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पंजाबः लेहरा में जीते कोई भी, किसानों और नौजवानों को फ़ायदा मिलना मुश्किल

आदित्य मेनन | Updated on: 18 January 2017, 7:33 IST
(कैच न्यूज़)

संगरूर जिले के लेहरा में मेन बाजार में उस वक्त झड़प हो गई, जब कुछ वॉलंटियर्स ने वहां खाने की चीजें बांटना शुरू किया. वहां मुठ्ठी भर पकौड़े लेने के लिए करीब 50 लोगों की भीड़ जुट गई. शोर शराबे के बीच ही यहां कुछ वीआईपी नेता भी पहुंच गए. घटना स्थल से महज 20 मीटर की दूरी पर लाल रंग की दो चमचमाती कारें और साथ ही कुछ अन्य वाहनों का रेला आकर रुका. 

एक लाल कार से पूर्व केंद्रीय मंत्री व अकाली दल नेता सुखदेव सिंह ढींढसा उतरे. वे स्वयं को पहचाने जाने की उम्मीद में कुछ देर चारों ओर नजर दौड़ा कर पार्टी कार्याकर्ताओं के साथ सामने की एक छोटी सी बिल्डिंग में चले गए. इलाके में ढींढसा की मौजूदगी से बेखबर भीड़ मुफ्त के पकौड़ों के लिए धक्का मुक्की में लगी रही. 

ढींढसा करीब 10 मिनट वहां दुकान पर रुके और फिर कार में बैठकर वापस चले गए. पकौड़ों के लिए 15 मिनट और धक्का मुक्की चलती रही. फिर बांटने वाले लोग वहां और पकौड़े ले आए.

कांटे की टक्कर

ऐसे प्रदेश में जहां वीआईपी प्रभाव होना आम बात हो; ऐसा कम ही देखने में आता है कि वहां सुखदेव सिंह ढींढसा जेसे राजनेता जो कि राज्यसभा सदस्य भी हैं, उन्हें इस तरह से अनदेखा किया जाए. सुखदेव सिंह ढींढसा लेहरगा यानी लेहरा सीट से अकाली दल के उम्मीदवार अपने पुत्र परमिंदर सिंह ढींढसा के पक्ष में चुनाव प्रचार करने आए थे. 

परमिंदर सिंह ढींढसा मौजूदा राज्य सरकार में वित्त मंत्री हैं. इस सीट पर ढींढसा और पंजाब की पूर्व मुख्यमंत्री राजिन्दर कौर भट्टल के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा. भट्टल इस सीट से 1985 में बस एक बार हारी हैं जबकि पांच बार विजयी रही हैं.

दूसरी ओर परमिंदर ढींढसा सुनाम विधानसभा सीट छोड़ कर यहां से चुनाव लड़ेंगे. वे 2000 से ही सुनाम से चुनाव लड़ते आ रहे हैं, जब उन्होंने वहां से 27 साल की उम्र में यहां पहली बार उपचुनाव जीता था. दरअसल ढींढसा को किसानों के आक्रोश का सामना करना पड़ा. 

पिछले साल दर्शन सिंह नाम के एक किसान ने विरोध प्रदर्शन के दौरान ढींढ़सा के घर के बाहर जहर खा कर खुदकुशी कर ली थी. घटना के बाद प्रशासन ने कहा, दर्शन सिंह किसान था ही नहीं. इससे अक्रोशित किसान लेहरगा मतें भी ढींढ़सा के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले हैं. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे भट्टल का समर्थन करेंगे कि आम आदमी पार्टी उम्मीदवार जसबीर सिंह का.

लेहरा सीट की अहमियत

लेहरा सीट के चुनाव को कई मायनों में पंजाब विधानसभा चुनावों की झलक माना जा सकता है. यहां कांग्रेस की दिग्गज भट्टल और आप के उम्मीदवार से ढींढसा का मुकाबला है. आप पार्टी ग्रामीणों और युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो चली है.

लेहरा हरियाणा सीमा से मात्र 10 किलोमीटर दूर संगरूर जिले के दक्षिणी छोर पर स्थित है. अकाली दल के जाने-माने नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल 1969 में इस सीट से चुनाव जीते थे. यही सीट कभी वामपंथियों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी. 1980 में यहां से वाम दल का उम्मीदवार जीता था.

