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गोवा: IIT कैंपस के लिए बंदूक के साए में ग्राम सभा

निहार गोखले | Updated on: 14 December 2016, 7:43 IST
(निहार गोखले/कैच न्यूज़)

दिन रविवार 27 नवंबर. स्थान गोवा के दक्षिणी छोर के एक गांव लोलियम का एक स्कूल. स्कूल में तैनात करीब 120 सिपाही, लाठियों से लैस गार्ड, ऑटोमेटिक बंदूकों वाले अन्य बारह लोग, तीन उप-निरीक्षक, एक पुलिस निरीक्षक, एक पुलिस उप अधीक्षक और जिला उप कलेक्टर.

आसमान साफ था, हवा बिल्कुल ठहरी हुई. पश्चिमी घाटों के पास के घने जंगल में भी एकदम चुप्पी. ऐसा नजारा तो अंडरवर्ल्ड के गिरोह या काले धन के गुप्त ठिकाने पर पुलिस छापे का ही हो सकता था. पर यह सारा बंदोबस्त लोलियम की पंचायत द्वारा बुलाई एक ग्राम सभा के लिए था. 

यह दक्षिण गोवा के कानाकोना तालुक का वन गांव है, जहां 5000 लोग रहते हैं. ग्राम सभा में 1700 से ज्यादा लोग मौजूद थे, आमतौर पर आने वालों से तीन गुना ज्यादा.

आईआईटी संस्था के लिए इस गांव की 300 एकड़ जमीन लेने की घोषणा की गई है, लोलियम में इससे बेहद नाराजगी है

अरब सागर की ओर पीठ किए पश्चिम घाट पर बसे लोलियम गांव के ग्रामीणों ने अपने जीवन में ऐसा नजारा कभी नहीं देखा था, ना तो सशस्त्र सिपाही और ना ही सभा में इतने ग्रामीण. ग्राम सभा में 1700 से ज्यादा लोग मौजूद थे, आमतौर पर आने वालों से तीन गुना ज्यादा. 

इससे ग्रामीणों को कोई आश्चर्य नहीं था. पिछले 6 महीनों में राज्य के बाहर के ज्यादातर मीडिया का ध्यान इस ओर नहीं गया कि जब से गोवा कैंपस की आईआईटी संस्था को इस गांव की 300 एकड़ जमीन पर लाने की घोषणा की गई है, लोलियम बहुत ज्यादा नाराज है.  

गांव दो भागों में बंट गया है. गांव के ज्यादातर लोग आईआईटी के विरोध में हैं और छोटा मगर ताकतवर लोगों का समूह सरंपच के नेतृत्व में इसका समर्थन कर रहा है.

धीरे-धीरे उनमें मतभेद बढ़ता गया क्योंकि राज्य सरकार ने इसका विरोध कर रहे लोगों की बात पर ध्यान नहीं दिया. 2017 में राज्य चुनावों से पहले आईआईटी को जमीन सौंपने को लेकर बढ़ती निराशा से गतिरोध जारी रह सकता है और संभव है स्थिति और बिगड़ जाए. गोवा शायद पहला राज्य होगा, जहां आईआईटी के लिए जमीन को लेकर विवाद चल रहा है.

बंटा गांव

मई में पहली बार आईआईटी कैंपस की घोषणा के बाद कई ग्रामीण, डेनिस फर्नांडीस (39)के नेतृत्व में लोलियम की नागरिक समिति के तौर पर संगठित हुए. उन्होंने आईआईटी और राज्य सरकार को चिट्ठी लिखी, जिसका काम भूमि लेना-देना है. इस चिट्ठी में उन्होंने भगवती मोल के 1000 एकड़ के पठार पर कैंपस बनाने पर आपत्ति जताई. उन्होंने लिखा कि इस पठार पर कोई नहीं रहता, पर यह सभी ग्रामीणों के लिए है, जहां वे अपने पशुओं को चराते हैं. मानसून में खेती करते हैं और काजू उगाते हैं.

