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हरीश रावत का मास्टरस्ट्रोकः तराई इलाके में किच्छा से भी मैदान में

राजीव खन्ना | Updated on: 14 February 2017, 10:09 IST
हरीश रावत

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत राज्य में कांग्रेस के ऐसे नेता हैं जो अकेले ही विधानसभा चुनावों में पार्टी अभियान की अगुवाई कर रहे हैं. कांग्रेस का पूरा चुनावी अभियान इन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है. रावत एक मंझे हुए राजनीतिक नेता हैं जो कांग्रेस की ही सीढ़ियां चढ़कर आगे बढ़े हैं जिन्हें जनता की नब्ज अच्छी तरह मालुम है या यूं कहिए कि वे जनता की नब्ज को अच्छी तरह पहचानते हैं.

हरीश रावत ने अचानक पहाड़ी विधानसभा क्षेत्र धारचूला की सीट छोड़ दी और मैदानी और तराई इलाके की तरफ रुख कर लिया. धारचूला विधान सभा क्षेत्र पिथौरागढ़ जिले में है. जिस पहाड़ का बेटा होने का दम वे हमेशा से भरते रहे हैं, उस पहाड़ी विधान सभा क्षेत्र को उन्होंने क्यों छोड़ दिया. 

हरीश रावत इस बार दो विस क्षेत्रों हरिद्वार जिले की ग्रामीण सीट और उधमसिंह नगर की किच्छा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. यह राज्य के मैदानी और तराई क्षेत्र वाले इलाके हैं. वह राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो दो विधानसभा क्षेत्रों से एकसाथ चुनाव लड़ रहे हैं. दो सीटों से एकसाथ विधानसभा चुनाव में उतरकर उन्होंने राज्य में नई परम्परा डाल दी है.

वैसे देखा जाए तो हरिद्वार वर्ष 2009 से ही उनका राजनीतिक घर रहा है जब वह वहां से लोकसभा का चुनाव जीते थे. रावत अपने नए चुनावी मैदान में भी बहुत मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ रहे हैं.

रणनीतिक पसन्द

रावत की किच्छा सीट से लड़ने की मंशा को केवल उनकी रणनीति के रूप में ही देखा जा सकता है. कांग्रेस चाहती थी कि उसे हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिले में आने वाली 20 सीटों में से अधिकतर पर जीत मिले. हरिद्वार जिले में विधान सभा की 11 सीटें हैं जबकि उधमिसंह नगर में 9 सीटें हैं.

यह तो तय ही है कि रावत की इन सीटों पर मौजदूगी का असर निकटवर्ती अन्य विधान सभा सीटों पर भी पड़ेगा. उनकी उधमसिंह नगर में मौजदूगी कांग्रेस के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि 2012 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को जिले की 9 सीटों में से केवल 2 सीटों पर विजय मिली थी. तीसरी सीट उसे उपचुनाव में मिली.

लेकिन अब के हालात विपरीत हैं. इन सीटों से जीते सभी तीनों विधायक बाजपुर से यशपाल आर्य, जसपुर से शैलेन्द्र मोहन सिंघल और सितारगंज से विजय बहुगुणा अब भाजपा में हैं.

इसका अर्थ यही है कि किसी भी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के लिए यह जिला बहुत ही महत्व का है. और यही वजह है कि रावत ने क्यों अपने लिए किच्छा को चुना. यहां से अभी राजेश शुक्ला विधायक हैं जो भाजपा के हैं. शुक्ला ने पिछली दफा कांग्रेस के एसवाई खान को हराया था.

कांग्रेस के आंतरिक सूत्रों का भी कहना है कि पार्टी कुमाऊं क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए रखने के प्रति आश्वस्त है. (रावत का गृह क्षेत्र इसी रीजन में है) पार्टी तराई और मैदानी इलाकों में भी अपनी बढ़त दर्ज कराना चाहती है. कांग्रेस इस क्षेत्र में अपनी सम्भावनाएं बढ़ाकर गढ़वाल क्षेत्र में भाजपा को महत्वहीन करना चाहती है. गढ़वाल क्षेत्र में भाजपा खुद के प्रति आश्वस्त सी दिखती है.

किच्छा की भौगोलिक स्थिति और राजनीति

किच्छा विधान सभा क्षेत्र में हर वर्ग के लोग हैं. यहां बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता हैं तो पंजाबी मतदाता भी अच्छी-खासी संख्या में हैं. राज्य के पहाड़ी जिलों से भी यहां आए प्रवासी मतदाता हैं.

