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पंजाबः मलेरकोटला का वोट उसके नाम जो फैलाए अमन का पैग़ाम

आदित्य मेनन | Updated on: 16 January 2017, 8:03 IST
(आदित्य मेनन/कैच न्यूज़)

मलेरकोटला आने से पहले कोई भी आसानी से यह सोच सकता है कि इस शहर का साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक होने का दावा केवल स्कूली किताबों में पढ़ाने के लिए बनाई गई कहानी है या फिर बड़े बुजुर्गों ने ऐसी कहानी गढ़ी है.

लेकिन पंजाब के संगरूर जिले के इस छोटे सुस्ताए से शहर में अगर किसी को एक रात गुजारने का मौका मिले तो वाकई उसे एहसास होगा कि यहां साम्प्रदायिक सौहार्द की कहानी सच्ची है. दरअसल साम्प्रदायिक सौहार्द तो यहां के लोगों की शांतिपूर्ण जिंदगी का एक हिस्सा भर है. बड़े दिल वालों के इस शहर में अगर कोई किसी से रास्ता पूछता है तो उसे लिफ्ट मिल जाती है. अगर कोई अनजान व्यक्ति भी यहां के लोगों से बात करना चाहे तो उसे चाय या खाने का भी ऑफर कर दिया जाए तो हैरानी नहीं.

पंजाब में मलेरकोटला ही एकमात्र मुस्लिम आबादी वाला शहर है. माना जाता है कि जब सरहिंद के गवर्नर वजीर खान ने गुरू गोविन्द सिंह के बेटों को जिन्दा दफन करने का आदेश दिया था तो मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान ने यह कहते हुए बहिष्कार कर दिया था कि यह इस्लाम के खिलाफ है. गुरु गोविन्द सिंह ने जब यह सुना तो उन्होंने बदले में नवाब और उनके शहर को आशीर्वाद दिया.

स्थानीय लोगों का मानना है कि इसी आशीर्वाद के चलते मलेरकोटला पर 1947 में बंटवारे के दौरान हुई हिंसा का कोई खास असर नहीं पड़ा. यहां से केवल कुछ ही लोग पाकिस्तान गए. पूर्वी पंजाब के किसी और शहर के बजाय यहां की मुस्लिम बहुल आबादी संरक्षित रखी गई, जबकि बाकी जगह या तो मुसलमान विस्थापित हो गए या मारे गए.

मलेरकोटला की 60 फीसदी से अधिक आबादी मुसलमानों की है, बाकी जनसंख्या हिन्दू और सिखों की है. यहां बहुत से जैन धर्म के लोग भी रहते हैं. इनमें से अधिकतर व्यापारी हैं. कुछ ईसाई भी हैं. शहर अपनी स्थापत्य कला के लिए तो प्रसिद्ध है ही, बॉलीवुड गीतकार इरशाद कामिल भी इसी शहर से हैं.

शांति के लिए वोट

यहां के बाशिन्दों को शांति बनाए रखने के अपने हुनर पर फख्र है. चाहे कोई कितना भी भड़काए; यहां लोग शांति और सौहार्द बनाए रखते हैं. और यहां के मतदता वोट देने के लिए भी शांति को ही बड़ा आधार मानते हैं, खास तौर पर बुजुर्ग मतदाता.

बाबा हैदर शेख की दरगाह के पास रहने वाले एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अमीर अली ने कहा ‘मलेरकोटला के मतदाता साम्प्रदायिक सौहार्द्र और शांति बनाए रखने वाले को ही वोट देंगे. इससे ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे लिए और कुछ नहीं है.’ राज्य वक्फ बोर्ड के एक सेवानिवृत्त अधिकारी खुर्शीद अली ने कहा ‘साम्प्रदायिक सौहार्द ही इस शहर की पहचान है.'

गत जून माह में मलेरकोटला में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के उद्देश्य से कुछ शरारती तत्वों ने पवित्र कुरान के पन्ने जला दिए थे. इस पर यहां के मुसलमानों ने दूसरे समुदायों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन नहीं किया बल्कि ऐसी घटना न रोक पाने के लिए प्रशासन को दोषी ठहराया. 