समिति ने दावे के साथ कहा कि पठार की झिरझिरी लेटराइट चट्टान, भारत के पश्चिमी तट की देशज चट्टान है. यहां ग्रामीणों के घरों और खेतों के कुओं का पुनर्भरण होता है, जो अरब सागर के पास के स्तर तक आने से पहले पठार के वनीय ढलान पर हैं. भगवती मोल ग्रामीणों के लिए पवित्र स्थान भी है. यहां भगवती मंदिर है और वार्षिक धार्मिक जुलूस का मार्ग भी. यहीं आईआईटी का आना प्रस्तावित है.

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे आईआईटी के विरोध में नहीं है, बल्कि उस जगह के जो इसके लिए तय की गई है. समिति का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि आईआईटी कैंपस से ग्रामीणों को पानी की आपूर्ति रुक जाएगी, जो पहले से कमी का सामना कर रहे हैं. 

इससे पठार के तेंदुए और बाइसन जैसे वन्यजीव भी प्रभावित होंगे. इस इलाके को माधव गडगिल और के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ समितियों ने पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवेदनशील बताया था. आईआईटी कैंपस के लिए प्रस्तावित जमीन भगवती मोल ग्रामीणों के लिए पवित्र स्थल है.

आईआईटी के समर्थकों का नेतृत्व गांव के सरपंच भूषण प्रभु गोआनकर कर रहे हैं. उनका समूह माइंड यानि मूवमेंट फॉर आईआईटी एंड नेशनल डवलपमेंट के तौर पर जाना जाता है. इस समूह में इस इलाके में स्कूल चला रहे प्रशांत नायक और पूर्व सरपंच मोहनदास लोलियमकर भी हैं. 

समर्थकों का दावा है कि आईआईटी कैंपस से स्थानीय अर्थव्यवस्था में इजाफा होगा, जहां खेती को छोडक़र अन्य क्षेत्रों में कम नौकरियां हैं. समर्थकों का यह भी दावा है कि यहां गोवावासी प्रवेश ले सकेंगे, और स्थानीय लोगों को काम के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अवसर मिलेंगे, जिनमें से कई काम के तलाश में गांव छोड़ चुके हैं. राज्य की ज्यादातर मीडिया भी आईआईटी का मौखिक समर्थन करती है. 

हालांकि ना तो राज्य सरकार और ना ही आईआईटी प्रशासन ने ग्रमीणों की बात पर कान दिया है और उनका सर्वे जारी है. इसीलिए ग्रामीणों ने ग्राम सभा की मांग की ताकि इस मुद्दे पर चर्चा और उसके पक्ष-विपक्ष में वोट लिए जा सकें.

26 अक्टूबर को एक अन्य सभा में करीब 500 लोगों ने महज चार विरोधों के साथ एक प्रस्ताव का समर्थन किया. प्रस्ताव में भगवती मोल सहित गांव के सभी पठारों पर निर्माण कार्य प्रतिबंध करने के लिए कहा गया था. प्रस्ताव के समर्थकों में पंचायत के सभी आठ सदस्य थे, सिवाय सरपंच के. 

लोगों को चुनाव की तरह बांट रहे

इस ग्राम सभा वाले हफ्ते में सरपंच प्रभु गोआनकर ने कुछ अन्य लोगों के साथ गांव में कई गुप्त बैठकें रखीं, ताकि वे ग्राम सभा में अपने पक्ष में वोट ले सकें. हिंदु प्रभुत्व वाले एक छोटे गांव में सरपंच ने एक गुप्त बैठक में गांव वालों से कहा कि वे चर्च के समर्थन से हो रहे प्रचार का साथ नहीं दें. शायद उनका इशारा डेनिस फर्नांडीस की ओर था. 

