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गुजरात में जल्दी चुनाव के आसार, भाजपा को कहां से मिल रही हैं चुनौतियां

दर्शन देसाई | Updated on: 28 March 2017, 12:23 IST

 

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जीत के बिना और दो दशक में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी के बिना ही दिसंबर में होने वाले गुजरात के विधानसभा चुनाव 1995 से लगातार राज्य की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत बड़ी चुनौती हो सकते थे.

गुजरात की विजय रूपानी सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है. बात करें चुनौतियों की तो इनमें सबसे प्रमुख है ओबीसी की श्रेणी में शामिल होने के लिए राज्य में दो साल से चला आ रहा पाटीदारों का आंदोलन. इसके अलावा पिछले साल उना में दलितों की पिटाई बाद उनमें भी बहुत अधिक आक्रोश है, किसानों में भी नाराजगी साफ देखी जा सकती है. सहकारी क्षेत्र में डिमोनेटाइजेशन के कारण कई समस्याएं देखी जा रही हैं. साथ ही हाल में राज्य के सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में हुए दुष्कर्म के मामले भी सिरदर्द बन सकते हैं. इसमें भी सबसे बड़ी चुनौती रहेगी राज्य में नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति.


बीजेपी के रणनीतिकारों को लगता है कि उत्तर प्रदेश में 325 सीटों की भारी जीत से पैदा हुए उत्साह के माहौल में गुजरात में चुनाव करा लिए जाएं तो ऐसे में वे सभी मुद्दे बौने साबित हो सकते हैं जो कि पिछले कुछ समय से रह—रहकर उठते रहे हैं. जबकि अगर दिसंबर तक चुनाव के लिए रुका जाता है तो उस समय तक मौजूदा उत्साह का माहौल बना नहीं रह पाएगा और मुख्यमंत्री विजय रूपानी उस सत्ता विरोधी लहर का शिकार हो सकते हैं जैसा कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ हुआ है.

 

उत्तर प्रदेश की लहर पर सवारी


देश का सबसे बड़ा प्रदेश झोली में आ जाने के बाद गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर काबिज भाजपा अब प्रदेश की 182 सीटों में से 150 को जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है. "यूपी में 325 और गुजरात में 150", यह वह मिशन संदेश है जो कि पीएम मोदी ने गुजरात में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को दिया है. गुजरात के बड़े शहरों में इस नारे के साथ होर्डिंग्स पहले ही लग चुके हैं जिनमें मोदी और अमित शाह की जोड़ी को दिखाया गया है.

रूपानी ने एनडीटीवी को बताया कि पूरे देश में मोदी की लहर है और चुनाव जल्दी होने की स्थिति में हम पूरी तरह से तैयार हैं और हम 150 से अधिक सीटें राज्य में जीतेंगे. कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह की बातें वे और प्रदेश के दूसरे नेता उत्तर प्रदेश के चुनाव के पहले और बाद में मीडिया से कहते रहे हैं.

क्यों मुश्किल है राह


लेकिन अगर हम इस तथ्य पर गौर करें कि 1995 से अब तक कांग्रेस को राज्य में 50 से 60 सीटें हमेशा मिलती रही हैं, राज्य में कितनी ही मजबूत हिदुंत्व लहर मौजूद रही हो. गोधरा के बाद भी यह स्थिति नहीं बदली थी. इसलिए मोदी लहर के होने पर भी 150 सीटों का टारगेट भाजपा के लिए अजेय जैसा प्रतीत होता है. फिलहाल 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 123 सीटें हैं और इसमें 57 सीटों पर कांग्रेस काबिज है. जबकि एक-एक सीट एनसीपी यानी नेशनेलिस्ट कांग्रेस पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के पास है.


पार्टी के रणनीतिकारों को लगता है कि उन्हें 150 के टॉरगेट के करीब तक पहुंचने के लिए कांग्रेस के अजेय गढ़ रहे क्षेत्रों को अपने पाले में लाना होगा. जानकारी के अनुसार इसके लिए पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह अपने स्वभाव के अनुसार कांग्रेस के अपराजेय विधायकों को अपनी तरफ लाने के लिए पहले ही कोशिशें आरंभ कर चुके हैं.

इसके साथ ही गुजरात में कोई नेटवर्क ही न रखने वाली एनसीपी की इस घोषणा को कि उनकी पार्टी प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, को भी अमित शाह की एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के साथ गुपचुप डील के परिणाम के रूप में ही देखा जा रहा है जिससे कि कांग्रेस के वोटों का बंटवारा किया जा सके. यहां तक कि एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने अहमदाबाद में पिछले ही सप्ताह अपना कार्यालय भी खोल दिया है.

 

चुनाव की पहले से तैयारी

 

इन सबको छोड़ भी दें तो भी भाजपा राज्य में चुनाव अभियान के मूड में पांच राज्यों के चुनाव से बहुत पहले से ही रही है. इसको इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले सितंबर माह के बाद से मोदी अब तक गुजरात की सात यात्राएं कर चुके हैं, जबकि मई 2014 में दिल्ली जाने के बाद से मोदी ने गुजरात में कुल 10 बार ही अब तक डेरा जमाया है.

इन यात्राओं में मोदी अपनी अनोखी वक्तृत्व शैली में जनसभाओं के माध्यम से पार्टी कैडर और आम जनता में उत्साह भरने के साथ पार्टी में राजनीतिक असंतोष को शांत करने और गुटों को अपने मतभेद भुलाकर चुनाव को ध्यान में रखकर पार्टी के लिए काम करने का आह्वान भी करते रहे हैं. जानकारी के अनुसार गुटों में झगड़ा ही वह मुख्य वजह थी जिसके कारण मोदी की प्रतिनिधि समझी जाने वालीं आनंदीबेन पटेल को जाना पड़ा और अमित शाह के उम्मीवार माने जाने वाले विजय रूपानी को राज्य की कमान मिल गई.


हाल ही में 19 फरवरी को पार्टी ने राज्य में 12 दिवसीय आदिवासी गौरव यात्रा दक्षिण गुजरात के उनाई से उत्तर के अंबाजी तक निकाली जिसमें ट्राइबल बेल्ट को कवर किया गया. यह यात्रा आदिवासी बहुल 27 विधानसभा क्षेत्रों से निकली और इसने 1500 किमी की दूरी तय की.

आदिवासियों को टारगेट करने के पीछे उद्देश्य यह समझा जाता है कि इससे पार्टी का साथ छोड़ रहे पाटीदारों (पटेल) के कारण होने वाले वोटों के नुकसान की भरपाई की जा सकेगी. राज्य की आबादी में पटेलों का हिस्सा 12 प्रतिशत से कुछ अधिक है जबकि आदिवासियों का हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत. पिछले दो चुनावों को देखें तो ट्राइबल बेल्ट में भाजपा को पैर रखने की जगह तो मिल गई है पर यह क्षेत्र अब भी कांग्रेस का ही मजबूत गढ़ समझा जाता है.

पटेल अगर 24 सीटों पर परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं तो 27 सीटों पर ट्राइबल वोटों से परिणाम प्रभावित होते हैं. इस तरह शोर को देखें तो लगता तो यही है कि गुजरात में समय से पूर्व चुनाव होने जा रहे हैं.

 

First published: 28 March 2017, 9:29 IST
 
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