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पंजाब: ड्रग स्मगलरों का गांव हवेलियां

आदित्य मेनन | Updated on: 26 January 2017, 7:30 IST

भारतीय सेना नायक दर्शन सिंह को गर्व है कि उनके 17 साल से ज्यादा के करियर में अक्सर पोस्टिंग सीमा पर हुई है. पर उन्हें बेहद दुख है कि वे अपने गांव की रक्षा नहीं कर सके. जिस गांव की बात दर्शन सिंह कर रहे हैं, वह दरअसल उनका ननिहाल हवेलियां है. पंजाब के तरण तारन जिले का एक गांव, जो ड्रग्स की स्मगलिंग और नशे की लत, दोनों के लिए बदनाम है. हवेलियां ठीक भारत-पाक सीमा पर है. गांव की सीमा पर भारत ने तारों से हदबंदी कर रखी है. हदबंदी के 200 मीटर दूर ही पाकिस्तानी इलाका है. 

पिछले साल यहां के लोगों को कुछ दिनों के लिए कहीं और भेज दिया गया था. सरकार को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास तनाव की आशंका थी. यह कहना कि पाकिस्तान से गांव पत्थर फेंकने की दूरी पर हैं, तो क्रूर मजाक होगा, क्योंकि सीमा पार से हवेलियां के धान के खेतों में अक्सर ड्रग फेंके जाते हैं. अधिकारियों का आरोप है कि यह गांव के कुछ लोगों के साथ सांठ-गांठ से ही किया जा रहा है. 

बदनामी

हवेलियां के लोगों के लिए उनके गांव को ड्रग्स स्मगलरों का गांव कहना एक शाप है. इसने उनके जीवन पर गहराई से असर डाला है. दर्शन कहते हैं, ‘हम जहां भी जाते हैं, हमें इस कलंक के साथ जीना होता है. इसकी वजह से लोगों को काम नहीं मिलता. वे आगे कहते हैं, ‘हमारा गांव पुलिस और सुरक्षा कर्मचारियों का निशाना बना हुआ है.’ 

हवेलियां के एक अन्य शख्स सरम सिंह कहते हैं, ‘पुलिस अक्सर आती है और गांव के लडक़ों को पकड़ ले जाती है. हवेलियां के कुछ लोगों के लिए जेल नियति बन गई है.’ दर्शन सिंह ने माना कि कुछ सालों पहले गांव के कई लोग ड्रग्स के धंधे में लिप्त थे, पर अब ऐसा नहीं है. वे कहते हैं, ‘जो लोग यह काम कर रहे थे, अब यहां नहीं हैं. पुलिस गांव से निरपराध लोगों को गिरफ्तार कर लेती है, सिर्फ यह बताने के लिए कि वह ड्रग के कारोबार पर कड़ी कार्रवाई कर रही है.’

ड्रग्स के खतरे

स्थानीय लोगों के मुताबिक हवेलियां में लगभग 1000 जनसंख्या के करीब 150 परिवार हैं. 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक एनडीपीएस एक्ट के तहत गांव से 3-4 औरतों सहित लगभग 50 लोग सलाखों के पीछे थे. यह पंजाब में किसी की भी गांव के लिए बहुत ज्यादा संख्या है. जून 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस साल के उत्तरार्ध में पंजाब के तरण तारन जिले में सभी जिलों से ज्यादा एनडीपीएस के मामले 367 दर्ज हुए. इसके बाद जालंधर में 347, फिर फिरोजपुर में 256 और पटियाला में 237. 

ड्रग्स के धंधे से हवेलियां में संपन्नता तो आई, पर इसका नुकसान भी हुआ. गांव में सबसे ज्यादा नशे की लत है, खासकर हीरोइन की. 2015 में द ट्रिब्यून को दलबीर कौर ने बताया कि ‘गांव के ज्यादातर घरों में या तो ड्रग स्मगलर हैं या फिर ड्रग एडिक्ट. और ज्यादातर घरों में दोनों’. ड्रग्स के व्यसन के कारण ही वे अपना पति खो चुकी थीं. कहा जाता है, हवेलिंयां में इस व्यसन के चलते 20 विधवाएं हैं. 2013 में नशे की लत के कारण 30 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं.

जब द ट्रिब्यून ने 2015 में हवेलियां का दौरा किया, उन्होंने कहा है कि जैसे ही वे वहां पहुंचे और इस विषय में देखा, तो हैरानी हुई कि गांव के ज्यादातर युवा नशे में थे और उन्होंने सही व्यवहार नहीं किया.’ पर शायद, पहले से हालात सुधर गए हैं. जब कैच ने इस साल 24 जनवरी को गांव का दौरा किया, कुछ लोगों को छोडक़र कोई भी नशे में नहीं था. एक मैदान में कई युवा वॉलीबॉल खेल रहे थे. गलत व्यवहार की जगह सभी दोस्ताना थे, और उनमें से कुछ ने चाय और खाने के लिए भी पूछा. 

बीएसएफ का पक्ष

हवेलियां में नियुक्त बीसएफ के एक कमांडेंट हवेलियां के बारे में सीधा कहते हैं, ‘यह ड्रग स्मगलरों का गांव है.’ वे ड्रग के धंधे की कार्य प्रणाली और गांव वालों की इसमें भूमिका के बारे में बताना जारी रखते हैं. कहते हैं, ‘पाकिस्तान की ओर से स्मगलर्स इस पार खेतों में ड्रग के पैकेट फेंकते हैं. चूंकि हदबंदी भारतीय भूमि के 200 मीटर अंदर है, पाकिस्तानी स्मगलरों को जोर से सामान फेंकना पड़ता है ताकि वह भारत की तरफ पहुंच जाएं.’

वे विस्तार से बताते हैं , ‘सीमा के इस पार के स्मगलर फोन और वॉट्सअप के जरिए इस जुर्म के अपने पाकिस्तानी साथियों के साथ बराबर संपर्क में रहते हैं. वे उस जगह को तय करते हैं, जहां से माल फेंका जाना है, मसलन बड़ा पेड़, झोपड़ी या कोई खास खेत. कभी-कभी इस मकसद से खेतों पर निशान बनाए जाते हैं. इस तरफ के लोग किसी ना किसी बहाने से खेतों में जाकर उस माल को उठाते हैं. ’

हालांकि वे मानते हैं कि एक साल से ज्यादा समय से हवेलियां में ड्रग का कारोबार कम हो गया है. वे कहते हैं, ‘कुछ सरगनाओं को गिरफ्तार किया गया था या फिर उन्हें कहीं और भेज दिया गया था. इससे यहां से होने वाले ड्रग के कारोबार में कमी आई है.’ पर हवेलियां में नियुक्त एक अन्य बीएसएफ कर्मचारी ऐसा नहीं मानते. कहते हैं, ‘यह बस मौके की बात है...हम बीएसएफ वाले पूरा ध्यान रखते हैं, फिर भी वे कोशिश करते रहते हैं. जब भी कोहरा होता है, वे इस तरफ से कुछ ड्रग्स लेने की कोशिश करते हैं.’

हवेलियां में बीएसएफ के लोग कम हैं. उत्तर दिशा में नौशेरा धाला में 3-4 का बीएसएफ कैंप बड़ा है. हवेलियां के बीएसएफ कमांडेंट ने बताया कि कई दशकों पहले स्मगलिंग सोने से शुरू हुई थी. बाद में इसी मार्ग और नेटवर्क से नारकोटिक्स की स्मगलिंग होने लगी. उन्होंने बताया, ‘गांव में काफी एकता है. कभी-कभी पूरा परिवार ड्रग की स्मगलिंग में होता था. यह काम काफी अच्छा चला क्योंकि पूरा बिजनेस भरोसे पर चलता है.

राज्य की उपेक्षा

हवेलियां के लोगों की एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. दर्शन सिंह कहते हैं, ‘इस गांव की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता है. यहां जाट सिख, मजहबी (दलित) सिख और मायर (राजपूत) सिख हैं. हमारे बीच कोई ऊंच-नीच या भेद भाव नहीं है. ’ गांव पर ड्रग के कारोबार और नशे की लत का तो कलंक है ही, साथ ही यह भी साफ नजर आता है कि लोग खुद को राज्य से उपेक्षित महसूस करते हैं. वे कहते हैं कि गांव ड्रग के कारोबार या नशे में इसलिए लिप्त हैं क्योंकि यहां रोजगार के पूरे साधन नहीं हैं. 

