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लौह अयस्क खनन: सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के चार साल बाद गोवा में फिर वही माइनिंग

निहार गोखले | Updated on: 12 February 2017, 11:06 IST
(गेटी इमेजेज़)

सितंबर 2012 में जस्टिस एमबी शाह आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसके बाद गोवा में लौह अयस्क खनन घर-घर चर्चा का विषय बन गया. कमीशन ने पाया कि गोवा में लगभग दर्जन भर कंपनियों ने कांग्रेस सरकार और इसके तत्कालीन मुख्यमंत्री दिगंबर कामत की मिलीभगत से लाखों टन आयरन अयस्क का खनन अवैध तरीके से किया है. 

आयोग के अनुमान के मुताबिक इससे राज्य सरकार को लगभग 35 हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2012 में गोवा में आयरन अयस्क के खनन तथा उसका परिवहन पर अस्थाई रोक लगा दी.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अक्टूबर 2014 में आयरन खनन पर रोक हटाने के बाद अब गोवा में आयरन खनन धीर-धीरे फिर से शुरू हो रहा है, ऐसे में फिर सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या समस्या की जड़ यानी कि अत्यधिक खनन, अपारदर्शिता और सरकार तथा खनन कंपनियों के बीच मिलीभगत से जुड़ी शिकायतों को हल किया गया है या नहीं.

क्षेत्र में फिर से वही खनन कंपनियां हैं, वही नौकरशाही सेटअप और वही लूपहोल्स जिन्होंने 35,000 करोड़ के खनन घोटाले को जन्म दिया था. इसलिए आसपास के ग्रामीणों तथा उन सामाजिक कार्यकर्ताओं, जिनकी वजह से घोटाला सामने आया था, में फिर से इस खनन को लेकर भारी संदेह देखा जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2014 में खनन मामले में अपना फैसला सुनाया था. इसमें कहा था कि गोवा में 2007 के बाद चल रहा सारा खनन अवैध था, क्योंकि किसी भी खनन की लीज को रिन्यू नहीं किया गया था. 2012 से चले आ रहे अपने प्रतिबंध को हटाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार अब चाहें तो लीज को रिन्यू करने या नई नीलामी करने का विकल्प चुन सकती है.

लीज सुरक्षित थे या नहीं यह एक मात्र कानूनी प्रश्न था जिसको तकनीकी माना गया. निर्यात किया गया अधिकांश आयरन अयस्क को रिपोर्ट नहीं किया गया था. सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय एम्पॉवर्ड कमेटी ने यह अनुमान लगाया था कि 2005 से 2011 के बीच जिस 1949 मिलियन टन अयस्क का खनन किया गया उसमें से 20 प्रतिशत अर्थात 395 एमटी को रिपार्ट नहीं किया गया था.

इसके अलावा आयरन खनन से जुड़ी जिस समस्या ने लोगों का काफी ध्यान खींचा था वह थीं क्षेत्र में खनन के कारण भूजल स्तर का गिरना, खेतों में आयरन अयस्क की धूल की परत का जम जाना और गोवा के समृद्ध पर्यावरणीय और प्राकृतिक सुंदरता का नष्ट हो जाना.

इस सबको ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अलग से गठित की गई एक कमेटी के हवाले से 2014 के फैसले में यह कहा था कि आयरन आयस्क का वार्षिक खनन 20 मिलियन टन सालाना से अधिक नहीं हो.

राज्य ने क्या किया

जनवरी 2015 में राज्य सरकार ने उन 90 खनन की लीज में से 88 को रिन्यू कर दिया जो कि सुप्रीम कोर्ट के 2012 में प्रतिबंध लगाते समय भी सक्रिय थीं. इन 88 लीजों में से 61 के पर्यावरणीय क्लियरेंस सरकार ने अनुमोदित कर दिए, जिनके पर्यावरणीय क्लियरेंस सरकार ने शाह कमीशन के मद्देजनर 2012 से लंबित पड़े हुए थे.

