Home » राज्य » Gujarat Dalits to take on MPs, MLAs enjoying political reservation to spell out their stand on issues
 

गुजरात में आकार लेता दलित आंदोलन, सांसद और विधायकों का घेराव

राजीव खन्ना | Updated on: 31 May 2017, 13:02 IST

गुजरात में दलित समुदाय में एक नई तरह की लामबंदी देखी जा रही है. दलित नौजवानों का एक ऐसा वर्ग सामने आया है जो खुद ही जोखिम उठाकर अपने हक के लिए आगे आ रहा है. ये युवा कुछ कर गुजरने को आतुर है. उन्हें लग रहा है कि उनके वोट से बनी सरकारें उनका शोषण नहीं रोक पा रही हैं और न ही उन्हें सत्ता में भागीदारी दिला पा रही हैं.

गुजरात में दलितों ने ऊंची जातियों, विशेषकर संघ परिवार के जुड़े लोगों के अत्याचारों के खिलाफ लड़ाई को एक नया आयाम देते हुए 3 जून से पूरे राज्य में विरोध-प्रदर्शन रैलियों को निकालने का फैसला किया है. इस कार्यक्रम में नयापन यह है कि इस वक्त राज्य का दलित नेतृत्व कई अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर दलित समुदाय के अपने विधायकों और सांसदों से पूछेगा कि उन्होंने डॉ अंबेडकर की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया.

इसके अलावा स्वयंभू गौरक्षा समिति के सदस्यों द्वारा दलितों के खिलाफ हिंसा की जो घटनाएं गुजरात और देश के दूसरे हिस्सों में की जा रही हैं, वह दलितों के खिलाफ हैं और उन्हें हाशिए पर डालने वाली हैं, इस बारे में वे खुलकर जवाब दें कि उन्होंने क्या किया?

ये लोग गुजरात में अपनी समस्याएं उठाने के अलावा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हाल के दंगों की पृष्ठभूमि से भी रूबरू हो रहे हैं और साथ ही उन कारणों से भी, जिनसे देश के बाकी हिस्सों में दलित अधिकारों पर असर पड़ सकता है. विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं ने एक संगठन बनाया है जिसके बैनर तले वे गुजरात में 16 जगहों पर विरोध प्रदर्शन करेंगे. इस नई इकाई का नाम डॉ. अम्बेडकर वचन प्रतिबंध समिति है.

 

बढ़ती नाराज़गी

वयोवृद्ध दलित कार्यकर्ता मार्टिन मैकवान कैच न्यूज से बातचीत करते हुए कहते हैं कि पिछले साल गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में उना कस्बे जैसी घटनाओं, जिसमें गौ सतर्कता समिति के सदस्यों ने दलितों को सार्वजनिक रूप से बेरहमी से मारा पीटा था, लोग काफी नाराज हैं. इस मुद्दे को पूरे देश से समर्थन मिला था. दलितों को ऐसे ही समर्थन की सहारनपुर में भी जरूरत है जहां दलितों को निशाना बनाया गया है. यहां के लोग उग्र हैं, जबकि राजनीतिक नेतृत्व शांत हो गया है, ठीक उसी तरह से जिस तरह से उना की घटना के मामले में हुआ था.

वह आगे कहते हैं कि गांवों में दलित समुदाय में बहुत आक्रोश है. उनके कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यही है कि उन्होंने जिन दलित प्रतिनिधियों को विधायिका में भेजा है, उनसे पूछा जाए कि उनका इन मुद्दों पर क्या रुख है. ये वही लोग हैं जो आरक्षित क्षेत्र से निर्वाचित किए जाते हैं. वर्तमान परिदृश्य में यह डॉ. अम्बेडकर के उन आदर्शों के खिलाफ है जिसके लिए उन्होंने राजनीतिक आरक्षण का प्रावधान किया था. इस आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि वे नीचे लोगों के उत्थान के लिए काम कर सकें.

मार्टिन साहब आगे कहते हैं कि इन रैलियों का एक अन्य उद्देश्य लोगों को उन ताकतों के प्रति जागरूक करना है जो डॉ. अम्बेडकर को मुस्लिम विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. यह हिन्दुत्ववादी संगठनों का ढोंग है जिसे उजागर करने की जरूरत है. उत्तर प्रदेश में हाल के दंगों के बाद उन्होंने एक स्थान पर डॉ. अम्बेडकर की शोभा यात्रा निकाली जहां वे 'योगी-योगी कहना होगा' और 'जय श्री राम' जैस नारे लगाते हैं और दूसरी जगह वे 'अम्बेडकर मुर्दाबाद' के नारे लगाते हैं.

चुप्पी क्यों?

दलित हितों की दिशा में काम करने वाले एक अन्य वरिष्ठ दलित कार्यकर्ता नाटूभाई परमार, जो नवनिर्माण सार्वजनिक ट्रस्ट के प्रमुख हैं, कहते हैं कि हम 13 विधायकों और 03 सांसदों चाहे वे कांग्रेस के हों या भाजपा के, से यह पूछने जा रहे हैं कि दलित अत्याचारों की लगातार हो रही घटनाओं पर वे अभी तक चुप्पी क्यों साधे रहे हैं.

वह कहते हैं कि हमारा विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम 3 जून को अहमदाबाद के धंधुका के निकट झांझारका से शुरू होगा जहां हम भाजपा के राज्यसभा सदस्य शंकर प्रसाद टुंडिया से स्पष्टीकरण मांगेंगे. वह दलितों के धार्मिक गुरु माने जाते हैं. वह कहते हैं कि इसके बाद हम गढ़ा, राजकोट, कडी, अहमदाबाद, इदर, दासदा, पाटण और वडोदरा में भी इसी तरह का कार्यक्रम करेंगे. इन सीटों का प्रतिनिधित्व दलित सांसद और विधायकों करते हैं. बाकी बचे दलित प्रतिनिधियों के लिए सवाल डाक से भेजे जाएंगे और उनसे जवाब मांगा जाएगा.

वह यह भी रेखांकित करते हैं कि सात दशक की आजादी के बाद भी तथ्य यही है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने सिर्फ डॉ अंबेडकर का नाम और उनकी विरासत का इस्तेमाल किया है. वास्तव में इन लोगों ने उन्हें चुनावी बाजार में बेच दिया है. आरएसएस, जिसकी विचारधारा पूरी तरह से डॉ. अम्बेडकर की धारणाओं के विपरीत रही है, आज राजनीतिक लाभों के लिए उन्हें अपनाने की कोशिश कर रही है. 

 

कई सारे सवाल

 दलित कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से उन मुद्दों पर ध्यान दिया है जिन पर वे दलित निर्वाचित प्रतिनिधियों से साफ-साफ जवाब चाहते हैं.

 परमार कहते हैं कि इन सवालों में सबसे पहला सवाल गौरक्षा समिति द्वारा उना की घटना को अंजाम देने के बारे में है. सांसदों और विधायकों को जवाब देना चाहिए कि उन्होंने इन गौरक्षा दलों के सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने के लिए न केवल गुजरात बल्कि पूरे देश में क्या किया है? परमार कहते हैं कि ये गौरक्षा सदस्य दलित और मुस्लिम समुदायों के लोगों को सता रहे हैं. इन तत्वों द्वारा लोगों को मार डालने की नियमित खबरें आ रही हैं.

दूसरा मुद्दा राज्य के सुरेंद्रनगर जिले में वर्ष 2013 की थांगड़ घटना से जुड़ा हुआ है. इस घटना में फायरिंग में तीन दलित युवा मारे गए थे. दलित और मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार द्वारा गठित संजय प्रसाद समिति की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए. गुजरात उच्च न्यायालय ने भी गुजरात सरकार पर कड़ी टिप्पणियां खड़ी कीं, लेकिन इस मामले पर को विलम्बित रखा गया है.

दलितों द्वारा उठाया गया तीसरा मुद्दा उत्तरप्रदेश में हिन्दुत्ववादी तत्वों द्वारा दलित विरोधी, डॉ अम्बेडकर और संत रविदास से जुड़ी भावनाओं को उत्तेजित करने से ताल्लुक रखता है. सहारनपुर की हाल की रैली में उच्च जातियों द्वारा इन महापुरुषों के खिलाफ नारे लगाए गए जिससे भी दलितों में गुस्सा है.

 परमार यह भी कहते हैं कि हम यह भी जानना चाहते हैं कि इन अत्याचारों के चलते गांवों से दलितों के लगातार पलायन को रोकने के लिए इन प्रतिनिधियों ने क्या किया है? इसके अलावा उन्हें इस तथ्य का भी जवाब देने की जरूरत है कि गुजरात के विभिन्न हिस्सों में सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये के बावजूद हाथ से साफ-सफाई का काम क्यों जारी है?

दलितों का कहना है कि प्रधानमंत्री के लम्बे-चौड़े दावों के बाद भी गुजरात में मैनुअल साफ-सफाई, कूड़ा उठाने का काम लगातार चल रहा है. उनका यह दावा हवा में उड़ता दिखाई देता है. यह हालात तब है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विकास के बहुत सारे काम -गुजरात मॉडल- के नाम पर कर रहे हैं और सरकार के स्वच्छ भारत अभियान का गुणगान गाया जा रहा है.

दलित यह भी चाहते हैं कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में मैनहोलो में गिरकर मजदूरों की लगातार मौतों पर भी सांसदों और विधायकों को अपना रुख साफ करना चाहिए. स्थानीय निकाय युवा दलितों को आउटसोर्स करती हैं. इस वजह से युवा दलितों को बहुत कम रुपए में यह काम करना पड़ता है.

मैनहोल के भीतर जाने पर उनकी अक्सर जहरीली गैसों की वजह से मौत भी हो जाती है. उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती. मौत हो जाने पर स्थनीय निकाय अपने हाथ खड़े कर लेते हैं. उनके परिवारों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलता है. अक्सर ये दलित शिक्षित होते हैं जो जीवन-यापन के अच्छे अवसरों से वंचित होते हैं.

परमार कहते हैं कि दलितों का भूमि अधिकारों का मुद्दा भी आड़े आता है. सरकार द्वारा दलितों को आवंटित भूमि पर कई जगहों पर ऊंची जातियों के लोगों ने कब्जा कर लिया है. इन जमीनों को खाली कराने के लिए सरकार के स्तर से कोई कार्रवाई नहीं होती है। हम अपने नेताओं से यह चाहते हैं कि वे हमें बताएं कि हमने विभिन्न मौकों पर उन्हें जो ज्ञापन दिए हैं, वे उस ज्ञापन पर क्या कर रहे हैं?

परमार भरोसे के साथ यह भी कहते हैं कि दलितों को इन रैलियों में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा, मुसलमानों और हाशिए पर रहे अन्य समुदायों का भी समर्थन मिलेगा.

जिन नेताओं के कार्यालयों और घरों पर विरोध रैलियों का आयोजन किया जाना है, उनमें शंभू प्रसाद टुंडिया, आत्माराम परमार, रमनलाल वोरा, पूनम मकवाना, डॉ किरीट सोलंकी, भानुबेन भाबरिया समेत कुछ अन्य नेताओं के घर, कार्यालय भी शामिल हैं.

First published: 31 May 2017, 11:10 IST
 
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