कई गांव वाले कहते हैं कि जो सरकारी एजेंसी यहां नियमित रूप से आती है, वह पुलिस है-उन्हें परेशान करने के लिए. स्थानीय लोगों का कहना है कि हवेलियां में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं, वे वहां के लोगों की कोशिशों से हैं ना कि सरकार की तरफ से. शिक्षण संस्थाएं-कॉलेज और स्कूल दोनों हैं. वे बच्चों को लाने-पहुंचाने के लिए हवेलियां बसें भेजते हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं गैर सरकारी हैं.

पार्टियों पर गुस्सा

राज्य की उपेक्षा के कारण लोगों में राजनीतिक पार्टियों पर भरोसा नहीं है. यहां पार्टियां आगामी चुनाव प्रचार के लिए आई हैं, पर अन्य गांवों से कम. पूरे गांव में विभिन्न उम्मीदवारों के पोस्टर्स लगाए गए हैं. कांग्रेस के पोस्टर सद और आप से ज्यादा हैं. और भी छोटे कई पोस्टर्स हैं, जो मरहूम खालिस्तानी नेता जनरैल सिंह भिंडरावाले की याद दिलाते हैं.

सत्तर साल के सुच्चा सिंह वोट मांगने गांव में आ रहीं राजनीतिक पार्टियों के लिए दहशत बन गए हैं. कहते हैं, ‘मैं मिलकर हरेक से पूछता हूं, आप यहां वोट मांगने क्यों आ रहे हैं, जब आपने इन सालों में कुछ नहीं किया.’ वे हंसते हुए आगे कहते हैं, ‘जो भी मेरा वोट मांगेंगे, उन्हें मेरे दिमाग का टुकड़ा मिलेगा.’ हालांकि सुच्चा सिंह को पूरा दिखाई नहीं देता है, फिर भी वे सभी राजनीतिक पार्टियों के सूचना-पत्र इकट्ठे करते रहे हैं. कहते हैं, ‘मैं उन सबको रखूंगा, देखने के लिए कि उन्होंने अपने वादों के हिसाब से क्या किया.’

सुच्चा सिंह वरिष्ठ शिरोमणि अकाली दल नेता गुलजार सिंह रानिके से खास नाराज हैं. सीमा से सटे एक अन्य निर्वाचन क्षेत्र अटारी के विधायक रानिके के पास प्रकाश सिंह बादल की सरकार में अहम महकमे पशु-पालन, डेयरी, मत्स्य पालन, अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग का कल्याण हैं. 

वे कहते हैं, ‘मैं कुछ काम कराने रानिके के घर गया था. काफी जरूरी काम था और यह मेरे स्वार्थ के लिए नहीं था. पर रानिके ने मेरा अपमान किया और उनके आदमियों ने मुझे धमका कर भगा दिया.’ सुच्चा सिंह ने बताया कि ‘वहां उनके एक बुजुर्ग रिश्तेदार भी मौजूद थे. उन्होंने रानिके के इस व्यवहार की आलोचना की. उन्होंने रानिके से पूछा कि लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार करते हो, तो तुम्हारा मंत्री होने का क्या फायदा है.’

जब कैच रिपोर्टर ग्रामीणों से बात कर रहे थे, तो हवेलियां में एक पुलिस टीम आई और लोगों से पूछताछ करने लगी. उन्होंने कहा कि यह महज ‘रूटीन’ दौरा था. जैसे ही पुलिस की टीम गांव से निकली, एक बाशिंदे ने कहा, ‘चुनाव का केवल यह फायदा है कि पुलिस हमसे नम्रता से बात करती है और हमारे लोगों को मनमाने ढंग से पकड़ती नहीं’.  

First published: 26 January 2017, 7:30 IST
 
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