जुलाई 2015 और नवंबर 2016 के बीच इन माइनिंग लीज होल्डरों को गोवा राज्य प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने 16 एमटी अयस्क खनन करने का लाइसेंस दिया. यह सुनश्चित करने के लिए कि इन बंदिशों की पालना की जा रही है, सरकार ने कई तकनीक युक्त सर्विलांस प्रणाली के माध्यम से इन पर नजर रखना सुनिश्चित किया. इस सर्विलांस प्रणाली का ठेका बंगलुरु की फर्म को दिया गया.

अयस्क ले जाने वाले सभी ट्रकों को जीपीएस युक्त होना था और उन्हें खनन साइट पर एक ऐसे ब्रिज से गुजरना था जिससे उनका वजन हो सके. ट्रकों का यह वजन, उनकी पोजीशन और स्पीड सब कुछ एक केंद्रीकृत डाटाबेस में फीड होता है, जहां इस सब पर नजर रखी जा सकती है. इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इसके बाद प्रस्ताव यह भी है कि इसमें रॉयल्टी पेमेंट और निर्यात परमिट की फाइलिंग भी रिपोर्ट होती जाए. इस रिपोर्ट के अनुसार अब 7000 ट्रकों को जीपीएस युक्त बनाया जा चुका है.

जमीनी हकीकत में वही पुरानी स्थिति

पर जमीनी धरातल पर कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि इन उपायों से उस समस्या का कोई हल निकला है, जिनकी वजह से 2007—2012 के दौरान की अवैध खनन की स्थिति पैदा हुई थी. इसका पहला कारण तो यही है कि ऐसे ट्रक बहुत कम देखे जाते हैं जिनकी स्पीड 40 किमी प्रति घंटा से कम हो.

उत्तरी गोवा स्थित बिचोलिम गांव के एक शिक्षक रमेश गौंड कहते हैं कि जीपीएस प्रणाली और उसका डाटा एक निजी फर्म द्वारा नियंत्रित होता है. इसकी क्या गारंटी है कि वह फर्म सरकार से मिल न गई हो? इसी मिलीभगत की वजह से पिछला घोटाला हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने भले यह कह दिया हो कि माइनिंग अवैध है पर किसी ने उसके सही अर्थ को नहीं समझा है.

ब्यूरोक्रेसी तो वही बनी हुई है. इंडियन ब्यूरो माइन्स भी वही है. गौंड तब चर्चा में आए थे जब उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल के पास स्थित पहली माइन 2011 में बंद करने के निर्देश दिए थे. 

गौंड का कहना है कि मान लीजिए एक ट्रक बिना जीपीएस के चलता है तो उसको चेक करने के लिए कौन है? 2012 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने वाले गोवा फांउडेशन के क्लाड अल्वेरस का कहना है कि कहीं कोई चेकिंग और सुरक्षा प्रणाली जमीन पर नहीं है. अल्वेरस की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट का खनन बंदी का 2014 का फैसला आया था.

अल्वेरस आगे कहते हैं कि माइन्स डिपार्टमेंट में स्टॉफ अभी भी अपर्याप्त है. मुझे संदेह है कि सरकार को यह जानकारी है कि कितना अयस्क स्टैक्स से निकाला गया है और कितना जमीन से. सरकार अभी भी इस मामले में कंपनियों और लीज होल्डरों द्वारा दी जाने वाली जानकारी पर ही निर्भर है. अल्वेरस का साफ कहना है कि ये सारे संसाधन आम जनता के हैं और सरकार इनकी अक्षम ट्रस्टी साबित हो रही है.

दरअसल अब तक पुराने अवैध खनन मामले में शामिल होने के लिए न तो किसी नेता और न किसी नौकरशाह को ही अब तक दंडित किया गया है, इसलिए अब किसी को पूरी प्रणाली में उन दिनों से अधिक भरोसा नहीं है जबकि क्षेत्र में अनियंत्रित माइनिंग चल रही थी.

भाजपा 2012 में जब सत्ता में आई तो उसने यह वादा किया था कि भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित किया जाएगा, पर यह अब तक नहीं हुआ है. वर्ष 2015 में एंटी करप्शन ब्यूरो ने एक तकनीकी मुद्दे को उठाते हुए दिगंबर कामत के खिलाफ भी केस बंद कर दिया था.

