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प्रधानमंत्री के गृहराज्य में भाजपा नेताओं ने कोऑपरेटिव बैंको के जरिए नोटबंदी को चूना लगाया

रथिन दास | Updated on: 11 January 2017, 7:40 IST
(कैच न्यूज़)

नोटबंदी के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मकसद काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ना था लेकिन उनके अपने गृह राज्य गुजरात में सहकारी बैंकों ने प्रधानमंत्री के इस फैसले को धता बता दी है. नोटबंदी के बाद इन बैंकों में जिस भारी संख्या में पुराने नोट जमा हुए उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गुजरात में लेन-देन में काले धन का बेधड़क इस्तेमाल होता है.

गुजरात के 20 जिलों के इन सहकारी बैंकों पर पिछले 10 सालों से भाजपा नेताओं या उनके अनुयायियों का ही कब्जा है. इसलिए ताज्जुब करने की जरूरत नहीं कि इन सहकारी बैंकों की उच्चतम संस्था गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के निदेशकों में से एक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हैं. 

इतना ही नहीं, गुजरात के स्वास्थ्य राज्य मंत्री शंकर चौधरी इस बैंक के वाइस चेयरमैन हैं. हालांकि कानून के जानकारों का मानना है कि दोनों ही भाजपा नेताओं का इस पद पर होना किसी भी प्रकार से गैर कानूनी नहीं है, क्योंकि वे कानूनी तौर पर किसी भी लाभ के पद पर नहीं हैं.

नोटबंदी के बाद करोड़ों जमा हुए

लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद इस बैंक में करोड़ों रूपए के नोट जमा किए गए. 8 नवम्बर की रात नोटबंदी की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद इस सहकारी बैंक की एक शाखा में 500 करोड़ रूपए जमा हुए. 8 नवम्बर की रात प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था कि वे काले धन से लड़ने, भ्रष्टाचार मिटाने, आतंकवाद से निपटने और जाली नोटों से छुटकारा पाने के लिए 500 और 1000 रूपए के नोट बंद कर रहे हैं.

यह दीगर बात है कि प्रधानमंत्री के सुर जल्दी ही कालेधन-भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बजाय कैशलैस और डिजिटल इकॉनॉमी की बातों में तब्दील हो गए. नोटबंदी की घोषणा वाली रात ही इतनी नकदी जमा हो गई कि आयकर विभाग पशो-पेश में पड़ गया क्योंकि विभाग ने बड़ी भारी मात्रा में जमा नकदी के लिए जांच की बात कही है. 

ठंडे बस्ते में महेश शाह

आसानी से समझा जा सकता है कि इस मामले में भी आयकर विभाग की जांच का वही हश्र हुआ होगा जो महेश शाह द्वारा 13,860 करोड़ रूपए के कालेधन के खुलासे के मामले में हुआ.

प्रॉपर्टी डीलर महेश शाह ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि उनके पास भारी मात्रा में काला धन है और इसे वे 45 प्रतिशत टैक्स और जुर्माना दे कर ‘सफेद’ करवाना चाहते हैं. जोश में आकर आयकर अधिकारी महेश शाह को एक लोकल टीवी पर चल रहे लाइव इंटरव्यू के दौरान उठा कर ले गए लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा कि यह काला धन उनका नहीं है और बड़े-बड़े राजनेताओं का है, यह सुनते ही आयकर अधिकारियों का सारा जोश ठंडा पड़ गया. इन राजनेताओं में एक नाम राजकोट के एक नेता का भी है जो अब कर्नाटक शिफ्ट हो गए हैं.

महेश शाह ने टैक्स और जुर्माना चुकाने के बाद बचे काले धन से कमीशन कमाने के लालच में यह खुलासा किया था. उसने आयकर अधिकारियों को यह कहकर धमकाने की कोशिश की कि अगर उन्होंने इस 13,860 करोड़ रूपए के मामले की छानबीन करने की कोशिश की तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं. 

राजकोट को-ऑपरेटिव कांड

आयकर अधिकारियों ने भी आसान रास्ता चुनते हुए महेश शाह के खुलासे को बकवास करार दिया और उस पर अधिकारियों को दिग्भ्रमित करने का छोटा-मोटा आरोप लगा कर छोड़ दिया. लेकिन आयकर अधिकारियों के लिए महेश शाह जैसे सिरदर्द से छुटकारा पाते ही एक और समस्या आ खड़ी हुई. 

राजकोट के एक को-ऑपरेटिव बैंक में नोटबंदी की घोषणा के बाद 871 करोड़ रूपए की संदिग्ध राशि जमा की गई. नोटबंदी के बाद इस बैंक में 4,500 नए अकाउंट खोले गए. इनमें से 62 खातों का सम्पर्क सूत्र एक ही मोबाइल नंबर है. इन खातों में 9 नवम्बर से 30 दिसम्बर के बीच 500 और 1000 रूपए के पुराने नोट के रूप में 871 करोड़ रूपए जमा हुए. इसी दौरान संदिग्ध तरीके से 108 करोड़ रूपए निकाले गए.

आयकर अधिकारियों ने पाया इस अवधि में जितने अकाउंट खोले गए, जितना पैसा जमा किया गया और निकाला गया. वह पिछले सालों में साल की इसी अवधि के दौरान हुए लेन-देन के मुकाबले बेहद अधिक है.

बैंक की अधिकतर पर्चियों में न तो पैन नम्बर था और न ही हस्ताक्षर, जैसा कि बैंकिंग नियमों के तहत जरूरी है. बैंक के पूर्व निदेशक के बेटे को एक करोड़ रूपए का भुगतान करने के लिए 30 खातों में से जमा रकम निकाली गई. इसके लिए जो पर्चियां भरी गई, वह एक ही व्यक्ति ने भरी थी.

घोटालेबाज़ भाजपाई

आयकर जांच से पता चला है कि बैंक के वाइस चेयरमैन की मां के खाते में 64 लाख रूपए जमा किए गए. यह सारा लेन-देन चौंकाने वाला जरूर है लेकिन गुजरात और गबन का पुराना नाता है. 2001 में माधवपुरा मर्केन्टाइल को-ऑपरेटिव बैंक (एमएमसीबी) में 800 करोड़ रूपए से ज्यादा का घोटाला हुआ. मुंबई के दलाल केतन पारेख ने यह घोटाला किया.

इस घोटाले में जिन लोगों का पैसा डूबा; उनमें अहमदाबाद के कई भाजपाई भी शामिल थे. जब उन्हें पता चला कि गुजरात से भाजपा के ही राज्यसभा सांसद केतन पारेख की जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं तो उन्होंने भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन भी किया.

गुजरात में भाजपा के 22 साल के शासन के दौरान इसके दो सांसदों को उनके को-ऑपरेटिव बैंकों में घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया गया. हालांकि वे बाद में जमानत पर छूट गए और दोबारा चुन भी लिए गए.

इन सारे किस्सों से 15 साल पहले कहा गया एक पत्रकार का चुटकुला याद आता है कि दिल्ली से आए एक आदमी ने जब किसी के घर के बाहर जूता खुला देखा तो उसे लगा कि यहां से उसके जूते चोरी न हो जाए. तब गुजरात के एक पत्रकार ने कहा, ‘ये ऐसी छोटी-मोटी चोरियां नहीं करते; ये पहले एक को-ऑपरेटिव बैंक खोलेंगे, अपने परिजनों को उसमें निदेशक बनाएंगे और फिर पैसों का गबन करेंगे.’

कई बार मजाक में कही गई बात सच भी हो जाती है.

First published: 11 January 2017, 7:40 IST
 
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