रावत का यहां मुसलमानों के बीच अच्छा समर्थन हैं और उनकी मजबूती का आधार भी मुस्लिम हैं. कुल 1,19,000 मतदाताओं में से 31,000 वोट मुस्लिमों के हैं. विधान सभा क्षेत्र में लगभग 19,000 दलित मतदाता हैं.

किच्छा में रावत का चुनाव अभियान संभालने वाले अग्रिम पंक्ति के कांग्रेस कार्य़कर्ता मयंक कहते हैं कि यदि हरीश रावत यहां से चुनाव नहीं लड़ते तो बसपा प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह के इस सीट से जीतने की सम्भावनाएं प्रबल थीं.

किच्छा मूलतः एग्रीकल्चर हब है. यहां कई चावल मिल्स तो हैं ही, चीनी मिल भी है. अलग राज्य के बन जाने के बाद से यह क्षेत्र औद्योगिक विकास के रूप में भी देखा गया है लेकिन विकास के पैरामीटर पर यहां अन्य चीजों को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है. यही वह वजह है जिस लिए लोग बड़े पैमाने पर रावत के समर्थन में आ खड़े हुए हैं. मयंक कहते हैं कि मतदाता अब समझ गए हैं कि वे मुख्यमंत्री प्रत्याशी के लिए वोटिंग करेंगे.

लोग चाहते हैं कि यहां उच्चकोटि के शिक्षण संस्थान स्थापित हों ताकि क्षेत्र में जब औद्योगिक इकाइयां स्थापित हों तो स्थानीय युवकों को एक्जीक्यूटिव स्तर की नौकरियां मिल सकें. वे यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं चाहते हैं ताकि मरीजों को जिन्हें उत्तर प्रदेश के बरैली में, उत्तराखंड के रुद्रपुर और हल्द्वानी में रैफर किया जाता है, उनका रेफर किया जाना रुक सके.  रावत ने यह सब पूरा कराने का आश्वासन दिया है.

यह सीट एकबार रुद्रपुर विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा थी जिसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के अन्य दमदार और कद्दावर नेता तिलक राज करते थे. वह इस समय भी रुद्रपुर से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन व्यापक रूप से वह रावत के लिए किच्छा में प्रचार कर रहे हैं.

एक चाय विक्रता प्रमोद कहते हैं कि अनुमान लगाया जा सकता है कि रावत जीत जाएंगे. लोग मुख्यमंत्री के लिए वोट डालेंगे. यदि वह जीतते हैं तो विधानसभा क्षेत्र का परिदृश्य ही बदल जाएगा जो अच्छे के लिए होगा.

भाजपा का दावा

भाजपा प्रत्याशी शुक्ला, रावत के उन 19 वादों को पूरा करने में विफल रहने का दावा करते हैं जो मुख्यमंत्री ने पिछले 30 माह में क्षेत्र की जनता से किए थे.

शुक्ला कहते हैं कि रावत ने किच्छा की तरफ इसलिए कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह सीट विपक्षी विधायक के पास थी. वह दावा करते हैं कि इन सबके बाद भी वह गौला नदी पर पुल बनवाने में सफल रहे. यह पुल गांवों को जोड़ने का माध्यम बन गया है. गांवों में सड़कें भी बनवाईं हैं. शुक्ला यह भी दावा करते हैं कि उनके कार्यकाल में कई स्कूलों को क्रमोन्नत किया गया.

शुक्ला समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता हैं. उन्होंने कथित रूप से उधमसिंह नगर को उत्तर प्रदेश में शामिल कराने के लिए चले आन्दोलन की अगुवाई की थी. लेकि जब यह जिला उत्तराखंड का हिस्सा बन गया तो वह भाजपा में शामिल हो गए. वर्ष 2007 में उन्होंने रुद्रपुर से तिलकराज के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन पराजय हाथ लगी.

भाजपा यहां अपने स्टार प्रचारकों को उतारकर रावत को दरकिनार करने की भरसक कोशिश कर रही है. रावत भी कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं. वह तिलकराज तथा एसवाई खान को साथ लेकर घर-घर जाकर सघन चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं.

First published: 14 February 2017, 10:09 IST
 
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