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पंजाब: फिलहाल चुनाव में अकाली दल को खारिज करना जल्दबाजी होगी

राजीव खन्ना | Updated on: 8 January 2017, 8:39 IST

ज़्यादातर लोगों को उम्मीद नहीं थी कि पंजाब में अकाली दल फिर से अपने रंग में लौटेगा. 10 महीने पहले तक पंजाब में राजनीतिक आबो हवा कुछ ऐसी थी कि लग रहा था शिरोमणि अकाली दल का नाम पंजाब के राजनीतिक नक्शे से हट जाएगा. 10 साल से राज्य में सत्तासीन अकाली दल एंटी इनकम्बेंसी का सामना कर रहा है.

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री, उनके बेटे और उप मुख्यमंत्री को नीचा दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. लेकिन लगता है अकाली अब उनसे मुकाबले को पूरी तरह तैयार हैं. पंजाब में मतदान में अभी एक ही महीना बाकी है और आप पार्टी में अंदरूनी मतभेद व कांग्रेस का प्रचार ढीला पड़ने के बाद लगता है अब अकालियों ने राहत की सांस ली है और अब वे पंजाब के चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में लगे हैं.

बादलों ने बदला हवा का रुख

गत वर्ष मार्च में जब राज्य विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था तो बादल काफी सक्रिय भूमिका में नजर आए. उस वक्त आप पार्टी राज्य में नशे की समस्या और किसान आत्महत्या जैसे मुद्दों पर राजनीति कर रही थी. कांग्रेस के प्रदेश इकाई अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी पार्टी की कमान संभालते ही बादल परिवार को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. 

अकालियों के लिए पंजाब में राज्य भर में धार्मिक पुस्तकों के अपमान का मामला, दिना नगर और पठानकोट में आतंकी हमले और बेरोजगारी व औद्योगिक रफ्तार का कमजोर पड़ना बड़े मुद्दे बन चुके थे. उस वक्त बादल ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था. बजट सत्र का एजेंडा तय करते वक्त ही उन्होंने पंजाब के जल बंटवारे और सतलुज-यमुना लिंक नहर के निर्माण का मामला उठा दिया था.

कांग्रेस जहां इस मुद्दे पर अकालियों के हर कदम का विरोध करती, आप पार्टी मूक दर्शक की ही भूमिका में रही क्योंकि उसकी विधानसभा में कोई उपस्थिति थी ही नहीं. अब अकाली दलज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अनुसरण किया. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने गुजरात अस्मिता का सवाल उठाया था; ठीक उसी तरह बादल ने विपक्ष पर पंजाब और पंजाबियों को बदनाम करने का आरोप लगाना शुरू कर दिया.

मुख्यमंत्री और उनके बेटे द्वारा इसे लेकर विपक्ष पर प्रहार करते विज्ञापनों की तो जैसे हर जगह झड़ी सी लग गई. साथ ही उन्होंने शिअद-भाजपा गठबंधन सरकार के पिछले 10 साल की उपलब्ध्यिां भी गिनाना शुरू कर दिया. जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस सरकार के कार्यकाल में भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है, वहीं वह भी जानता है कि पंजाब में आधारभूत विकास भी हुआ है. सड़कें नई बन गई हैं. स्टेडियम बन गए.

पंजाब की कहानी

प्रकाश सिंह बादल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कोई उन्हें कम न समझे. लोगों को याद होगा कि 1997 के चुनाव में बादल-गुरचरण सिंह टोहरा गठबंधन के नेतृत्व में लड़ा गया चुनाव अकालियों के लिए महत्वपूर्ण रहा, जब उन्होंने विधानसभा चुनाव जीता था.

अभी 90 साल की उम्र में बादल पूरे प्रदेश के दौरे पर हैं और दूर-दराज के गांव-कस्बों में संगत-दर्शन के कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. वे इस अवसर का उपयोग जनका के साथ संवाद करने और अपने कार्यक्रमों की घोषणा करने के लिए कर रहे हैं.

पंजाब की चुनावी तस्वीर का एक पहलू बादल परिवार के पक्ष में जा सकता है, वह यह कि भले ही प्रदेश के वित्तीय हालात खराब हों; पिछले एक साल में अकालियों ने जनता के लिए घोषणाओं की बौछार कर दी. राज्य सरकार की विभिन्न नौकरियों में भारी संख्या में भर्ती हुई है. अफसरों की तरक्की की गई और उन्हें उनकी पसंद की जगह पोस्टिंग दी गई. जब विपक्ष शिरोमणि अकाली दल पर राज्य पर 2 करोड़ रूपए का कर्ज चढ़ाने का आरोप लगा रहा था, तब अकाली दल ये घोषणाएं कर रहा था. 

बादल की एक और रणनीति धर्म आधारित राजनीति है जो सालों से शिअद का ट्रेड मार्क रहा है. पवित्र शहर अमृतसर का सौंदर्यीकरण और बादल की मुख्यमंत्री तीरथ दर्शन यात्रा इसी के तहत उठाए गए हैं. इस यात्रा के लिए प्रदेश के लोगों को ट्रेन से निशुल्क यात्रा की सुविधा दी जाएगी.

सरकार ने 20 दिसम्बर से ‘‘भगवान वाल्मिकी जी की दर्शन यात्रा’’ आयोजित की. इसके तहत अमृतसर में एक बड़े कार्यक्रम में 800 किलोग्राम वजनी छह फीट ऊंची गोल्ड प्लेटेड प्रतिमाएं लगाई जाएंगी. 

टिकट बंटवारा

अकाली दल टिकट बंटवारे को लेकर भी काफी फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. अपने पारम्परिक प्रतिद्वंदी कांग्रेस के विपरीत उन्होंने काफी पहले ही टिकट बंटवा दिए. इससे अकाली उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए अच्छा खासा समय मिलेगा. 

टिकट बंटवारे में काफी ध्यान रखा गया है. मौजूदा 15 विधायकों को टिकट नहीं दिए गए. 26 सीटों पर नए चेहरों को खड़ा किया गया है. इनमें छह हिन्दू चेहरे हैं, जो ‘‘जीत सकते हैं.’’ हालांकि सीटों की संख्या पिछली बार से 11 कम है. 

34 विधायकों को उनकी ही पारम्परिक सीट से मैदान में उतारा गया है. 7 को अपेक्षाकृत सुरक्षित सीट से टिकट दिया गया है. 12 उम्मीदवार तो ऐसे हैं जो पिछली बार हारने के बावजूद इस बार दोबारा मैदान में उतारे गए हैं. पिछले दो माह से बागियों को मनाने में जुटी सरकार ने तय किया कि पार्टी अपने कई नेताओं को सरकारी क्षेत्र के बोर्डों में नियुक्ति देगी. रिपोर्टों के अनुसार इन संभावित बागियों की संख्या 300 तक हो सकती है.

बादल बनाम कार्यकर्ता

शिरोमणि अकाली दल की प्राथमिकता सीनियर बादल को पार्टी का चेहरा बनाने की है; सुखबीर को नहीं. कई जगहों पर बादल परिवार को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा है, इसीके मद्देनजर यह फैसला किया गया है. सुखबीर को जहां अक्खड़ मिजाज का माना जाता है, वहीं सीनियर बादल सहज हैं. 

हाल ही कुछ ऐसे वाकये हुए जब कार्यकुमों में संबोधन के दौरान दोनों बादल नेताओं को लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा; यहां तक कि उनके अपने क्षेत्रों में भी. ऐसे कार्यक्रम भी हुए जब अकाली कार्यकर्ताओं सहित लोग कार्यक्रम में आए ही नहीं और खाली सीटों पर छात्रों को बिठाना पड़ा.

दरअसल अकाली कार्यकर्ताओं में एक दूसरे के प्रति अक्रोश के कारण यह स्थिति आई है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अकाली दल के कार्यकर्ता पार्टी से नाराज नहीं हैं, बल्कि बादल परिवार से नाराज हैं. पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन्हें पार्टी के साथ बनाए रखना है. और अगर अकाली दल एकजुट रहा तो संख्या बल की दृष्टि से वे बेहतर स्थिति में होंगे क्योंकि विपक्ष के वोट आप, कांग्रेस और ऐसे ही अन्य छोटे-छोटे दलों में बंट जाएंगे.

देखना यह है कि क्या अकाली दल अपने पारम्परिक वोट बरकरार रख पाएगा और बादल परिवार पार्टी के असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को मना कर पार्टी के भीतर ही रख पाएगा? जैसा कि कभी टोहरा ने किया था.

First published: 8 January 2017, 8:39 IST
 
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