो चुके हैं कि हाल ही में विधानसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए थे. प्रस्ताव गिर गया लेकिन इससे सरकार और विपक्ष के रिश्तों में अच्छी खासी खटास आ गई. कांग्रेस और सीपीआई (एम) दोनों ही दल इसीलिए संसद के शीतकालीन सत्र की शुरूआत में ममता बनर्जी की अगुवाई में राष्ट्रपति भवन तक निकाले गए मार्च में शामिल नहीं हुए.

बाद में जरूर संसद के भीतर ही किसी मुद्दे पर विरोध में तृणमूल, सीपीआई (एम) और कांग्रेस को संसद में साथ देखा गया. लेकिन अविश्वास प्रस्ताव बिल्कुल अलग तरह की चीज है और यह किसी दूसरी पार्टी के बल पर नहीं लाया जा सकता.

इसका मतलब हारना तय है?

सीपीआई (एम) सांसद मोहम्मद सलीम ने कैच न्यूज को बताया अविश्वास प्रस्ताव लाने का सीधा सा मतलब है सरकार को पिछले दरवाजे से निकल जाने का रास्ता देना. बेहतर है, इस मामले की जेपीसी जांच हो. साथ ही उन्होंने कहा, 'हम चाहते हैं इस मु्द्दे पर सारा विपक्ष सरकार के खिलाफ संसद में एकजुट हो. आपसी सहमति हो तो हम हर तरह के विरोध में साथ देने को तैयार हैं.'

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने साफ कहा अविश्वास प्रस्ताव लाने का मतलब है अपनी हार को बुलावा देना. उन्होंने कहा, 'हमारी पार्टी लोकसभा में कह चुकी है कि इस बारे में नियमानुसार कोई निर्णय किया जाना चाहिए. सरकार को यह जताना होगा कि वह इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और हमारे नेता राहुल गांधी को बालने दिया जाए.'

तृणमूल के साथ पहले भी ऐसा हो चुका है

गौरतलब है तृणमूल कांग्रेस इससे पहले भी अविश्वास प्रस्ताव ला चुकी है. 2012 में यूपीए गठबंधन से नाता तोड़ने के बाद ममता बनर्जी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाई थी. वे उस वक्त सरकार के कुछ निर्णयों से सहमत नहीं थी, जिनमें सब्सिडी वाले गैस सिलेण्डरों पर रोक, डीजल की कीमतों का बढ़ना और खुदरा में एफडीआई को बढ़ावा जैसे निर्णय शामिल थे. 

हालांकि उस वक्त तृणमूल का यह प्रयास सफल नहीं हुआ क्योंकि उसके पास अविश्वास प्रस्ताव के लिए आवश्यक समर्थन नहीं था. उस समय तृणमूल के लोकसभा में केवल 19 ही सांसद थे और आवश्यक 31 और सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाई.

वहीं तृणमूल के प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रॉयन ने कहा, ‘अभी यह तय नहीं है कि पार्टी अविश्वास प्रस्ताव लाएगी कि नहीं. बुधवार को संसद में विपक्षी दलों की बैठक में सब कुछ तय किया जाएगा.’

First published: 12 December 2016, 7:49 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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