अली कहते हैं, ‘घटना के कुछ ही समय बाद तनाव पर आसानी से काबू पा लिया गया. मुफ्ती साहब ने इस पर लोगों से संयम बरतन को कहा. उन्होंने दूसरे समुदाय के नेताओं से भी मिल कर किसी तरह की हिंसा न होने देने की बात कही. हालांकि इस घटना से मलेरकोटला के लोगों पर बुरा असर पड़ा है, जो यह सोचते हैं कि मलेरकोटला के साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है; जिसके लिए यह जाना जाता है.'

पिछले साल कुरान के अपमान की घटना के लिए यहां के लोग आप को नहीं अकाली दल को दोषी मानते हैं.

इस मामले में पुलिस ने पहले एक स्वयंभू हिन्दू नेता को और उसके साथी विहिप कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया. इनमें से किसी एक के इकबालिया बयान के आधार पर पुलिस ने मेहरौली, दिल्ली से आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश यादव को दोषी ठहराया था. 

लेकिन स्थानीय लोग यह बात नहीं मानते. मलेरकोटला के एक सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी ने बताया, ‘आप विधायक पर तो यूं ही आरोप लगाया जा रहा है, घटना तो प्रशासन की लापरवाही से घटी है. 

नाम न बताने की शर्त पर एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, 'अकाली अपने ग्रंथों के साथ छेड़छाड़ नहीं करते और वे हमारी धार्मिक किताबों का अपमान आसानी से कर सकते हैं.' उन्होंने उन घटनाओं का जिक्र किया जब गुरु ग्रंथ साहिब और अरदास का अपमान हुआ.

कुरान के अपमान का विरोध करने वाले लोग मलेरकोटला से अकाली विधायक फरजाना निसारा खातून को ही इसका दोषी मान रहे हैं. उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा; क्योंकि पार्टी ने इस बार उनको टिकट नहीं दिया है. 

दो पुसिकर्मियों की पत्नियां हैं राजनीति में

मलेरकोटला पंजाब के दो पुलिसकर्मियों की पत्नियों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का भी गवाह रहा है. इनमें से कोई भी पंजाबी नहीं है. खातून पूर्व डीजीपी मोहम्मद इजहार आलम की पत्नी हैं. आलम खालिस्तान उग्रवाद के समय कुख्यात थे. उनके वफादारों की टीम आलम सेना के नाम से जानी जाती थी; जिसमें पुलिसकर्मी और समर्पण किए हुए उम्मीदवार दोनों शामिल थे.

आलम के विरोधी हैं मोहम्मद मुस्तफा जो अभी पंजाब पुलिस में डीजीपी हैं. आलम हमेशा ही यह दावा करते हैं कि मुस्तफा उनका चेला है. मुस्तफा को कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह का करीबी माना जाता है. उनकी पत्नी रजिया सुल्तान कांग्रेस के टिकट पर 2002 और 2007 में चुनाव जीती थी लेकिन 2012 में अकाली दल की खातून से चुनाव हार गईं. वे इस बार फिर चुनाव मैदान में हैं.

अकालियों ने हाल ही में मुस्तफा के खिलाफ चुनाव अयोग में शिकायत की थी कि वे अपनी पत्नी के राजनीतिक हित साधने के लिए पुलिस पद का दुरूपयोग कर रहे हैं. यहां के बहुत से लोगों का मानना है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो राज्य की राजनीति में डीजीपी मुस्तफा की अहमियत बढ़ जाएगी. 

जाहिर है आलम अब इतने प्रभावशाली नहीं हैं. एक ठेले वाले ने कहा, ‘जब कांग्रेस सत्ता में थी तो पुलिस ने हमें कभी परेशान नहीं किया. मुस्तफा साहब इस बात का खयाल रखते हैं. पिछले 10 सालों में पुलिस ज्यादती के मामले बढ़े ही हैं. जब कभी हम इजहार आलम से इसकी शिकायत करते तो वह हमेशा पुलिस वालों का ही पक्ष लेते. कई बार वे पुलिस वालों को हमसे और सख्ती से पेश आने को कहते.'

