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उप्र में हार के बावजूद गुजरात में कांग्रेस की चुनावी कमान संभाल सकते हैं पीके

आकाश बिष्ट | Updated on: 27 March 2017, 8:16 IST


उप्र और उत्तराखंड में स्पष्ट और मजबूत जनादेश हासिल करने से ख़ुश भाजपा अब गुजरात में पहले ही विधान सभा चुनाव की तैयारी कर रही है. भाजपा का इरादा नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार होकर नैया पार करने का है. वर्तमान विधान सभा का कार्यकाल दिसम्बर 2017 में खत्म हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि भगवा पार्टी समय से छह माह पहले ही विधान सभा भंग कर सकती है ताकि वह लगातार पांचवें कार्यकाल के लिए सत्ता में बनी रह सके.


हालांकि, कांग्रेस का कहना है कि समय से पहले चुनाव कराने की योजना निराशा और मायूसी का संकेत है और यह भी कि तथाकथित मोदी लहर के बाद भी वह राज्य में अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि यह इतना ही आसान होता तो भाजपा समय से पहले ही क्यों चुनाव कराना चाहती है. कांग्रेस नेताओं का यह भी कहना है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी का सामना करने को तैयार है. मोदी के साथ ही उसके चीफ मिनिस्टर फेस की लहर ज्यादा दिनों तक नहीं रहने वाली है.

उम्मीदवारों की तलाश शुरू


कांग्रेस नेता अर्जुन मोधवाडिया कहते हैं कि हम आज से प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं. इसके पहले आखिरी क्षणों में नामों की घोषणा की जाती थी लेकिन इस समय हमें अगले दो महीनों में प्रत्याशियों की अंतिम सूची निकाल देनी चाहिए. यदि चुनावों की घोषणा पहले ही कर दी जाती है तो हम इसके लिए तैयार रहें.


वास्तव में, गुजरात के प्रभारी महासचिव गुरुदास कामत ने आसन्न विधान सभा चुनावों में पार्टी की रणनीति को लेकर अहमदाबाद में एक बैठक बुलाई थी. बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और टिकट चाहने वाले लगभग 1,500 कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था. इसके पहले कामत ने प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप दिए जाने के संकेत दिए थे ताकि पार्टी के समर्थन में लोगों को एकसाथ लाने में पर्याप्त समय मिल सके.


बैठक के दौरान कार्यकर्ताओं ने उन मुद्दों के बारे में भी बताया जिन मुद्दों को उभारकर भाजपा को दरकिनार किया जा सकता है. मोधवाडिया कहते हैं कि ये मुद्दे किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, बेराजगारी, कानून और व्यवस्था, दलितों और पाटीदारों पर अत्याचार, भ्रष्टाचार, निजी घरानों द्वारा किसानों की अधिग्रहीत भूमि का समुचित मुआवजा आदि की तरह के हैं. इन मुद्दों को चुनावी रणनीति के तहत प्रमुखता से उठाया जाएगा.

 

बने रहेंगे पीके


अपनी चुनावी रणनीति अभियान को बढ़ावा देते हुए पार्टी नेतृत्व अपने रणनीतिकार प्रशान्त किशोर को गुजरात में भी लाने की तैयारी में हैं. पंजाब में पीके की रणनीति सफल रही थी. राज्य के एक अन्य वरिष्ठ नेता का दावा है कि पीके गुजरात के बारे में पहले से ही अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने ही मोदी के लिए काम किया था. उनके अनुभवों का हमें लाभ मिलेगा और लम्बे समय से सत्ता पर काबिज भाजपा राज्य के खात्मे की कोशिशों में हम और ज्यादा ताकतवर होंगे.


