Home » राज्य » Drawing flak over namaz break, Harish Rawat announces prayer breaks for all
 

हरीश रावत की नमाज नीति: आलोचना के बाद बदला फैसला

आकाश बिष्ट | Updated on: 23 December 2016, 8:20 IST

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जब से मुसलमान कर्मचारियों के लिए सप्ताह में एक बार नमाज पढ़ने के लिए 90 मिनट के ब्रेक की घोषणा की है तब से राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल मची है.

यह निर्णय लागू होते ही भाजपा ने रावत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. रावत अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत कर फिर से सरकार बनाना चाहते हैं.

कांग्रेस की बेचैनी

रावत के इस एकतरफा फैसले से भाजपा ही नहीं उनकी अपनी पार्टी के लोग भी है हैरान हैं. मुख्यमंत्री के फैसले से किनारा करते हुए कांग्रेस पार्टी ने कहा, इस मुद्दे पर पार्टी से कभी कोई सलाह नहीं ली गई. कैच से बात करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा कि उन्हें इस बारे में मीडिया से जानकारी मिली और सच्चाई जाने के लिए उन्होंने तुरंत मुख्यमंत्री से सम्पर्क किया. उन्होंने कहा, 'पार्टी में इस फैसले पर कोई सलाह मशविरा नहीं लिया गया और लगता है कि मुख्यमंत्री को यह फैसला वापस लेना पड़ेगा.'

फैसले में किया बदलाव

चौतरफा आलोचना का सामना कर रहे मुख्यमंत्री ने दबाव में घोषणा की कि हर धर्म, जाति और नस्ल के सरकारी कर्मचारियों को त्यौहारों के दौरान कुछ समय का ब्रेक दिया जाएगा.

रावत के मीडिया सलाहकार सुरेन्द्र कुमार ने एक वक्तव्य जारी कर बताया, ‘सभी जातियों के कर्मचारियों को त्यौहारों और धार्मिक आयोजनों में पूजा पाठ के लिए विशेष छोटे इंटरवल देने की व्यवस्था की गई है. यह उसी कर्मचारी को मिलेगा जो इसके लिए आवेदन करेगा.'

कुमार के अनुसार, अलग-अलग धर्म व जाति के कर्मचारियों द्वारा छुट्टी मांगे जाने की बौछार के चलते यह फैसला लिया गया है.

भाजपा भी लड़ाई में कूदी

इस बीच, लोकप्रिय मुख्यमंत्री के खिलाफ एक मौका मिलते ही भाजपा ने सरकार पर हमला करना शुरू कर दिया. भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने कहा, ‘क्या मुख्यमंत्री राज्य में शरियत लागू करना चाहते हैं. मुख्यमंत्री को ‘देवभूमि’उत्तराखंड का नाम खराब करने के लिए माफी मांगनी चाहिए. हमने प्रदेश में ऐसी साम्प्रदायिक राजनीति कभी नहीं देखी.’

बलूनी ने कहा, 'मुख्यमंत्री ने जब देखा कि चारों ओर उनके फैसले की आलोचना हो रही है तो उन्होंने सभी कर्मचारियों के लिए विशेष इंटरवल की घोषणा की. रावत ने जनाक्रोश के सामने घुटने टेकते हुए अपना फैसला बदला. सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है कि लोगों में फैसले के प्रति कितना गुस्सा था.'

साम्प्रायिक पक्ष

कांग्रेस ने भाजपा के ऊपर मामले को राई का पहाड़ बनाने का आरोप लगाया है और भगवा पार्टी पर साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाया है. उपाध्याय ने कहा भाजपा ऐसी पार्टी है जो खुद साम्प्रदायिकता की राजनीति करती है. इसलिए उसे दूसरों पर उंगली उठाने का अधिकार नहीं है. अगर उन्हें कर्मचारियों को ऐसे छोटे इंटरवल देने पर एतराज है तो वे दिवाली, होली, ईद और क्रिसमस की छुट्टियां देना बंद कर दें.

चुनाव रणनीति

इस बीच, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री ने तराई के वोटरों को लुभाने के लिए यह फैसला किया, जहां काफी बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं. चूंकि कांग्रेस का गढ़वाल क्षेत्र में कोई खास जनाधार नहीं है, इसलिए वहां भाजपा के पक्ष में हवा को भांपते हुए रावत ने शायद अल्पसंख्यकों के कांग्रेस के पाले में लाने के लिए यह दांव चला है.

कांग्रेस से बगावत करके भाजपा में शामिल होने वाले 10 में से 9 विधायक गढ़वाल से हैं. इनमें विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत जैसे दिग्गज भी शामिल हैं. उत्तराखंड की कुल जनसंख्या में 14 फीसदी हिस्सा मुसलमानों का है और कांग्रेस के लिए उनका समर्थन बेहद जरूरी है.

हाल फिलहाल यहां उपाध्याय कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं और वह भी मुख्यमंत्री की कार्यशैली से खुश नहीं है. उन्होंने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गढ़वाल के लोगों को महत्वपूर्ण पदों से दूर रखा है. इससे पूर्व उन्होंने अपने करीबी प्रदीप टाम्टा को राज्यसभा के लिए नामांकित किए जाने पर आलोचना की थी.

टाम्टा कुमाऊं से आते हैं. उपाध्याय राज्यसभा में राज्य का प्रतिनिधित्व करना चाहते थे. तराई क्षेत्र की 23 विधानसभा सीटें देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और उधम सिंह नगर तक फैली हैं. पहाड़ी क्षेत्र के बजाय इन क्षेत्रों में जनसंख्या अत्यधिक है और किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए यहां जनाधार बनाना जरूरी है. पिछले विधानसभा चुनावों में यहां कांग्रेस और भाजपा ने 10-10 सीटें जीती थीं और बाकी तीन बसपा के खाते में गई थी.

रावत की कोशिशें

रावत को यहां 23 विधानसभा क्षेत्रों में पश्चिमी यूपी से लगते इलाकों में बसपा के पांव पसारने का भय सता रहा है. इन विधानसभा क्षेत्रों में बसपा सुप्रीमो मायावती के मुस्लिम-दलित कॉम्बिनेशन के फार्मूले का प्रभाव साफ देखा जा सकता है. माया ने यूपी में सपा व भाजपा को मात देने के लिए यह दलित-मुस्लिम कार्ड चलाया है. तराई ही नहीं मुख्यमंत्री रावत को कुमाऊं में भी जनाधार बढ़ाने की जरूरत है, जिसे सत्ता तक पहुंचने के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.

First published: 23 December 2016, 8:20 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी