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गुजरात: दंगे और गौ हत्या कानून से तैयार है विधानसभा चुनाव की सांप्रदायिक पृष्ठभूमि

राजीव खन्ना | Updated on: 4 April 2017, 10:46 IST


एक बात साफ है कि गुजरात में भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ेगी. उदाहरण के लिए इन तीनों घटनाक्रमों को देखें— गौ हत्या पर सजा बढ़ाए जाने वाले विधान को लाने का तरीका, पाटन में हाल के दिनों में होनी वाली सांप्रदायिक हिंसा और विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित किया गया विराट हिंदू सम्मेलन. ऐसा लगता है कि हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जाने वाला गुजरात सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर अग्रसर है.

विधानसभा में एक्शन

 

विजय रुपाणी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने हाल में जो गुजरात एनीमल प्रिजर्वेशन (संशोधन) बिल, 2017 पारित किया है उसमें गौहत्या पर अधिकतम सजा 3 से 7 वर्ष से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी गई है. नये कानून में गौहत्या पर जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है, जो कि अधिकतम 5 लाख रुपये रखा गया है पर वह न्यूनतम एक लाख से कम नहीं हो सकता.

बीफ के परिवहन, बेचने और उसका स्टॉक जमा करने पर अधिकतम 5 लाख जुर्माने के साथ अधिकतम 10 साल की सजा रखी गई है जो कि किसी तरह से 5 साल से कम नहीं हो सकती. इस कानून के अंतर्गत किया गया अपराध संज्ञेय होगा और इसके गैर जमानती बनाया गया है. यही नहीं, कानून में शाम को 7 बजे से सुबह पांच बजे के बीच गाय—गोरू आदि जानवरों के किसी भी तरह के परिवहन पर रोक लगा दी गई है, लीगल परमिट से भी नहीं.

शुक्रवार को जिस तरीके से राज्य की विधानसभा में यह कानून पारित किया गया, उसके कई रोचक पहलू हैं. पर्यवेक्षकों का कहना है कि एक बार फिर सरकार ने विधानसभा के अंतिम दिन बिल पारित कराया है, जबकि विपक्ष सदन से अनुपस्थित था. इसके पूर्व दिन में कांग्रेस के सदस्यों को निलंबित किया गया था. कांग्रेस के सदस्य भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा एक दिन पूर्व उन पर की गई टिप्पणी के विरोध में सदन में शोरगुल कर रहे थे. शाह अहमदाबाद की नारनपुरा विधानसभा सीट से विधायक हैं. जबकि यह बिल पारित हुआ उस समय एक तरफ सदन से विपक्ष अनुपस्थित था तो दूसरी तरफ दर्शक दीर्घा केसरिया वस्त्रों पहने साधुओं से भरी हुई थी.


दूसरी बात यह कि सरकार ने उम्रकैद का प्रावधान रुल बुक के एक क्लॉज का इस्तेमाल कर अंतिम समय में जोड़ा. सूत्रों का कहना है कि जो मसौदा विचार के लिए वितरित किया गया था उसमें सिर्फ 10 साल की कैद का प्रावधान था. उम्रकैद के प्रावधान को शामिल किए जाने से सभी भौंचक्के रह गए.


जानकार लोग इस रोचक तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि गुजरात का कानून गौशालाओं में दर्जनों की संख्या में गायों की होने वाली उस मौत के बारे में चुप है जो कि उस जहरीली घास को खाने से होती है जो कि कैमिकल फैक्ट्रियों द्वारा समय—समय पर अपने आस—पास के क्षेत्र से हरियाली काटने के दौरान यहां फेंक दी जाती है. जहरीली घास के खाने से गायों की होने वाली मौतों पर आज तक किसी को सजा नहीं दी गई. इस प्रकार की मौतों को मात्र दुर्घटना मानकर छोड़ दिया जाता है, जैसे कि सड़कों के मेनहोल के दलित कामगरों की जहरीली गैस से होने वाली मौत.

सरकार ने विधानसभा के अंतिम दिन ही कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट भी पटल पर रखी. इसी दिन सरकार ने एमबी शाह कमीशन की वह रिपोर्ट भी पटल पर रखी जिसमें नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार के उन आरोपों से मुक्त किया गया है जो कि उन पर कांग्रेस ने उस समय लगाए थे जबकि वे प्रदेश में मुख्यमंत्री थे.

 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस ने 15 आरोप लगाए थे, जिसमें एक गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन में घोटाले का था, एक टाटा मोटर्स को 33 हजार करोड़ के लगभग दी गई रियायत का था, एक भाजपा नेता वैंकया नायडू की कंपनी को कच्छ में जमीन देने के संबंध में था और औद्योगिक घरानों को प्रमुख शहरों के पास कीमती जमीन देने के संबंध में थे.

इसके अलावा भाजपा विधायकों ने तीन तलाक के बारे में एक निंदा प्रस्ताव भी पास करते हुए मुस्लिम महिलाओं की रक्षा के लिए कानून में सुधार की मांग की. वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक आर के मिश्रा का कहना है कि मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से विवादित बिल और प्रस्तावों को विपक्ष की अनुपस्थिति में पारित कराना राज्य की विधानसभा में एक नॉर्म बन चुका है, क्योंकि इसके बाद बहस की कोई जगह ही नहीं रह जाती.


साथ ही वे गौ हत्या अधिनियम में संशोधन के समय पर भी सवाल उठाते हुए कहते हैं कि यह कानून 1990 से वजूद में है जबकि चिमनभाई पटेल राज्य के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. साथ ही मिश्रा कहते हैं कि राज्य में एक और कानून है जिसके अनुसार हूच या अवैध शराब बनाने वाले लोगों को मृत्युदंड का प्रावधान है. सरकार को यह पूछना चाहिए कि इस कानून में अब तक कितने लोगों को सजा दी गई है. यह कानून उस समय अस्तित्व में आया था जबकि पूर्व गवर्नर कमला बेनीवाल ने 2011 में इसको अपनी सहमति दी.

 

जानकारी के अनुसार गुजरात विधानसभा ने अहमदाबाद के उस अवैध शराब पीने से हुए हादसे के बाद 28 जुलाई 2009 में यह 'बॉम्वे प्रॉहिबिशन (संशोधन) कानून' बनाया था जिसमें 136 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें से अधिकांश वहां की स्लम बस्तियों ओधाव और अमराईवदी के लोग थे.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण


जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के बाद भाजपा और संघ परिवार के नेता अपने हिंदुत्व एजेंडे को लेकर काफी मुखर हो गए हैं. अहमदबाद के एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है “उनके भाषणों में हिंदू उत्पीड़न के भाव को पैदा करने की कोशिश है. वे अपने भाषणों में 1990 के दशक की शुरुआत में जगन्नाथ रथ यात्रा पर हमले और डॉन अब्दुल लतीफ का जिक्र करते हैं. अहदाबाद के रोजमर्रा के जीवन में हिंदू और कार सेवा शब्द आज—कल फिर से सुनने को मिलने लगे हैं. ”

 

वीएचपी इंटरनेशनल के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया द्वारा संबोधित किया गया 'विराट हिंदू सम्मेलन' उस पैटर्न का उदाहरण है जो कि अब उभर रहा है. इस आयोजन के पहले जो पोस्टर्स और बैनर लगाए गए थे उसमें इस तरह की बातें लिखी हुई थीं— उत्तर प्रदेश में गायों को न्याय मिल रहा है, गुजरात में यह कब होगा. बूचड़खाने उत्तरप्रदेश में बंद किए जा रहे हैं, यह गुजरात में कब होगा.

अपने संबोधन में तोगड़िया ने अयोध्या के विवादित स्थल के लिए उसी तरह के एक कानून की मांग की जैसी की स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए बनाया गया था. जानकारों के अनुसार इस आयोजन में एचएप4हिंदूज यानी 'HApp4Hindus' के लॉन्च की घोषणा की गई, जहां तोगड़िया ने 'हिंदू फर्स्ट' चार्टर ऑफ डिमांड की घोषणा की.

साथ ही तोगड़िया ने जनसंख्या विस्फोट और जनकल्याणकारी योजनाओं पर करदाताओं के पैसे की बर्बादी को रोकने के लिए बहु पत्नी प्रथा की समाप्ति और यूनिफॉर्म पापुलेशन एंड मैरिज लॉ की मांग उठाई. साथ ही उन्होंने अल्पसंख्यकों के बच्चों की तरह मिलने वाले फीस माफी जैसे इंसेंटिव हिंदू बच्चों को दिए जाने की मांग भी की.

सम्मेलन के पहले उत्तरी गुजरात के पाटन जिले के वादावली गांव में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ था. इसमें इब्राहिम खान बेलिन नामक व्यक्ति को मार दिया गया तथा कई लोग जख्मी हो गए. रिपोर्ट के अनुसार सुनसर और पड़ोसी गांवों के ठाकोर समुदाय ने पिछले शनिवार वादापली क्षेत्र के वाजीपारा के मुस्लिम निवासियों पर हमला कर दिया और उनकी उपज, वाहन तथा घरों में आग लगा दी.


जानकारी के अनुसार दंगा भड़कने के लिए हिंदू और मुस्लिम छात्रों के बीच छोटे मोटी कहा—सुनी जिम्मेदार है. 2002 के गोधरा दंगों के बाद गुजरात में इस तरह के छोटे स्तर पर अब तक कई दंगे हो चुके हैं. यद्यपि इनकी शुरुआत तो छोटे—मोटे मामलों के बाद होती है पर इनसे बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण को बल मिलता है.

जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने घटनास्थल का दौरा किया उन्होंने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में यह तथ्य रेखांकित किया है कि उस दिन बड़ी मात्रा में क्षेत्र के मुस्लिम कच्छ में हाजी पीर की समाधि पर हुए मेले में गए हुए थे. उनका कहना है कि वादावली वह गांव है जहां आज तक दोनों समुदाय शांति से रहते आए हैं. जबकि यह हमला वहां से 10 किमी दूर स्थित एक गांव के लोगों के द्वारा समूह बनाकर किया गया था.


जानकारों का कहना है कि साल के अंत में होने वाले चुनावों को देखते हुए इस तरह की घटनाएं और नेताओं के भड़काने वाले भाषण तो चुनाव करीब आने के साथ बढ़ते ही जाएंगे.

 

 

First published: 4 April 2017, 10:46 IST
 
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