Home » राज्य » Harish Rawat’s Congress washed away by a Modi wave in Uttarakhand
 

पहाड़ में भाजपा की बाढ़, हरीश रावत और कांग्रेस दोनों बहे

राजीव खन्ना | Updated on: 12 March 2017, 9:22 IST
(कैच न्यूज़)

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में मोदी लहर के बहाव में हरीश रावत की कांग्रेस पार्टी का सफाया हो गया. शुरुआत में जो बढ़त भाजपा को गढ़वाल में दिखाई दे रही थी, उसने पूरे प्रदेश को ही लपेटे में लेते हुए कांग्रेस के कई दिग्गजों को उखाड़ फेंका. इस लहर का असर भारतीय जनता पार्टी पर भी पड़ सकता है. भाजपा में राज्य के नए मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर अंदरूनी कलह पनप सकती है, क्योंकि इस ताज की आस पार्टी में कई नेता लगाए हुए हैं.

अगर पार्टी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए सतपाल महाराज को इस पद पर बिठाती है तो उसे आरएसएस और पुराने भाजपाई कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है. अगर पार्टी आरएसएस की पृष्ठभूमि वाला कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बनाता है तो अन्य नेताओं में असंतोष व्याप्त होगा.

कांग्रेस का नुकसान

कांग्रेस के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो उसकी सारी गणित फेल हो गई. रावत का दो सीटों पर चुनाव लड़ना भी कांग्रेस के काम नहीं आया. रावत ने कांग्रेस की स्थिति मजबूत करने के लिए तराई क्षेत्र की किच्चा और मैदान की हरिद्वार (ग्रामीण) सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ा.

उनकी हार ही राज्य मेें कांग्रेस का भविष्य तय करने के लिए काफी है. हो सकता है यह पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा के मजबूती के साथ उबर कर आने का भी असर हो.

लगता है रावत केदारनाथ के दुखद वाकए के बाद राज्य में अपनी सरकार द्वारा किए गए पुनर्वास कार्य के बारे में भी जनता तक साफ.साफ संदेश नहीं पहुंचा सके या यूं कहें कि सरकार के इस काम की ठीक तरह से मार्केटिंग नहीं कर सके. ना ही वे पिछले साल भाजपा के भीतर मची उथल.पुथल को भांप सके जिसने कांग्रेस के कई कद्दावर नेता छीन लिए.

शायद उन्हें इन्हीं सब चीजों की कीमत चुकानी पड़ी. पिछले साल वे भाजपा द्वारा अपनी सरकार गिराए जाने के मसले पर भी लोगों की सहानुभूति बटोरने में विफल रहे और साथ ही भाजपा की अंदरूनी कलह का फायदा भी नहीं उठा सके.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की टिकट बंटवारे की रणनीति भी गलत ही साबित हुई क्योंकि बहुत से कार्यकर्ता 70 में से 50 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों के चयन को लेकर नाखुश थे.

हालात तो भाजपा के भीतर भी कमोबेश ऐसे ही थे लेकिन मोदी लहर ने भाजपा को अतिरिक्त लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया. जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं व रणनीतिकार प्रशांत किशोर की आईपीएसी टीम के बीच तालमेल का अभाव साफ तौर पर देखा जा सकता था. पहाड़ी इलाकों में तालमेल का यह अभाव साफ.साफ नजर आया, जहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को शिकायत दर्ज करवाने की धमकी दी थी.

भाजपा की जीत

भाजपा ने राज्य में यह प्रचार भी करना शुरू कर दिया है कि उन्हें हरीश रावत सरकार के प्रति एंटी इन्कम्बेंसी का फायदा मिला है. उत्तराखंड में वैसे भी हर पांच साल बाद सरकारें बदलती रहती हैं. पहाड़ी जिलों की जनता को लगता है कि नेता उनके साथ धोखा ही करते हैं. इसलिए वे हर बार नई सरकार चुनते हैं. अब चूंकि तीसरा विकल्प है नहीं तो यहां कांग्रेस या भाजपा की ही सरकारें बनती रहती हैं.

लेकिन इन सबसे ऊपर यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही करिश्मा था जो भाजपा के लिए वोटों में तब्दील होकर सामने आया. कई जगह तो देखने में आया कि जनता स्थानीय उम्मीदवार को जाने बगैर केवल मोदी के नाम पर ही भाजपा को वोट दे रही थी. जहां तक प्रचार का सवाल रहा, मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आश्वासन दिया था कि राज्य में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का करीब-करीब हर नेता प्रचार करेगा.

भाजपा नेतृत्व राज्य के वोटरों को बार-बार याद दिलाता रहा कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और सेनाध्यक्ष बिपिन रावत को बनाया जो कि उत्तराखंड से ताल्लुक रखते हैं. भाजपा नेताओं ने वन रैंक वन पेंशन के मुद्दे पर भी पूर्व सैनिकों का दिल जीता. पार्टी का दावा था कि भाजपा ने उनकी मांग पूरी की है. मैदानी इलाकों में पार्टी ने सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर वोट बटोरे.

भाजपा के लिए यहां राहत की बात यह रही कि नोटबंदी के मुद्दे पर भाजपा को ज्यादा विरोध नहीं झेलना पड़ा जबकि असलियत में नोटबंदी की वजह से बहुत से लोगों को यहां तकलीफ उठानी पड़ी थी. बहुत से लोगों का रोजगार छिन गया और वे घर लौट आए थे लेकिन भाजपा उनको यह समझाने में कामयाब रही कि काला धन वापस लाने के लिए ऐसा करना जरूरी था और इससे देश को काफी फायदा होगा. आतंकवाद फंडिंग पर भी भजपा का दावा उस पर उल्टा नहीं पड़ा.

मैदानी और तराई वाले इलाकों में नोटबंदी की वजह से बंद हुई फैक्ट्रियों को लेकर और किसानों को अपनी फसल का सही दाम न मिलने पर जो अक्रोश है, वह भाजपा के खिलाफ नहीं गया. यानी उसके वोट कम नहीं हुए. चुनाव तो जीत लिया लेकिन भाजपा की असल परीक्षा अब शुरू होगी.

पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान मचना तय है. अबी अगर किसी नाम पर सहमति हन भी जाती है तो आगे बाकी दावेदार रोड़ा अटकाते रहेंगे. इसके अलावा पार्टी को गढ़वाल-कुमाऊं विवाद, पहाड़ी-मैदानी विवाद के अलावा ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण से भी जूझना होगा.

First published: 12 March 2017, 9:22 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी