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वडवाली दंगा: वे राक्षसों की तरह आए और तीन घंटे में सब तहस-नहस कर चले गए

आयरनी ऑफ इंडिया | Updated on: 14 April 2017, 10:09 IST


बीते 25 मार्च को हिन्दुओं की लगभग 5 हजार की भीड़ ने उत्तरी गुजरात के पाटन जिले के वडवाली गांव में हमला कर दिया और 80 से 100 घरों को फूंक दिया. ये घर मुसलमानों के थे. हिंसक लोगों ने लूटपाट की, दुकानों को नुकसान पहुंचाया और वाहनों में भी आग लगा दी. इस हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई और लगभग 25 लोग घायल हो गए.


इस साम्प्रदायिक झगड़े की शुरुआत छात्रों के आपसी झगड़े से नूतन विद्यालय में हुई जहां नज़दीकी गांवों के छात्र परीक्षा देने आए थे. 10वीं की परीक्षा देने आए एक मुस्लिम छात्र और दूसरे हिन्दू ठाकोर समुदाय के छात्र के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया. मुस्लिम छात्र ताकोदी गांव और हिन्दू ठाकोर समुदाय का छात्र शुनशेर गांव का था.

जब झगड़ा बढ़ा तब वडवाली गांव के बड़े-बूढ़ों ने हस्तक्षेप किया और अनुरोध किया कि वे झगड़ा न करें. लगभग एकाध घंटे के बाद शुनशेर गांव से ठाकोर समुदाय का एक समूह जिसमें अन्य 200-250 लोग भी थे, घटनास्थल पर पहुंचा और वडवाली गांव के मुस्लिमों को धमकाया. कुछ बुजुर्ग लोगों के साथ अशिष्टता करने के बाद वे चले आए लेकिन 2 बजे के आसपास एक बड़ी भीड़ जुट गई.


एक स्थानीय व्यक्ति हुसैन भाई कहते हैं कि लगभग 5 हजार लोग आ खड़े हुए थे. ये चार गांवों धारपुर, शुनसेर, रामपुर और मेरवादा के थे. ये गांव 10 किमी से ज्यादा की दूरी पर स्थित हैं.

 

फैक्ट फाइंडिंग टीम


हिंसा के लगभग 15 दिनों बाद मुम्बई की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने वडवाली गांव का दौराकर एक रिपोर्ट तैयार की है. इस टीम में एक्टिविस्ट विनोद चन्द और एडवोकेट एस एस सैय्यद थे. इसके बाद विनोद चंद ने फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह इस तरह है...


आज 10 अप्रैल है. 15 दिन हो गए जब हिंदुओं की भीड़ ने एक निहत्‍थे गांव पर दिनदहाड़े 1.30 से शाम 4.00 बजे के बीच निहत्थे गांववालों पर हमला बोला और स्‍थानीय पुलिस के संरक्षण में मुसलमानों के मकानों को व्‍यवस्थित तरीके से लूटा और जलाया था.

इस लूट और आगजनी में करोड़ों की संपत्ति नष्‍ट हो गई, घरेलू सामानों को तोड़-फोड़ दिया गया, नकदी और गहने लूट लिए गए. बकरियों तक को हांक कर ले जाया गया. निर्दयी और क्रूर हमलावरों की भीड़ पिस्‍तौल और तलवारों से लैस थी.

जिन 150 घरों का सर्वे किया गया, उनमें 100 से ज्‍यादा पूरी तरह लूट कर जला दिए गए थे. बमुश्किल 50 मकान इस तबाही में बच गए थे क्‍योंकि स्‍टेट रिजर्व पुलिस के वहां पहुंचने के बाद भीड़ भाग गई.

समूची घटना की शुरुआत एक स्कूहल में दो छात्रों के बीच झड़प से हुई. पड़ोस के गांव का एक लड़का मधुमक्खी के छत्ते में ढेला फेंक रहा था जिसे स्थागनीय मुस्लिम लड़के ने ऐसा करने से मना किया. जब हिंदू लड़के ने विरोध किया तो दोनों में मारामारी हो गई.

घंटों के भीतर 5000 से 8000 लोगों की भीड़ सुनसर, धरमपुरी और आसपास के गांवों से उस गांव में पहुंच गई. उनके पास तलवारें, पिस्तौमलें और जलाने वाले रसायन थे. हमलावर भीड़ का आकार इतना बड़ा था कि पुलिस ने स्थापनीय औरतों को भाग कर छुप जाने की सलाह दे दी. यहां तक कि गांव में मौजूद लड़के और पुरुष भी डर के मारे छुप गए.

