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उत्तराखंड: कुमाऊं-गढ़वाल के बंटवारे में फंस चुकी है भाजपा की गाड़ी

राजीव खन्ना | Updated on: 16 February 2017, 8:21 IST
कैच न्यूज़

बुधवार को पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में मतदाताओं ने अपनी चौथी विधानसभा चुनने के लिए वोट डाले. 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से 69 पर वोट पड़े. बसपा उम्मीदवार कुलदीप सिंह कनवासी के निधन के कारण कर्णप्रयाग सीट पर चुनाव स्थगित कर दिए गए. इस सीट पर चुनाव अब 9 मार्च को होंगे और नतीजे की घोषणा सभी सीटों के साथ 11 मार्च को की जाएगी. शुरू में मतदान की प्रक्रिया धीमी रही, दोपहर होते-होते रफ्तार पकड़ी और लगा, 66.11 प्रतिशत का पिछला रिकार्ड संभवत: टूट जाएगा. हुआ भी यही. मतदान समाप्त होने तक राज्य में कुल 68 प्रतिशत वोट पड़े.


मतदान में भाजपा की कोई खास शुरुआत नहीं हो सकी, जबकि मुख्यमंत्री हरीश रावत के अधीन कांग्रेस पार्टी को काफी अच्छी बढ़त मिली और उन्होंने पार्टी के पुन: सत्ता में आने के आसार बनाए. ज्यादातर लोग दोनों के बीच कड़ी टक्कर बता रहे हैं. कई लोग स्वतंत्र और बसपा जैसी अन्य पार्टियों के जीतने की भी संभावनाओं को नहीं नकार रहे हैं. उनकी सरकार-निर्माण में अहम भूमिका हो सकती है.

यह इसलिए कह सकते हैं क्योंकि पूर्व में कई उम्मीदवार जीते हैं, जिनका मार्जिन दो डिजिट से ज्यादा नहीं रहा था. देहरादून में एक वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ ने कहा, ‘हालात बड़े अस्थिर हैं. कुछ दिनों पहले भाजपा जीतने का दावा कर रही थी, पर आज यह सच नहीं हो रहा. वह कहीं भी जा सकती है, यदि काम की लहर हो, जो दिखाई नहीं दे रहा.’

 

जीत के लिए बेक़रार भाजपा

भाजपा इस राज्य को जीतने के लिए बेकरार है और उसे अपने मान का मुद्दा बना लिया है. रावत सरकार को हटाने की असफल कोशिश में उसे कांग्रेस के गलत लोगों को भी अपने में शामिल करना पड़ा था. वह मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर स्पष्ट नहीं थी और फिर उनके खुद के काडर और कांग्रेस से आए बागियों में कई नेता वजनदार थे इसलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम पर कैंपेन करना चुना था.

दूसरी ओर कांग्रेस रोना रो रही थी कि किस तरह रावत को 30 महीने के कार्यकाल में काम नहीं करने दिया. उन्होंने राज्य में स्थाई सरकार देने के नाम पर वोट मांगे हैं. वोटिंग के दिन इन पार्टियों की क्या स्थिति थी, इसके लिए क्षेत्र वार विश्लेषण जरूरी है.

गढ़वाल

भाजपा से शुरू करें, तो वह गढ़वाल इलाके में अपने पत्ते खेलने में सफल रही. मोदी और उनकी विशाल टीम अपने फायदे के लिए ‘वन रैंक वन पैंशन’ की याद दिलाने में सफल रही, दावा करते हुए कि उन्होंने इस मोर्चे पर काम किया है. दूसरी बात यह कि इस क्षेत्र में मनीऑर्डर की अर्थव्यवस्था है, इसलिए यहां नोटबंदी का कोई मुद्दा नहीं था. पर मैदानों में नौकरियां छूट जाने से कई युवाओं को घर लौटना पड़ा था.

भाजपा ने यहां सतपाल महाराज से लेकर हरक सिंह रावत तक कई सशक्त उम्मीदवारों को खड़ा किया. जो उनके अपने काडर के थे, और जो कांग्रेस से आए थे. पार्टी गढ़वाल-कुमाऊं में विभाजन करने में सफल रही. यह करके जताना चाहती है कि जब से उत्तराखंड राज्य बना, ज्यादातर मुख्यमंत्री और मंत्री कुमाऊं से थे.

कांग्रेस ने भाजपा पर पलटवार की कोशिश की. उसका आरोप था कि पूर्व सैनिक और रक्षाकर्मी को वन रैंक वन पैंशन और सातवें वेतन आयोग के सिलसिले में बेवकूफ बनाया गया. उसने केदारनाथ आपदा के बाद रावत के अधीन हुए पुनर्वास कार्यों को भी भुनाने की पूरी कोशिश की. यह भी दलील दी कि उसने पर्यटन अर्थव्यवस्था को फिर से अपने पैरों पर खड़ा किया. भाजपा ने कांग्रेस के बागियों को खड़ा किया, उससे भी उन्हें लाभ मिला. इससे भाजपा रैंक में लड़ाई छिड़ी कि वे कांग्रेस से भाजपा में आए उम्मीदवारों का साथ दे रहे हैं.

हरिद्वार और उधम सिंह नगर

कांग्रेस को दो मैदानी जिले हरिद्वार और उधम सिंह नगर और तराई से काफी उम्मीदें हैं. 2012 में पार्टी ने हरिद्वार की 11 में से सिर्फ 3 सीटें जीती थीं, जबकि उधम सिंह नगर में 9 में से 2. भाजपा को क्रमश: 5 और 7 सीटें मिली थीं. लोगों का मानना है कि भाजपा का इन जिलों में यह प्रदर्शन अपवाद ही था और अब दोहराना मुश्किल होगा. कारण कि ज्यादातर मुसलमान और दलित मतदाता इस बार कांग्रेस का साथ दे रहे हैं. कांग्रेस इन दो जिलों में एक दर्जन से ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है. इसलिए उसने इन जिलों में दो सीटों पर रावत को खड़ा किया है.

नोटबंदी यहां बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि यहां का औद्योगिक उत्पादन और नौकरियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. किसान भी उनकी दुश्वारियां बढ़ाने के लिए मोदी सरकार से काफी गुस्सा हैं. इन जिलों में इस मुद्दे का भाजपा पर बुरा असर होगा. कांग्रेस के अलावा, बसपा की भी इन जिलों की कुछ सीटों पर नजर है. जनसांख्यिकी प्रोफाइल और परंपरागत समर्थन के आधार को देखते हुए.

कुमाऊं

मैदान और तराई के अलावा कांग्रेस कुमाऊं में भी बढ़त देख रही है, जो रावत का गृह क्षेत्र है. वे यहां भावात्मक लगाव जताकर सफल हए हैं. काफी संख्या में लोग इस चुनाव को रावत और मोदी के बीच लड़ाई मान रहे हैं. वे मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के उंचे और अपमानजनक स्वर से नाराज हैं. वे चर्चा करते रहे हैं कि किस तरह मोदी, रावत की हार सुनिश्चित करने के लिए कैंपेन के दौरान केंद्रीय मंत्रियों को भेजते रहे हैं.

वे इस चुनाव को कुमाऊं का गौरव लौटाने के रूप में देख रहे हैं. नैनिताल में एक वामपंथी समर्थक ने कहा, ‘वे भ्रष्ट होते, तो हम उन्हें कभी भी बाहर फेंक देते. उनकी सरकार को हटाने वाले मोदी और अरुण जेटली कौन होते हैं. बाद में सीबीआई जांच की धमकी तक दी.’

भाजपा की वैन रैंक वन पैंशन को भुनाने की नीति ने इस क्षेत्र को ज्यादा प्रभावित नहीं किया. गढ़वाल की तरह यहां भी नोटबंदी खास मुद्दा नहीं है, पर युवाओं के बीच कुछ नाराजगी जरूर है. आरएसएस काडर और भाजपा के पुराने कार्यकर्ता इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि भाजपा ने संजीव आर्य जैसे कांग्रेस के बागियों को खड़ा कर दिया और उन लोगों को अनदेखा कर दिया, जो वर्षों से उनके निर्वाचन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी ने संपन्न लोगों को टिकट दिया. पर भाजपा सत्ता-विरोधी लहर के आधार पर सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है.

कुल मिलाकर यहां दंगल मोदी सरकार के समर्थन वाली भाजपा और हरीश रावत वाली कांग्रेस के बीच है. यदि कांग्रेस यह चुनाव जीत जाती है, तो इतिहास बनाएगी क्योंकि किसी पार्टी ने अब तक राज्य में अपनी सरकार दुबारा नहीं बनाई. पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब और उत्तराखंड की जीत पर निर्भर है ताकि 2019 के चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर वापसी कर सके.

First published: 16 February 2017, 8:21 IST
 
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