Home » राज्य » Employment is the vote catcher in Uttarakhand & Harish Rawat is playing the cards well
 

उत्तराखंड: हर चुनाव में वोटरों के लिए नौकरी का झांसा

राजीव खन्ना | Updated on: 11 February 2017, 5:39 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में नौकरियां देने का वादा वोट बटोरने का आसान नुस्खा साबित हो रहा है. हर पार्टी चुनावों से पहले नौकरियां देने का वादा करती है लेकिन चुनाव जीतने के बाद वे इस दिशा में बहुत ही मामूली प्रयास करती हैं. मुख्यमंत्री हरीश रावत भी इस बार फिर से युवाओं को नौकरियों का प्रलोभन दे रहे हैं और चुनावी चाल को बखूबी अंजाम दे रहे हैं. 

रावत ने पंजाब में कांग्रेस के चुनाव प्रचार से प्रेरित हो कर यह कदम उठाया. पंजाब में कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में हर घर में 18 से 35 साल के युवा को नौकरी देने का वादा कर रही है और नौकरी दिए जाने में लगने वाले वक्त के दौरान हर पंजीकृत युवा को बेरोजगारी भत्ता देने क वादा भी कर रही है.

इस प्रकार के पंजीकरण और बेरोजगारी भत्ते के वितरण के कार्ड लॉन्च करने से हाशिए पर आई भाजपा ने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया है. भाजपा इसे आचार संहिता का उल्लंघन बता रही है. इसके बाद चुनाव आयोग ने कांग्रेस को एक नोटिस भेजा; इस पर पार्टी ने फिलहाल ‘बेरोजगारी भत्ता कार्ड’ के पंजीकरण का काम रोक दिया है. हालांकि पार्टी ने चुनाव आयोग को भेजे अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि वह इसे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन क्यों नहीं मानती.

आंकड़ों का खेल

कांग्रेस का दावा है कि बेरोजगारों के पंजीकरण के लिए दिए गए फोन नंबर पर हजारों की संख्या में कॉल आ रहे हैं. कांग्रेस प्रचार टीम के एक कार्यकर्ता ने कहा, ‘जब कोई हमसे व्यक्तिशः आकर मिलता है तो हम उसे सारी जानकारी विस्तार से भरने को कहते हैं.’

भाजपा में इस मुद्दे पर खलबली इसलिए मची है क्योंकि कथित तौर पर 57 फीसदी वोटर युवा हैं और किसी भी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए यह संख्या निर्णायक है. कांग्रेस के सूत्रों ने बताया अब तक रोजगार कार्ड के लिए फोन करने वाले लोगों की संख्या 45,000 पार कर चुकी है. 

वादे

अपने इस अभियान के तहत कांग्रेस प्रत्येक घर से 18 से 35 वर्ष के युवाओं को 2020 तक नौकरी देने का वादा कर रही है. रोजगार दिए जाने तक वे बेरोजगारी भत्ता कार्ड के जरिये 3 साल तक 2,500 रूपए प्रति माह का बेरोजगारी भत्ता देने का भी वादा करते हैं. पार्टी का कहना है कि युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा और इसके लिए उन्हें स्टाइपेन्ड भी दिया जाएगा.

सूत्रों का कहना है कि पार्टी पंजाब में हर घर मेंनौकरी देने के अपने कार्यक्रम में जरूर सफल होगी. कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर पार्टी के इस कार्यक्रम को उत्तराखंड में भी लागू करेगी. पंजाब में जहां इस योजना का नाम ‘हर घर तौं इक कैप्टन’’(हर घर से एक कैप्टन) है तो उत्त्राखंड में इसका नाम ‘हर संघ हरदा’ (हर घर से एक हरीश) है.

रावत कहते हैं कि यह केवल एक वादा नहीं, बल्कि संकल्प है-हम उत्त्राखंड के युवाओं को सशक्त और आत्म निर्भर बनाने के प्रति संकल्पित हैं. 