आप फैक्टर के चलते सुखबीर का कदम

अपने निवर्तमान विधायक की कम लोकप्रियता को देखते हुए अकाली दल खासा मुश्किल में था लेकिन उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने खातून की जगह एक स्थानीय व्यापारी मुहम्मद ओवैस को टिकट दिया है. ओवैस की चमड़े की फैक्ट्री है, जिसमें यहीं के हजारों लोग काम करते हैं. इसलिए उनके पास लोगों का अच्छा खासा समर्थन है. वे मलेरकोटला के सम्मानित व्यक्ति हैं और कांग्रेस की भी उनके बारे में अच्छी राय है.

मोहम्मद शफीक कहते हैं उन्होंने हाल ही में मलेरकोटला में स्कूल खोलने के लिए जमीन दान में दी है. वहीं अमीर अली का कहना है हालांकि ओवैस अहल-ए-हदीस से जुड़े हैं लेकिन वे सूफी, देवबंदी, शिया मुस्लिम और गैर मुसलमानों भी उतने ही जुड़े हुए हैं. माना जा रहा है कि ओवैस की उम्मीदवारी से रजिया सुल्तान की जमानत तक जब्त हो सकती है.

उधर सुखबीर के उम्मीदवार के मुकाबले आम आदमी पार्टी ने लगता है गलत दांव खेल दिया है. उन्होंने टीवी एक्टर रहे अरशद डाली को यहां से टिकट दिया है जिनका अपना कोई खास समर्थन आधार नहीं है. इसलिए वे पूरी तरह पार्टी या फिर संगरूर से सांसद भगवंत मान के समर्थन पर ही निर्भर हैं.

कुछ लोगों का कहना है कि स्टैंड अप कॉमेडियन मान ने ही डाली को यहां से टिकट दिलवाया है जबकि स्थानीय व्यापारी अजमत दारा सहित कुछ और लोग भी यहां से टिकट के दावेदार थे. हो सकता है डाली मलेरकोटला में कमजोर उम्मीदवार साबित हों लेकिन आप पार्टी आस-पास के गांवों में एकतरफा जीत भी हासिल कर सकती है.

जमात-ए-इस्लामी की मलेरकोटला इकाई के एक पदाधिकारी रमज़ान सईद का कहना है कि आप पार्टी गांवों में बहुत अधिक लोकप्रिय है. लोग अकालियों से नाराज हैं और आप पार्टी को ही बेहतर विकल्प के तौर पर देख रहे हैं. 

मलेरकोटला में साइकिल के स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाने वाले आप कार्यकर्ता सरफराज ने कहा, पार्टी को पूरा विश्वास है कि वह यहां जीतेगी. यहां तक कि अगर हमें शहर में 20,000 वोट भी मिले तो भी कोई बात नहीं; हम गांवों में मिलने वाले वोटों से भरपाई कर लेंगे.

पूरे मालवा में इस बात की चर्चा है कि आप पार्टी शहरों से ज्यादा गांवों में लोकप्रिय है. जहां तक मलेरकोटला की बात है, आप कार्यकर्ताओं का मानना तो यही है कि यहां से कोई और बेहतर उम्मीदवार चुनाव मैदान में खड़ा हो सकता था. वे यह भी कहते हैं कि मलेरकोटला में छह महीने पहले पार्टी बेहतर स्थिति में थी.

2014 के चुनावों में भगवंत मान को मलेरकोटला से 57,000 वोट मिले, जबकि उनके अकाली और कांग्रेस प्रतिद्वंदियों को उनसे 10,000 वोट कम मिले. इतने अच्छे प्रदर्शन के बाद अगर आप पार्टी इस सीट पर हार गई तो उसे काफी निराशा हाथ लगेगी. लेकिन अगर मलेरकोटला में जनता की पसंद की बात की जाए तो जनता उसी उम्मीदवार को जिताएगी जो यहां की शांति में खलल न पड़ने दे. 

First published: 16 January 2017, 8:03 IST
 
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