Home » राज्य » Jharkhand's Litipara bypoll results: Here's why it could tell a story of BJP's downfall in the region
 

झारखंड उपचुनाव: क्या भाजपा की हार राज्य में उसकी ढलान का संकेत है?

महताब आलम | Updated on: 16 April 2017, 10:33 IST


झारखंड लिट्टीपाड़ा विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने उतना ध्यान नहीं खींचा जितना कि दिल्ली के राजौरी गार्डन के नतीजों ने. हालांकि जानकारों की राय थी कि आने वाले दिनों में संथाल परगना के नतीजे राज्य की राजनीति को काफी प्रभावित कर सकते हैं.

राज्य में सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी दैनिक प्रभात खबर के संपादकीय के मुताबिक झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के प्रत्याशी की जीत सत्तासीन भाजपा के लिए चिंताजनक है. संपादकीय ने इसकी वजह नहीं बताई. कइयों का मानना है कि यह नतीजा महज़ ट्रेलर है. राज्य में भाजपा को अभी बहुत कुछ देखना है. जेएमएम के सिमोन मरांडी ने लिट्टीपाड़ा सीट फिर से जीती. उन्होंने भाजपा के हेमलाल मुर्मू को 12,900 वोटों से हराया.

पिछली बार मरांडी भाजपा से खड़े हुए थे. जेएमएम प्रत्याशी को कांग्रेस का समर्थन था, जबकि ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (एजेएसयू) ने भाजपा प्रत्याशी के लिए कैंपेन की थी. गौरतलब है कि भाजपा का वोट शेयर करीब 8 फीसदी बढ़ा. जेएमएम के वोटिंग शेयर में भी वृद्धि हुई, पर बहुत कम. २ फीसदी भी नहीं. फिर भी गुरुवार को आए नतीजों के बाद, मतभेद के बावजूद विपक्ष की पार्टियां बेहद खुश हैं और दावा कर रही हैं कि यह जेएमएम प्रत्याशी का महज पुनर्चुनाव नहीं है, बल्कि भाजपा की राजनीति की हार है.

 

भाजपा का विखंडन


क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक अबरार तबिंडा ने कहा, ‘इससे झारखंड को जेएमएम मुक्त करने के भाजपा के स्वप्न को बड़ा झटका लगा है.’ कांग्रेस के राज्य प्रमुख सुखदेव भगत ने भी इसे भाजपा की नीतियों की हार बताया. प्रभात खबर में छपी एक रिपोर्ट ने भगत के हवाले से लिखा, ‘यह हेमलाल मुर्मू (भाजपा प्रत्याशी) की ही हार नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री रघुबर दास की जन-विरोधी नीतियों की भी हार है.’


झारखंड विकास मोर्चा (जेवीए), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) जैसी अन्य राजनीतिक पार्टियों का भी यही कहना था. रिपोर्ट के मुताबिक इससे भाजपा-विरोधी एकता के लिए जोरदार मांग बनी है.

 

जेएमएम की जीत, या भाजपा की हार महत्वपूर्ण है क्योंकि सीएम रघुबर दास खुद कैंपेन का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र का 5 दिन दौरा किया. इसके अलावा चुनाव के महज 4 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पड़ोसी साहिबगंज जिले में कई योजनाओं और विकास के प्रोजेक्ट्स की घोषणा करने आए थे. ज्यादातर लोगों की राय थी कि उनका यह दौरा उपचुनावों के मद्देनजर था.


लिट्टीपाड़ा और साहिबगंज एक ही लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र-राजमहल में हैं. पीएम की ऑफिशियल वेबसाइट के मुताबिक उन्होंने कहा था, ‘इन विकास प्रोजेक्ट्स का लाभ संथाल परगना को मिलेगा और इससे जनजातीय समुदाय का काफी सशक्तिकरण होगा.’