यह बेरोजगारी भत्ता कार्ड सक्रिय करवाने के लिए कार्ड धारक को अपने मोबाइल फोन से अपना यूनीक आई डी नंबर 9235002222 पर एसएमएस करना होगा. इसके बाद उन्हें एक चार अंको का कोड भेजा जाएगा.उसे वे अपने कार्ड के पीछे लिखेंगे. कांग्रेस कार्यकर्ता ने बताया एक बार एक्टिवेट किए जाने के बाद इस कार्ड के जरिये कार्ड धारक कौशल प्रशिक्षण और रोजगार भत्ते के लिए हरदा सरकार से सीधे सम्पर्क कर सकता है. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरह ही रावत ने भी प्रदेश के लिए 9 संकल्प सूत्र दिए हैं. 

पुरानी तिकड़म

राजनीतिक जानकार और अनुभवी लोगों का कहना है ऐसा पहली बार नहीं है,जब राज्य में बेरोजगारी का मुद्दा उठाया गया हो. पिछली बार भी कांग्रेस इसी एजेंडा पर जीत कर सत्ता में पहुंची थी. विजय बहुगुणा सरकार ने भी इस योजना को खत्म करने से पहले बेरोजगारी दिया था. सरकार ने पहले इस बेरोजगारी भत्ते की राशि 750 से 1500 रूपए प्रतिमाह से कम करके 500 से 1000 रूपए प्रतिमाह कर दी थी.

सरकार ने बेरोजगारी भत्ता देने के लिए कई शर्तें रखी हैं. उन्हीं में से एक है-बेरोगारी भत्ता पाने के लिए केवल वे ही युवा पात्र हैं जो 9 नवम्बर 2012 के बाद रोजगार कार्यालय में पंजीकरण के 4 साल पूरे कर चुके हों. साथ ही उनकी पारिवारिक आय सालाना 1 लाख रूपए से कम हो.

जमीनी स्तर पर सक्रियता

एक ओर बेरोजगारी भत्ता कार्ड जारी करने पर विवाद चल रहा है तो दूसरी ओर कांग्रेस और प्रशांत किशोर की टीम ने प्रतिदिन 10,000 घरों तक जनसम्पर्क का कार्यक्रम शुरू किया. कांग्रेस कार्यकर्ता घर-घर जा कर संदेश दे रहे हैं ‘‘उत्तराखंड रहे खुशहाल, रावत पूरे पांच साल’’. उधर, रावत अपनी उत्तराखंड स्वाभिमान यात्रा जारी रखे हुए हैं. 

राज्य में पहाड़ी जिलों में रोजगार के अवसर शुरु से ही कम रहे हैं. उत्तराखंड औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड के अन्तर्गत जितना भी औद्योगिक विकास हुआ, वह मैदानी और उधम सिंह नगर, देहरादून व हरिद्वार जिलों के तराई वाले क्षेत्रों में ही हुआ. निगम के अंचलों में ज्यादातर औद्योगिक इकाईयां एनडी तिवारी के शासन  काल में ही लगाई गईं लेकिन इन इकाईयों में कर्मचारी रोजगार की स्थिरता और कम तन्ख्वाह की शिकायत करते हैं.

देहरादून के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, इन उद्योगों के आने के बाद पहाड़ी लोग मैदानी इलाकों में विस्थापित हो गए क्योंकि अब तक कोई भी सरकार पहाड़ी इलाकों में उद्योग लगाने में सफल नहीं हो पाई है. इससे सामाजिक स्तर पर विषमताएं ही पनपी हैं. अब तक राज्य मंे सुरक्षा बलों में नौकरी ही जीविकोपार्जन का जरिया रहा है. उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही किए गए नोटबंदी के चलते इन औद्योगिक इकाईयों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा जो कि आर्थिक मंदी के चलते पहले ही समस्याओं से जूझ रही थी.

नोटबंदी के चलते रोजगार सृजन को भी झटका लगा है. पर्यटन उद्योग भी चरमरा गया है. 8 नवंबर के बाद यहां पर्यटन गतिविधियां बिल्कुल ना के बराबर रही. एक स्थानीय वाशिन्दे ने कहा ‘‘देहरादून मंे ही एटीएम कतारों में लगने से लोग परेशान हो गए थे तो सोचिए पहाड़ी इलाकों में क्या हाल हुआ होगा?’’

First published: 9 February 2017, 12:48 IST
 
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