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हाईवे पर शराबबंदी: पतली गली निकालने की तैयारी में उत्तराखंड

आकाश बिष्ट | Updated on: 7 April 2017, 8:59 IST


उत्तराखंड की नवनिर्वाचित भाजपा सरकार के लिए राष्ट्रीय एवं राज्यों के हाईवे पर 500 मीटर के दायरे में शराब बिक्री पर रोक संबंधी सुप्रीम कोर्ट का आदेश जी का जंजाल बना हुआ है. शराब की दुकानें आबादी क्षेत्र में शिफ्ट करने के सरकार के आदेश के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए. खास तौर पर महिलाएं. सरकार को इससे होने वाले राजस्व घाटे की चिंता सता रही है जो अनुमानतः 1200 करोड़ रूपए हैं.


प्रदेश के वित्त एवं आबकारी मंत्री प्रकाश पंत ने बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद करीब 80 फीसदी शराब के ठेके और बार बंद हो गए हैं. परिणाम स्वरूप आबकारी विभाग का अनुमान है कि उसे चालू वित्त वर्ष में 40 प्रतिशत से अधिक घाटा हुआ है. इन शराब की दुकानों से राज्य के आबकारी विभाग को 80 प्रतिशत राजस्व प्राप्त हो रहा था.


देसी-विदेशी शराब के 532 में से 402 ठेके राष्ट्रीय और राज्य के राजमार्गों पर हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बहुत से ठेकों ने अपने लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करवाया. 532 में से केवल 202 ठेकों के ही लाइसेंस नवीनीकृत हुए हैं.


सरकार ने फिलहाल एक माह के लिए पिछली सरकार की आबकारी नीति ही अपनाने का फैसला किया है. एक माह बाद नई आबकारी नीति लाए जाने की संभावना है. इन सभी ठेकों के लाइसेंस 31 मार्च को अवधिपार हो चुके. इन दुकानदारों से कहा गया है कि नई नीति लागू होने तक वे अपने लाइसेंस एक माह के लिए नवीनीकृत करवा सकते हैं. हालांकि शराब ठेकेदारों की ठंडी प्रतिक्रिया देखते हुए सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से किसी तरह किनारा करने की कोशिश में है.

 

यूपी के नक्शे कदम पर


राजस्व घाटे से बचने के लिए राज्य सरकार कैबिनेट में एक प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है, जिसके अनुसार, राज्य के राजमार्गों को जिले की सड़कें घोषित किया जा सकता है. उत्तराखंड सरकार ने उत्तर प्रदेश के मॉडल से प्रेरित होकर यह प्रस्ताव लाने की बात कही है. इसके तहत उत्तर प्रदेश में शहर से गुजर रहे राजमार्गों को जिले की सड़कें और और शहर से गुजर रहे बाईपास को हाई वे क़रार दे दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारी राजस्व घाटे की परेशानी से जूझ रहे कई अन्य राज्य भी सुप्रीम कोर्ट से बचने के लिए ‘पतली गली’ के तौर पर यही नीति अपनाने की तैयारियों में हैं.


हालांकि उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गों के बजाय राज्य के राजमार्गों की संख्या बहुत अधिक है. अब देखना यह है कि सरकार इस तरकीब से कितने शराब ठेके बचा पाएगी. और तो और, राज्य सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित फाइव स्टार होटलों और बार के मामले पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की तैयारी में है. ज्यादातर फाइव स्टार होटल और बार राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही स्थित है.

 

सवाल ठेके की जगह का


शराब के ठेकों को हाईवे से हटाकर आबादी क्षेत्र में शिफ्ट करने के अपने फैसले पर सरकार को काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. खास तौर पर महिलाएं आबादी क्षेत्र में शराब की दुकानों का विरोध कर रही हैं. ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने आबकारी विभाग के कार्यालयों में तोड़-फोड़ की और थड़ी नुमा शराब की दुकानों में भी तोड़-फोड़ की. इससे हताश कई दुकानदारों ने अपने लाइसेंस री न्यू करवाना जरूरी नहीं समझा.


हरिद्वार, अगस्तमुनि, पुरी, देहरादून, ऊखीमठ, गोपेश्वर, रूड़की जैसे इलाकों में महिलाओं का विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हो चला है. इसके चलते बहुत से शराब दुकानदार अपनी दुकानें शिफ्ट करने में नाकाम रहे. देहरादून में 28 तथा हरिद्वार में 69 दुकानों में से 36 नहीं खोली जा सकी. उत्तराखंड महिला मंच की संस्थापकों में से एक कमला पंत ने कैच को बताया कि शराब की दुकानों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के फैसले के खिलाफ हजारों महिलाओं ने जान दे देंगी.

 

उन्होंने कहा, ‘‘शराब की दुकानें शहर और कस्बों से दूर होनी चाहिए. अगर हाईवे की दुकानों को आबादी क्षेत्रों में लाया जाएगा तो सर्वाधिक तकलीफ महिलाओं को ही होगी, क्योंकि शराब के आदी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं. अगर अपराध की दर बढ़ती है तो इससे महिलाएं ही सीधे प्रभावित होती हैं. इसीलिए हम ये दुकानें बंद करने की मांग कर रहे हैं क्योंकि कोई और उपाय है ही नहीं.’’

 

पाबंदी का सवाल


पंत ने कहा, ‘‘उनकी संस्था सालों से राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रही है. जब उनसे पूछा गया कि शराब पर प्रतिबंध से राज्य को होने वाले राजस्व घाटे के बारे में उनका क्या खयाल है तो उन्होंने कहा, ‘‘उत्तराखंड के पास राजस्व आय बढ़ाने के लिए और भी बहुत से संसाधन हैं. हमने सरकार से कह दिया है कि हमें विकास की दरकार नहीं है. इस पैसे को वह हमारा कोष भरने में काम में ले सकते हैं. उत्तराखंड की महिलाएं वैसे ही शराब के सेवन या खपत को देखते हुए काफी दुखी हैं.


नए मुख्यमंत्री ने भी दरअसल कुछ ऐसी ही भावना व्यक्त की थी. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दावा किया था कि उनकी सरकार राजस्व के लिए शराब पर निर्भरता खत्म करना चाहती है. रावत ने हालांकि दावा किया कि उनकी सरकार शराब पर पूर्ण पाबंदी तो नहीं लगाएगी क्योंकि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले दूसरे राज्यों में यह प्रयोग सफल नहीं रहा.

First published: 7 April 2017, 8:59 IST
 
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