 

आदिवासियों का विरोध


रांची के राजनीतिक जानकार और खान, खनिज और अधिकार के संपादक जेवियर डायस ने नतीजों पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘यह भाजपा के अहम पर करारा तमाचा है, खासकर तब जब उनके पास तुरुप का पत्ता मोदी प्रचार के लिए थे. इससे पक्का जाहिर होता है कि झारखंड के लोग मोदी के लिए काउ-बेल्ट वाली भावुकता से नहीं चल रहे.’डायस ने कहा कि छोटा नागपुर टीनेंसी एक्ट, संथाल परगना एक्ट और डोमिसाइल पोलिसी जैसे आदिवासी कानूनों में हुए संशोधनों के कारण आदिवासी भाजपा के पक्ष में नहीं हैं.


जेएमएम महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य भी डायस से सहमत नजर आए. इंडियन एक्सप्रेस ने भट्टाचार्य की राय का उल्लेख किया है- ‘नतीजों से साफ है कि आदिवासियों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को देने की भाजपा की नीति उनके खिलाफ पड़ी.’ इंडियन एक्सप्रेस ने कहा कि उनका भी इशारा संशोधनों की तरफ था.


कैच ने पहले रिपोर्ट दी थी कि झारखंड के आदिवासी महीनों से विरोध कर रहे हैं. वे टीनेसी कानून और डामिसाइल पोलिसी में किए संशोधनों को तुरंत वापस लेने की मांग कर रहे हैं. डायस का कहना है कि यह गेम चेंजर हो सकता है. डायस ने कैच को बताया, ‘ सीएनटी-एसपीटी के खिलाफ आदिवासियों का आंदोलन इसी गति से चलता रहा, तो आप अगले चुनावों में भाजपा के मौजूदा आदिवासी नेताओं को भी अपनी सीटें हारते हुए देखेंगे.’


संथाल परगना के एक अन्य राजनीतिक जानकार ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि, ‘यह जीत इस मायने में महत्वपूर्ण है कि सारी कोशिशों के बावजूद भाजपा जेएमएम की स्थिति कमजोर नहीं कर सकी. हालांकि सिमोन मरांडी अब लोकप्रिय नेता नहीं हैं.’ उनके मुताबिक, जाहिर है, यह तीर-धनुष (जेएमएम पार्टी का प्रतीक) की जीत है, ‘हालांकि मैं नहीं जानता कि यह जीत कहां तक जाएगी.’ उन्होंने आगे कहा कि यह बड़ा कड़ा मुकाबला था. टीनेसी एक्ट में संशोधन के नतीजों को दरकिनार नहीं किया जा सकता.


भाजपा महासचिव दीपक प्रकाश ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ‘यह चुनौती थी और हम शायद हार गए. पर इस हार में भी आगे जीत है. पहली बार हमने जेएमएम की मजबूत स्थिति को चुनौती दी. हमने उनके मूल मतदाता छीन लिए, हमने हमारे संगठन को मजबूत किया और हम अपने विकास कार्यक्रमों को लोगों तक ले गए.’


2014 के विधानसभा चुनावों के बाद इस क्षेत्र में चार सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं. भाजपा केवल गोड्डा की एक सीट जीत सकी, जो पहले से उनके पास थी. हालांकि गोड्डा और लिट्टीपाड़ा में अंतर है. लिट्टीपाड़ा के उलट गोड्डा में ‘सहानुभूति वोट’ था क्योंकि विजेता मरहूम विधायक के बेटे थे. उनके निधन के बाद यहां उपचुनाव करवाना जरूरी हो गया था.


इसलिए आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या स्थितियां बनती हैं, और इससे भी महत्वपूर्ण कि उपचुनाव के नतीजे आदिवासियों के आंदोलन को किस तरह प्रभावित करेंगे और विपक्ष की पार्टियों में कैसी एकता बनती है. यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 2014 में पहली बार (झारखंड बनने के बाद) भाजपा स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई थी और गैर-जनजातीय को मुख्यमंत्री बनाया था.

 

 

First published: 16 April 2017, 10:33 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी