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कर्नाटक: चुनाव से पहले सीएम सिद्धारमैया का राग आरक्षण

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 2 January 2017, 8:08 IST
(फाइल फोटो )

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने चुनाव से 16 महीने पहले आरक्षण का राग छेड़ दिया है. जानकारों का कहना है कि सिद्धारमैया का आरक्षण का संदिग्ध प्लान और कुछ नहीं अपने साढ़े तीन साल के उपलब्धि रहित शासन की कमियों को छिपाने और अपनी छवि को चमकाने का एक तरीका है.

सिद्धारमैया के प्लान में दो प्रकार के आरक्षण प्रस्तावित हैं. पहला, शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों को आरक्षण का कोटा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत करना. दूसरा, निजी सेक्टर के ब्लू कॉलर यानी अकुशल नौकरियों में स्थानीय लोगों को 100 प्रतिशत आरक्षण.

सिद्धारमैया यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि इस तरह का आरक्षण संविधान सम्मत नहीं है इसलिए इनको लागू करना एक तरह से लगभग असंभव ही है. इसके बावजूद वह इस आरक्षण का मुद्दा उठाकर और भाजपा को आरक्षण की राह में रोड़ा सिद्ध कर खुद एक ऐसे योद्धा के रूप में उभरना चाहते हैं जो कन्नड़ भाषियों तथा निचले तबके के हितों के लिए संघर्ष करते हुए घायल हो गया है.

मसौदा तैयार

अपने इरादों की गंभीरता को दिखाने के लिए सरकार ने कर्नाटक औद्योगिक रोजगार नियम (स्टैंडिंग ऑर्डर) 1961 में संशोधन का एक मसौदा जारी कर दिया है. इस मसौदे में कहा गया है कि प्रत्येक प्रतिष्ठान जिसने सरकार की औद्योगिक नीति के तहत जमीन, पानी, सस्ती बिजली, टैक्स रियायत या टैक्स ब्रेक हासिल किया है, उसे दिए गए क्लॉज... में इंगित कामगारों की भर्ती में स्थानीय लोगों को 100 प्रतिशत हॉरिजोंटल आरक्षण देना होगा. 

सरकार ने इस प्रावधान से फिलहाल अधिकतम पांच साल के लिए सूचना प्रौद्योगिकी तथा बॉयोटेक्नोलॉजी सेक्टर को छूट देने की बात कही है.

चुनावी पैंतरा?

कानूनविदों की राय है कि भारत का संविधान अनुच्छेद 16 में मौलिक अधिकारों के तहत यह अनिवार्य करता है कि सभी नागरिकों को रोजगार के समान अवसर उपलब्ध होंगे. सिर्फ अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग को ही इसमें विशेष आरक्षण दिया गया है. इसलिए तथाकथित स्थानीय लोगों को दिया गया आरक्षण अंसवैधानिक ठहराया जाना तय है.

जबकि कुछ अन्य लोगों का कहना है कि विशेष रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में कर्नाटक ने जो आर्थिक विकास किया है उसमें बाहर से आए हुए कुशल कामगरों का बड़ा योगदान रहा है. इसके साथ ही भवन निर्माण, स्वास्थ्य और हॉस्पिटैलिटी जैसी इंडस्ट्रीज लगभग पूरी तरह से बाहर से आए हुए प्रवासी मजदूरों के श्रम पर निर्भर हैं और अगर सिर्फ स्थानीय लोगों को भर्ती करने की शर्त रख दी जाती है तो इनका ठप होना तय है.

निवेश का संकट

दरअसल कर्नाटक में बेरोजगारी की दर 1.7 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय बेरोजगारी दर की आधी से भी कम है. इसलिए भी कर्नाटक में ऐसे किसी सख्त कदम की जरूरत नहीं प्रतीत होती. ध्यान रखने की बात यह है कि कर्नाटक में बुनियादी ढांचे की सीमाएं और लाल—फीताशाही देखते हुए निवेशकों का भरोसा पहले ही गिरा हुआ है, ऐसे में अगर सिर्फ स्थानीय लोगों को भर्ती करने की पाबंदी लगाई जाती है तो इसका कार्य—कुशलता तथा स्पर्धा—क्षमता पर असर पड़ना तय है. इससे निवेशकों का भरोसा राज्य में और कम हो जाएगा.

भारत में आईटी इंडस्ट्री के पुरोधाओं में एक एनआर नारायणमूर्ति ने इस तरह के प्रस्ताव को खारिज करते हुए फिर दोहराया है कि काबिलियत और उपयोगिता ही किसी को भर्ती किए जाने के पीछे एक मात्र मापदंड होना चाहिए. नारायणमूर्ति ने कहा है कि इस तरह की अवैज्ञानिक नीतियों को आगे बढ़ाने की बजाए सरकार को स्थानीय लोगों की शिक्षा और कौशल सुधारने पर जोर देना चाहिए जिससे स्थानीय लोग रोजगार बाजार में टिक सकें. 