2012 में कामत को भी उनके निर्वाचन क्षेत्र मारगाव से पुन: चुन लिया गया था और उन्होंने इस बार फिर इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस ने टिकट दिया है, जहां से कामत ने अपना नामांकन फाइल भी कर दिया है. न ही अब तक उस 35000 करोड़ रुपये की वसूली माइनिंग कंपनियों से की गई है, जो अवैध खनन के दौरान सरकार को नुकसान हुआ था. 

इस क्षेत्र में प्रमुख अवैध खनन कंपनियां हैं सेसा गोवा की वेदांता रिसोर्स. इसके अलावा स्थानीय बड़ी कंपनियां हैं डेंपो माइनिंग, फोमेंटो ग्रुप, चौगुले एंड कंपनी तथा बांडेकर ब्रदर्स. शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार इन कंपनियों पर रॉयल्टीज तथा चोरी से किए गए एक्सपोर्ट के रूप में 5400 करोड़ रुपये और भी बकाया है.

यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2014 के फैसले में कहा था कि शाह कमीशन की रिपोर्ट को इन माइनिंग कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनको आयोग ने उचित सुनवाई का मौका नहीं दिया था. 

इसके आधार पर कंपनियों पर अब तक इतनी भी कार्रवाई नहीं की गई है कि उन्हें अपनी कलाई पर खरोंच भी महसूस हो. इस पूरे मामले से गोवा में माइनिंग के गोरखधंधे की सफाई की उम्मीद की जा रही थी, वह अब पूरी तरह खत्म हो गई है और माइनिंग फिर से वापस आ गई है.

जारी है खनन

प्रमुख माइनिंग विरोधी एक्टिविस्ट के रूप में क्षेत्र में जाने जानेवाले सैंगुएम तालुका के कोलंब क्षेत्र आदिवासी किसान रामा वेलिप का कहना है कि अब ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिससे यह कहा जाए कि माइनिंग को रोका जा रहा है. माइनिंग उसी तरह से चल रही है जैसी कि 2012 के पहले चल रही थी. 

अब तक किसी माइनिंग प्रभावित क्षेत्र का कोई पुनर्वास का काम नहीं किया गया है. माइनिंग फर्म्स द्वारा संचालित मिनिरल फाउंडेशन ने एक स्कूल अवश्य इस क्षेत्र में खोला है, कुछ कंप्यूटर की कक्षाएं शुरू की गई हैं और कुछ एंबुलेंस का इंतजाम किया गया है. इसके अलावा हम पूरी तरह से पुराने माइनिंग दौर में ही पहुंच चुके हैं.

पूर्व से लेकर उत्तर से दक्षिण के फैले गोवा के माइनिंग बेल्ट में रोड का कलर भी उन ट्रकों के कारण लाल हो चुका है जो कि इस क्षेत्र से लगातार गुजरते रहते हैं. उन माइन्स के गेट भी अब खुल चुके हैं जो कि पिछले माह तक निर्जन नजर आ रही थीं. स्थानीय लोगों का कहना कि अगर माइनिंग 2015 में शुरू हो चुकी थी पर पिछले पन्द्रह दिनों में इसमें तेजी आई है.

क्येपेम के कौरम गांव में जहां कि गांव वाले कई बार विरोध करने के कारण गिरफ्तार भी चुके हैं, पांच में एक माइन फिर से खुल चुकी है और पूरी गति से काम कर रही है. लगभग प्रत्येक चार मिनट में आयरन अयस्क से लदा हुआ एक ट्रक इस जगह से निकलता है. गांव वालों के अनुसार हर दिन लगभग सौ से अधिक ट्रक यहां से निकलते हैं.

माइनिंग बूम के समय 1500 ट्रक हो जाते थे एक दिन में, जिससे रोड पर जाम लग जाता था. कौरम गांव निवासी तुलसीदास वेलिप का कहना है कि अगर बाकी बची माइन्स भी खुल जाती हैं तो फिर वही स्थिति पैदा होने लगेगी. वेलिप आगे कहते हैं कि अब समय आ रहा है जबकि हमें फिर से सड़कों पर उतरना होगा.

First published: 16 January 2017, 8:05 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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