लेहरा जैसी महत्वपूर्ण सीट पंजाब का सबसे पिछड़ा हुआ इलाका है. यहां के खस्ताहाल आर्थिक हालात और बेरोजगारी से इस बात की पूरी पुष्टि होती है. यह पंजाब का सबसे उपेक्षित हिस्सा है. लेहरगा के पास के एक गांव के किसान तारसेम सिंह ने बताया ‘‘यहां के किसान भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं.’’

यहां खेती की बड़ी-बड़ी जमीनों पर निजी शिक्षण संस्थान बन चुके हैं. यहां तक कि एक संस्थान की मालिक भट्टल खुद हैं. मालवा में इस क्षेत्र का शिक्षा के केंद्र के रूप में उभरना कस्बे की अर्थव्यवस्था के लिए काफी अच्छा है. लेहरगा में अब हर कहीं कोचिंग सेंटर, फोटोकॉपी और प्रिटिंग व किताबों की दुकानें हैं. और तो और जिस बिल्डिंग में ढींढ़सा ने कार्यकर्ताओं क साथ बैठक की थी, वह भी एक शिक्षण संस्थान ही है.

यहां से बहुत से युवा विदेश जाने के सपने देखते हैं. इसलिए यहां इंग्लिश स्पीकिंग और वीजा सहायता संबंधी शिक्षण केंद्र भी पर्याप्त संख्या में हैं. युवाओं में पश्चिम के प्रति दीवानगी इसी बात से समझी जा सकती है कि बहुत से क्षेत्रों में चाय वाले के साथ ही बर्गर पिज्जा की दुकानें सजी हें तो कई पार्लर खुले हुए हैं, जिनके नाम विदेशी नामों से ही मिलते जुलते हैं. इसलिए लेहरगा का मतदाता अभिलाषा और उम्मीद की मिश्रित भावनाओं से वोट डालेगा. 

बहुत ये युवा मतदाता आप नेता से प्रभावित लगते हैं. आप को वोट डालने की इच्छा जताने वाले वाणिज्य के छात्र गुरदीप का कहना है कि अकाली-भाजपा गठबंधन ने हमारे लिए कुछ नहीं किया. यहां अवसरों की कमी नहीं है. गुरदीप इस बार पहली बार वोट डालेंगे. 

बुज़ुर्गों की राय

बहरहाल, सूबे के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि भट्टल यहां से छठी बार जीतेंगी. दुकानदार एके गर्ग का कहना है, ‘अकाली दल ने अपने वित्त मंत्री को भट्टल के खिलाफ ढींढ़सा को मैदान में उतारा है. सालों से इसे कांग्रेस का गढ़ मानकर वे इस क्षेत्र की उपेक्षा कर रहे हैं. लेकिन यहां से भट्टल ही जीतेंगी.'

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में संगरूर संसदीय क्षेत्र से लेहरा ही एक मात्र ऐसा विधानसभा क्षेत्र था, जहां अकाली दल आगे चल रहा था. बाकी सभी जगह आप की लहर थी और अकाली दल के ढींढसा को भगवंत मान ने 2 लाख से भी ज्यादा वोटों से हरा दिया था.

गर्ग कहते हैं लेहरा में उस समय मोदी लहर का प्रभाव था, इसलिए लोगों ने अकालियों को वोट किया. उस वक्त कांग्रेस की लोकप्रियता काफी कम थी और अब ऐसा नहीं है. अब यहां हर जगह भट्टल के साथ कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के फोटो वाले पोस्टर लगे दिख जाएंगे. कभी धुर विरोधी रहे कैप्टन और भट्टल को आज जीत के लिए एक दूसरे की जरूरत है.

अगर पंजाब में कांग्रेस जीत गई और यहां से भट्टल भी तो यह एक बार फिर वीआईपी सीट बन जाएगी. लेकिन इससे शायद ही लेहरा के किसानों और युवाओं को कोई फायदा पहुंचे.

First published: 18 January 2017, 7:33 IST
 
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