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वाइब्रेंट गुजरात: मंदिर के लिए दलितों ने दिया दान, फिर भी प्रवेश नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 April 2017, 9:51 IST


प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य गुजरात, जी हां वाइब्रेंट गुजरात में समाज की सदियों पुरानी फाल्टलाइन्स बार—बार उभर आ रही हैं. इस बार की घटना पिछले साल उना की घटना जितनी मनहूस तो नहीं है जिसमें दलितों से मारपीट की गई थी पर इस घटना ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि गुजरात में दलित अब भी बहिष्कृत और अछूत हैं, वह भी ऐसे समय में जबकि संघ परिवार घोषित रूप से राज्य में सभी जाति के हिंदुओं को एक ही छाते के नीचे लाने की कोशिश कर रहा है.


यह घटना भड़ूच जिले के बोरिद्रा गांव की है जिसमें दलितों से उस मंदिर के एक समारोह से दूरी बनाए रखने के लिए कहा गया जिसमें उन्होंने खुद उदारतापूर्वक दान दिया था. इस गांव में लगभग 1500 लोग रहते हैं जिसमें 12 परिवार दलित समुदाय के हैं. गांव के माधवदेव मंदिर में 2 अप्रैल को एक नई मूर्ति की स्थापना होनी थी. पर जब कुछ दलितों ने इस कार्यक्रम में उच्च जातियों के साथ भाग लेने की इच्छा जाहिर की तो मंदिर के एक ट्रस्टी ने उन्हें पूजा में भाग लेने की अनुमति देने से साफ मना कर दिया.

इस समारोह में भाग लेने के इच्छुक एक दलित मनोज चौहान ने इसकी शिकायत पुलिस और दूसरे अधिकारियों से कर दी. इसके बाद मंदिर के ट्रस्टी ने कार्यक्रम को एकतरफा रूप से गांव के सरपंच को भी सूचित किए बिना आगामी किसी दिनांक तक के लिए स्थगित कर दिया.

 

आरोप


गांव के एक और दलित सन्मुख परमार ने बताया कि जब हमने मंदिर के मुख्य ट्रस्टी नरोत्तम पटेल से संपर्क किया तो उन्होंने हमें बताया कि सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार दलितों को इस समारोह में भाग नहीं लेने दिया जा सकता. सन्मुख के अनुसार मंदिर के नवीकरण तथा पूजा समारोह कार्यक्रम के लिए गांव के सभी लोगों ने दान दिया था पर जब बात पूजा में बैठने की आई तो साफ कह दिया गया कि दलित इस पूजा में बैठने के अधिकारी नहीं हैं. इस बात से वे गुस्से में हैं.


इसके बाद दलितों ने गांव के उप सरपंच प्रद्युम्न पटेल से संपर्क किया पर उन्होंने अपनी विवशता जाहिर कर दी क्योंकि वे गांव के प्रभुत्वशाली कोली समुदाय से आने वाले ट्रस्टी को चुनौती देने में असमर्थ थे. इसके बाद बीमारी का बहाना करते हुए नरोत्तम पटेल अस्पताल में भर्ती हो गया, जिससे समारोह की तारीख को आगे बढ़ाया जा सके. पटेल के अस्पताल में रहते हुए पूजा की पूर्व संध्या पर समारोह के अन्य आयोजकों ने कार्यक्रम को किसी आगामी दिनांक तक के लिए स्थगित कर दिया. लेकिन दलितों ने इसकी शिकायत पुलिस के साथ—साथ भड़ूच कस्बे में अपने स्थानीय नेताओं से भी कर दी जिन्होंने हालात का जायजा लेने के लिए गांव का दौरा भी किया.

स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए गांव में एकता, समरसता और बंधुत्व का उपदेश देने वाले आरएसएस के नेता भी सुलह कराने के लिए भागे—भागे गांव पहुंचे. गुजरात के सामाजिक कल्याण मंत्री आत्माराम परमार भी इस स्थिति पर गांधी नगर से नजर रखे हुए थे और अधिकारियों से ताजा जानकारी ले रहे थे. मंत्री की तरफ से आदेश आ गया कि हम इस समारोह को तब तक नहीं होने दे सकते जब तक कि दलितों को इस कार्यक्रम में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती है.


दलित सामाजिक कार्यकर्ता जयंती मकडिया ने बताया कि दलित अपने को हिंदू ही मानते हैं इसलिए जब उन्हें कार्यकम में भाग लेने से मना किया गया तो उन्हें स्वभाविक रूप से यह अपना अपमान लगा. दलित अपने को स्कूल के सर्टिफिकेट्स में हिंदू घोषित करते हैं और फिर उनको पूजा में भाग लेने के हिंदू रीति—रिवाज में भाग लेने से इंकार किया जाता है, तो उनकी गौरव भावना को क्षति पहुंचती है.


लेकिन आरएसएस से जुड़े हुए दलित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता किशोर मकवाना का दावा है कि बोरिद्रा में जो हुआ वह सिर्फ एक विचलन था, सामान्यत: ऐसा नहीं होता. मकवाना का दावा है कि हम सभी सामाजिक समरसता चाहते हैं. हम चाहते हैं कि गांव के सभी समुदाय और जातियों के लिए एक साझा मंदिर, साझा कुंआ और साझा कब्रिस्तान हो. यह हमारा नारा है.

अभियान क्यों नहीं चलाता आरएसएस?


समाजशास्त्री गौरांग जानी, जो गुजरात विवि में पढ़ाते हैं, का कहना है कि अगर ऐसा ही है तो फिर आरएसएस को उन सभी मंदिरों के लिए जहां दलितों को प्रवेश निषिद्ध है, उनमें एक प्रवेश अभियान क्यों नहीं चलाते हैं. उन्हें इससे कौन रोक रहा है. पर आरएसएस ऐसा करेगा नहीं, सांकेतिक रूप से भी नहीं.

जानी तो यहां तक कहते हैं कि संघ परिवार चाहता है कि अयोध्या में एक राम मंदिर बने, पर दलितों को गांव के स्थानीय मंदिर में भी प्रवेश की इजाजत नहीं है. जानी कहते हैं, विडंबना यही है कि इसके बाद भी वे चाहते हैं दलित अपने को हिंदू ही मानते रहें.

भाजपा के प्रवक्ता भरत पांड्या के अनुसार बोरिद्रा की घटना कोई सामाजिक अपराध नहीं कही जा सकती. यह तो गांव विशेष की एक परंपरा है “जिसे हम सही नहीं ठहरा सकते तो इसकी निंदा भी नहीं कर सकते.”

दरअसल यह घटना हमारे गांवों में आज भी मौजूद एक खास सामंती मानसिकता की ओर इशारा करती है. यह निश्चित रूप से देश के उस राज्य में सामाजिक एकता के अभाव को इंगित करती है जिसे देश में सबसे 'वाइब्रेंट' राज्य की तरह विज्ञापित किया जा रहा है.

 

First published: 9 April 2017, 9:51 IST
 
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