कांग्रेस के एक और कद्दावर नेता और पार्टी के सम्भावित मुख्यमंत्री शंकर सिंह बघेला ने भी उन चुनावी रणनीतिकार की सेवाएं हायर किए जाने की सिफारिश की है जिन्होंने वर्ष 2012 और 2014 में भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यदि पीके को गुजरात में पार्टी का रणनीतिकार बनाया जाता है तो यह सम्भव है कि वह पार्टी नेतृत्व से चुनाव के पहले अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित करने को कहें. वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच रणनीति बनाने के लिए काफी मुफीद हैं. पंजाब में यह देखा भी गया है. हालांकि, उत्तराखंड में उनका यही प्रयोग विफल साबित हो गया. यहां हरीश रावत को पार्टी का चेहरा बनाया गया था.

 

 

कौन होगा मुख्यमंत्री उम्मीदवार?

 

कुछ लोगों का मानना है कि वाघेला पीके की वकालत इसलिए भी कर रहे हैं ताकि पार्टी उन्हें भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दे और उन्हें इसका लाभ मिल सके. हालांकि, वघेला सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल न होने की बात कह चुके हैं, पर कोई भी इसे गम्भीरता से नहीं ले रहा है. उनके आलोचकों का कहना है कि वाघेला ने पार्टी नेतृत्व को जीत का भरोसा दिया है, यदि पार्टी का नियंत्रण उनके हाथ में दे दिया जाए और टिकटों का वितरण पूरी तरह उनकी ही इच्छानुसार हो.

 

मोधवाडिया कहते हैं कि गुजरात की स्थितियां पंजाब से अलग हैं. हमारे यहां मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित करने की कोई नीति नहीं रही है. हमने कर्नाटक का चुनाव मुख्यमंत्री का नाम घोषित किए बिना ही जीता था लेकिन यह सब कुछ आलाकमान के फैसले पर निर्भर करता है. कामत ने भी भाजपा का उदाहरण देते हुए यही बात दोहराई है कि भाजपा ने भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित किए बिना ही उ.प्र., उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में अपनी सरकार बना ली.


हालांकि, वघेला गुटबंदी के दलदल से जूझ रही कांग्रेस में अभी भी सबसे बड़े नेता हैं और वे विपक्ष के नेता भी हैं. भरत सिंह सोलंकी, शक्ति सिंह गोहिल और मोधवाडिया समेत अन्य से ज्यादा उनका कद है. वैसे अभी कुछ भी फाइनल नहीं किया गया है. कोई भी फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मौजदूगी में ही लिया जाना है.

 

कांग्रेस नेता इस बात पर भी विचार कर रहे हैं कि उसकी विचारधारा वाले दल जैसे कि एनसीपी और जद (यू) जैसे दलों से भी गठबंधन कर लिया जाए. राहुल की शरद पवार से मुलाकात के बाद कांग्रेस-एनसीपी में गठबंधन की सम्भावनाएं बढ़ी हैं और अटकलों को भी बल मिला है. इसी तरह की समझ पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के साथ भी बन रही है. हालांकि, इसका अभी तक खुलासा नहीं किया गया है. कांग्रेस के रणनीतिकार उन तक अपनी पहुंच बना रहे हैं. इस तरह की भी अटकलें हैं कि पार्टी युवा दलित नेता जिगनेश मेवानी से भी तालमेल कर सकती है.


कांग्रेस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता का कहना है कि हम भाजपा को हराने के लिए कुछ भी करेंगे. इसका अर्थ यह है कि हम धर्मनिरपेक्ष दलों से भी तालमेल कर सकते हैं. यदि मोदी और अमित शाह राज्य में बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियां करते हैं, जिस तरह उन्होंने उप्र में की थी, तो हम उनको कड़ी चुनौती देंगे. उन्हें सवालों के कठघरे में खड़ा करेंगे.

 

कांग्रेस कार्यकर्ता का यह भी कहना था कि मोदी की अपील उप्र के लोगों को लुभा सकती है क्योंकि मोदी ने उन्हें आश्वासन दिए थे, उनकी उम्मीदें बढ़ाईं थीं. लेकिन यहां के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं दिया है. वास्तव में देखा जाए तो पिछले पांच सालों में राज्य में तीन मुख्यमंत्री हो चुके हैं. यह भी उनके खिलाफ ही जाएगा.

First published: 27 March 2017, 8:16 IST
 
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