सरपंच ने कहा कि फर्नांडीस ने गांव के कल्याण के लिए ‘एक पैसा खर्च नहीं’ किया है. दरअसल वे आईआईटी की प्रस्तावित जमीन के पास के काजू के पौधों को बचाना चाहते हैं. उन्होंने कहा, ‘आपके ज़ेहन में लोग नकारात्मक विचार डाल रहे हैं. आपको विकास का समर्थन करना चाहिए.’ यहां सरपंच की टिप्पणी से नाराज ग्रामीणों ने उनका विरोध किया. बालकृष्ण चारी ने कहा, ‘ये यहां चुनाव की तरह लोगों को बांट रहे हैं.’ 

ग्राम सभा

अधिकांश ग्रामीण यह देखकर हैरान थे कि सभा में वही अधिकारी थे, जिन्होंने गांव वालों की बात पर पहले कोई प्रतिकिया नहीं की थी: राज्य शिक्षा सचिव नीला मोहनन और राज्य निदेशक, शिक्षा विवेक कामत. इनके अलावा आईआई टी स्टाफ-आईआईटी गोआ के प्रभारी प्रो. शिव प्रसाद, और प्रो, रोडने फर्नांडीस भी थे. रोडने उसी इलाके से हैं. हालांकि राज्य सरकार ने अपना वरिष्ठतम स्टाफ भेजा (मंत्रियों की कमी के कारण), पर गांव वाले संतुष्ट नहीं हुए. 

दो घंटे से ज्यादा समय तक गांव वालों ने नौकरियों, पानी और मार्ग से धार्मिक जुलूस निकालने की अनुमति होगी या नहीं, इस संबंध में सवाल पूछे. ज्यादातर प्रश्न पानी को लेकर थे, खासकर तब जब शिक्षा सचिव ने बताया कि कैंपस में 10 लाख लीटर पानी की रोज खपत होगी. 

शिक्षा सचिव की बात पर लोलियम पंचायत के चुने हुए 9 सदस्यों में से एक चीख पड़े, ‘यह पानी कहां से आएगा? पिछले 35 साल से मुझे रोज केवल एक घंटा पानी मिल रहा है.’

हालांकि अधिकारियों ने कहा कि वे गांव के लिए एक टैंक बनवाएंगे, पर ज्यादातर गांव वाले असंतुष्ट थे. सवाल था कि पानी कहां से आएगा? यह इलाका एक ओर पर्वतों से घिरा है और दूसरी ओर समुद्र से, इसलिए पानी के लिए किसी पर भरोसा नहीं कर सकते. 

आखिर में मोहनन ने कहा कि पानी के नए स्रोतों के आकलन के लिए राज्य सरकार की साइंस एंड टेक्नोलोजी इनोवेशन काउंसिल के अधीन एक समिति बनाई गई है. शिक्षा सचिव कहते हैं कि कैंपस में करीब दस लाख लीटर पानी की रोज खपत होगी. 

धार्मिक जुलूस निकालने के मार्ग से संबंधित प्रश्नों का जवाब देते हुए प्रो शिव प्रसाद ने केवल यही कहा कि स्थानीय लोगों के साथ सहयोग रखे बिना आईआईटी वाले टिक नहीं सकते. आईआईटी बॉम्बे ने भी अपने परिसर में पद्यावती मंदिर का कायाकल्प करवाया था. 

जब दो घंटे बाद वोट लेने की बारी आई, स्टाफ और अधिकारी स्कूल परिसर से बाहर निकल गए. गांव वालों को इससे भी ज्यादा हैरानी तब हुई, जब सरपंच ने सभा स्थगित करने की घोषणा कर दी. केवल 500 लोग हस्ताक्षर कर पाए थे, और शाम 5 बजे से पहले सभी को कवर नहीं किया जा सकता था. पुलिस की हिफाजत में सरपंच पंचायत सचिव के साथ वहां से निकल लिए. 