इसके बाद काफी व्यवस्थित तरीके से भीड़ ने एक-एक कर के घरों को जलाया. वे सारी नकदी और गहने आलमारियां तोड़ कर ले गए और जाने से पहले सब कुछ जला गए. उन्होंने टीवी सेट, फ्रिज, दरवाज़े, वाहन, कारें और मोटरसाइकिलें तोड़ दीं जो आज भी गांव के मुस्लिम आबादी वाले इलाके में बिखरे पड़े हैं.

 

मदद काम नहीं आई

 

स्थानीय हिंदू ग्रामीणों ने मुसलमानों को बचाने की भरसक कोशिश की लेकिन भीड़ को इससे कोई लेना-देना नहीं था. स्थानीय पुलिसवालों और भीड़ के साथ आई पुलिस की निष्क्रियता ने इतने बड़े पैमाने पर तबाही होने दी और जायदाद नष्टा हुई.


गुजरात बीजेपी/आरएसएस की हिंदुत्व की प्रयोगशाला है. बीजेपी जब से सत्तार में आई है, उसने धर्म और फर्जी राष्ट्रवाद का इस्तमाल देश को सांप्रदायिक व धार्मिक लाइन पर बांटने में किया है. गोधरा की घटना के बाद 2002 में हुए दंगे अब भी राज्य और देश के नागरिकों के दिलो दिमाग में ताज़ा हैं. अब बीजेपी ने उन छोटे गांवों की ओर अपना ध्यादन मोड़ दिया है जहां मुसलमानों की भारी आबादी है.


गांव पर यह सुनियोजित हमला, जहां एक छोटी सी घटना पर कुछ घंटों के भीतर ही हज़ारों लोगों को इकट्ठा कर लिया गया, इस बात का संकेत है कि बीजेपी/आरएसएस/हिंदुत्व की ताकतें गुजरात में अमन-चैन से जी रहे मुसलमानों पर व्यवस्थित हमलों की योजना बना रही हैं. वे पूरी तरह जातीय सफ़ाया कर देना चाहते हैं.

 

क्या कहते हैं मुसलमान

 

वडावली में मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हमारी मुलाकात के दौरान उन्होंने हमें बताया कि वडावली के हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच कोई मनमुटाव नहीं था और वास्तव में उनके गांव ने पांच साल में आधी अवधि के लिए मुस्लिम महिला को सरपंच के बतौर पंचायत में चुना था. बाकी का आधा हिस्सा हिंदू सरपंच रहना तय था जिसे अभी चुना जाना बाकी था. ज्यादातर मुस्लिम आबादी यहां पटेलों के यहां मजदूरी का काम करती है. इनमें किसान थोड़े ही हैं और किसी के पास अपनी ज़मीन नहीं है. कुछ मुसलमान दूसरे गांवों से आकर यहां बस गए हैं क्यों कि उन्हें उनके गांवों से जबरन भगाया गया था क्योंकि हिंदू बहुल गांव में वे अल्पकसंख्यंक हो गए थे.

 

गांव में जमायते उलेमा हिंदी एक राहत शिविर चला रहा है. उसने जलाए गए मकानों के दोबारा निर्माण के लिए पैसों का इंतज़ाम भी किया है. एक बार गांव दोबारा बन जाएं, तो जमात ने परिवारों को बरतन आदि घरेलू सामग्री देने का भी वादा किया है. अधिकतर प्रभावित लोग इंदिरा आवास योजना के तहत निर्मित मकानों में रह रहे थे और कुछ मकान तो महज साल दो साल पुराने थे. प्रभावित लोगों के तरीकबन सभी अहम कागज़ात मकान के साथ खाक हो चुके हैं.


पाटन के कलक्टंर घटना के सात दिन बाद इस गांव के दौरे पर आए. उनका दफ़्तर गांव से केवल 30 किलोमीटर दूर है.
किसी भी राजनीतिक दल, चाहे बीजेपी या कांग्रेस के नेता ने यहां का दौरा नहीं किया है. जानलेवा भीड़ के इकतरफा हमले में प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए कोई सरकारी पहल अब तक नहीं की गई है. एक पीडि़त को उसके गुप्तांलग में 19 बार गोली मारी गई. डॉक्टर उसके गुप्तांग में से छर्रे निकाल पाने में कामयाब हो गए हैं और वहां पट्टी बंधी हुई है.


खुशकिस्मकती से जान का कोई खास नुकसान नहीं हुआ क्योंकि गांव के पुरुष हाजी पीर के सालाना उर्स में गए हुए थे, हालांकि एक शख्स की मौत भी उसके परिवार के लिए भारी होती है. कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है लेकिन उनसे कोई भी माल अब तक बरामद नहीं हुआ है. करीब पांच पीडि़तों का इलाज अमदाबाद के वाडिलाल अस्पताल में अपने खर्च से जारी है और उन्हें मदद की ज़रूरत है. सरकार ने किसी भी पीडि़त के लिए कोई भी मुआवजा घोषित नहीं किया है.

 

 

First published: 14 April 2017, 10:09 IST
 
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