वहीं श्रम मंत्री संतोष लाड का कहना है कि यह प्रस्ताव विधि विभाग को भेजा जा चुका है और सरकार आने वाले बजट सेशन में इसके लिए उचित बिल पेश कर सकती है.

सिद्धारमैया सरकार की ऐसी ही दूसरी शरारत भरी योजना राज्य में आरक्षण की कुल सीमा बढ़ाने की है. सरकार के सामने उदाहरण है तमिलनाडु, जो कि देश का एक मात्र राज्य है जहां 69 प्रतिशत तक आरक्षण दिया गया है. 

मंडल कमीशन से जुड़े इंद्रा स्वाहने बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के एक लैंडमार्क निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बैंच ने 1992 में निर्णय दिया था कि आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती. इसके बाद अनेक राज्यों में पिछड़े तथा मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने के लिए किए गए ऐसे सभी प्रयत्नों को संबंधित उच्च न्यायालय खारिज करते आए हैं.

तमिलनाडु का सफल प्रयोग

तमिलनाडु आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक बनाए रखने में सफल हो सका है इसके लिए तत्कालीन जयललिता सरकार तथा नरसिम्हा राव सरकार के विशेष प्रयास जिम्मेदार हैं. जयललिता सरकार ने मंडल कमीशन के बाद 1993 में एक बिल पारित किया था और वह राव सरकार पर यह दबाव बनाने में सफल रही थी कि इस बिल को संविधान के नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाए. 

इस तरह से दो दशक से अधिक समय से तमिलनाडु में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक बना हुआ है. फिलहाल यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह राय जाहिर की थी तमिलनाडु को 69 प्रतिशत आरक्षण सही ठहराने के लिए राज्य में एक ताजा जाति सर्वेक्षण करना चाहिए. तब भी सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया था कि इसका आशय यह कतई नहीं है कि इसके बाद अदालत का निर्णय पक्ष में ही आएगा.

राह में रोड़े

सर्वोच्च न्यायालय के इस अवलोकन के मद्देनजर सिद्धारमैया सरकार ने दो साल पहले आर्थिक—सामाजिक सर्वेक्षण के नाम से एक राज्य में एक जाति सर्वेक्षण किया था. इस रिपार्ट को अभी उजागर तो नहीं किया गया है लेकिन इसकी कुछ सूचनाएं मीडिया में लीक होने से पिछले दिनों भारी हंगामा मच गया था. 

मीडिया रिपोर्ट में यह संकेत दिए गए थे कि राज्य के प्रभावशाली वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय अपेक्षाकृत रूप से काफी छोटे हैं न कि बड़े समुदाय, जैसा कि वे माने जाते रहे हैं. जबकि सर्वे के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े समुदायों की आबादी काफी बढ़ गई है.

सिद्धारमैया की योजना है कि विधानसभा के आगामी सत्र के पहले इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए और साथ ही आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 करने के मसौदे को भी विचारार्थ पेश किया जाए. हाल में सिद्धारमैया ने भाजपा और जनता दल सेक्युलर को चुनौती दी थी कि अगर वे पिछड़े तथा अल्पसंख्यकों के हितैषी हैं तो इस बिल का समर्थन करने के लिए आगे आएं.

मुख्यमंत्री को पता है कि उनकी संतुष्टिकरण की नीति को केंद्र तथा कोर्ट से भारी प्रतिरोध का सामना करना होगा. प्रक्रिया के तहत, कर्नाटक सरकार के इस बिल को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी भी जरूरी होगी और केंद्र की भाजपानीत सरकार इस बिल के बारे में सवाल उठाकर इसको आगे बढ़ने में अड़ंगा डाल सकती है. साथ ही इसकी संभावना भी नहीं दिख रही कि केंद्र इस बिल को संविधान की नौवीं सूची में डाल देगा जैसा कि तमिलनाडु के मामले में हुआ था.

लेकिन सिद्धारमैया की रणनीति यही प्रतीत होती है कि बिल के माध्यम से भाजपा को घेरा जाए जिससे वे खुद अल्पसंख्यकों और पिछड़े लोगों के मसीहा बनकर सामने आ सकें. मतदाताओं पर इस सारी तिकड़मों का क्या असर होगा और क्या इससे सिद्धारमैया फिर से 2018 के चुनाव में वापसी कर पाएंगे यह देखने वाली बात होगी.

First published: 2 January 2017, 8:08 IST
 
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