गांव वालों को इसकी उम्मीद नहीं थी, वे भडक़ उठे. कई औरतें और पुरुष बाहर भागे और उनकी कार को घेर लिया, जो वहां से निकल रही थी. इस हंगामे की वजह से पुलिस ने लाठियां चलाईं, और सरपंच ने अपनी कार निकाल ली. 

इस तरह अचानक सभा स्थगित करने से लोग नाराज थे. उन्होंने यहां आने के लिए बसें किराए पर की थीं. वे इस स्थगन के कारण से संतुष्ट नहीं थे और उसे रहस्यमय पाया. पास की एक स्कूल में प्रयोगशाला सहायक सिद्धार्थ अईया ने कहा, ‘यह सत्ता का घोर दुरुपयोग है. यहां ज्यादातर लोग आईआईटी के विरोध में थे, इसलिए उन्होंने ग्राम सभा स्थगित कर दी. ’

हालांकि ज्यादातर गांव वाले जा चुके थे, करीब 500 लोग पंचायत के चुने हुए चार सदस्यों के साथ उस स्थल पर फिर से इकट्ठा हुए. उन्होंने आईआईटी कैंपस के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया. जब कैच ने उप कलेक्टर केदार नायक से पूछा कि क्या यह प्रस्ताव वैध है, तो उन्होंने टिप्पणी देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, ‘मैं यहां केवल सुरक्षा व्यवस्था के लिए हूं.’

उसके बाद

30 नवंबर को गोवा सरकार में पंचायतों के निदेशक गुरुदास पिलामेकर ने पंचायत को एक ज्ञापन दिया कि चार पंचायत सदस्यों का प्रस्ताव वैध है. उन्होंने प्रेस से कहा कि सरपंच की सभा को स्थगित करने की वजह वैध नहीं थी. 

पर 2 दिसंबर को पिलामेकर ने ही प्रस्ताव को अवैध बता दिया. उन्होंने मीडिया से पहले कहा था कि स्थगन वैध नहीं था, पर उनका नया बयान विभाग की ओर से की गई जांच पर आधारित था कि स्थगन वैध था, प्रस्ताव नहीं. 

उसी दिन सरपंच ने पंचायत के तीन अन्य सदस्यों के साथ गोआ के मुख्यमंत्री परसेकर को एक चिट्ठी भेजी कि आईआईटी से पानी एवं सुरक्षा आदि पर होने वाले प्रभाव पर जांच की जाए. 

पर उसी दिन सरपंच ने दो औरतों सहित आठ ग्रामीणों पर दंगे, गलत अवरोध और हमले के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई. एफआईआर में उन्होंने कहा कि ‘ग्रामीणों के हाथों में पत्थर थे, जो उन्होंने उनकी कार पर जाते समय फेंके . ’

कैच को प्रभु गोआनकर ने बताया कि पंचायत अपनी एक बैठक में ग्राम सभा की तारीख तय करेगी. उन्होंने आगे कहा कि वह प्रस्ताव कोई मायने नहीं रखता क्योंकि आईआईटी राष्ट्रीय प्रोजेक्ट है और यह अभी स्पष्ट नहीं है कि कि ग्राम सभा को उस पर कुछ कहने का कानूनी अधिकार है या नहीं.

  

गांव में तनाव

स्कूली छात्र शुभम लोलेकर के माता-पिता भी प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं. शुभम ने हाल में खुलासा किया कि उन पर टीचर ने उंची आवाज में  ‘दबाव’ डाला कि वह अपने माता-पिता से कहे कि वे आईआईटी का समर्थन नहीं करें. छात्र ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि ‘मुझ पर दबाव डाला गया...मैं सिद्ध कर सकता हूं.’

हताश सरकार

जब आईआईटी गोवा का उसके अस्थाई स्थान पर जुलाई 2016 में उद्घाटन किया गया था, केंद्रीय रक्षा मंत्री और गोआ के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर परिर्कर ने प्रेस से कहा था, ‘गोआ में विरोध का चलन है. इन विरोधों के उठने से पहले हम जमीन अधिग्रहीत करना चाहते हैं.’ 

बेशक सरकार की जिन फाइलों को एक्टिविस्टों ने आरटीआई के माध्यम से देखा है, उनसे लगता है कि जनवरी 2016 में जमीन लेने की प्रक्रिया शुरू करने के समय से ही गांव वालों को अंधेरे में रखा गया. 

ज्यादा लोगों का विरोध होने के बावजूद राज्य सरकार दावा करती रही कि बहुत कम गांव वाले इस प्रोजेक्ट के विरोध में हैं. कानाकोना निर्वाचन क्षेत्र से विधायक और खेल मंत्री रमेश तवाडकर ने हाल में कहा कि विरोध का मार्गदर्शन गलत है और उनके दावे कुछ ‘गलतफहमियों’ की वजह से हैं. लोलियम इसी निर्वाचन क्षेत्र में है. 

सरकारी रिकार्ड बताते हैं कि 2014 से ही आईआईटी गोवा के लिए जमीन की कोशिश चल रही है, पर राज्य सरकार के लिए आखिरी और एकमात्र विकल्प लोलियम है. शुरुआत में उत्तरी गोवा में परनेम में आईआईटी खोलने की योजना थी. पर सरकार ने मना कर दिया क्योंकि इसके लिए निजी संपत्ति का करीब 200 एकड़ चाहिए था. परनेम गोवा के मुख्यमंत्री परेसकर का निर्वाचन क्षेत्र है. 

ग्राम सभा के एक हफ्ते पहले यह संवाददाता भगवती पठार गया था. चट्टानों पर कमर तक उंची घास उगती है, जिसे केवल मवेशी ही नहीं, बाइसन जैसे वन्यजीव भी खाते हैं, जो पठार के पार कोटिगाओ वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी से आते हैं. जिस जगह आईआईटी बनने का प्रस्ताव है, हमने जंगली खरगोश के अलावा चीते और पेंगोलिन की लीद देखी. स्थानीय लोग पाइथंस के होने की जानकारी भी देते हैं.  

यहां के तीन स्थानीय लोगों ने मेरा मार्गदर्शन किया. वे बचपन से इन पठारों पर चढ़ते रहे हैं. उन्होंने पेड़ों के झुरमुट के पीछे एक छिपी गुफा की ओर इशारा किया. दो फुट उंची गुफा वहां है, जहां चीता रहता है. यहां पाइथोंस देखे अभी साल भी नहीं हुआ है. 

जैसे ही हम घास के मैदान पर आगे बढ़े, हमारे साथ-साथ कलगीदार सर्प चील चल रही थी. वह घास पर बार-बार झपट रही थी, मानो शिकार की टोह में हो. और कुछ देर बाद ही हमने एक छोटी चिड़िया के अवशेष देखे. उसका हरे रंग का सिर, पंख और कुछ हड्डियां बची थीं. हालांकि आईआईटी चयन समिति इसे बंजर चट्टानी भूमि मानती है, परपठार जीवन से भरपूर है. यह महज प्राकृतिक स्थल नहीं है.

हमने चट्टानों का समूह देखा, जिनके बीच से एक सूखा पेड़ निकला हुआ था. एक बुजुर्ग ग्रामीण फ्रेंक रबेलो, जो बचपन से यहां पठारों पर आते रहे हैं, रुके और एक सबसे बड़ी चट्टान को नमन किया. पास से देखा तो चट्टान पर कुछ सिक्के पड़े थे. ‘ये हमारे पुश्तैनी देवता हैं. यह हमारे वार्षिक जुलूस के रास्ते में आते हैं.’ बाद में जब हम ढलान से गांव लौट रहे थे, उन्होंने कहा, ‘मैं इस भूमि के लिए जान दे सकता हूं.’

First published: 14 December 2016, 7:43 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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