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मणिपुर: विजय पताका फहराने को बेेक़रार भाजपा की राह में इबोबी सिंह

आकाश बिष्ट | Updated on: 2 March 2017, 7:52 IST

साठ सदस्यों वाली मणिपुर विधान सभा के लिए दो चरणों में होने वाले चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब केवल तीन दिन बचे हैं. इस राज्य में चार व आठ मार्च को मतदान है. कांग्रेस यहां पिछले 15 सालों से सत्ता में है. कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि वह वर्ष 2015 के नगा शांति समझौते के कारण घाटी के प्रभावशाली मेतई समुदाय के बीच बैठे भय का लाभ उठाने में कामयाब हो जाएगी. यह समझौता केन्द्र सरकार और नेशनल सोशलिस्ट ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा गुट) के बीच हुआ था. मेतई समुदाय को डर है कि इस समझौते के कारण राज्य की सीमाई सम्पूर्णता खतरे में पड़ जाएगी.

लगता है कि सबसे पुरानी पार्टी इसी रणनीति पर काम कर रही है. असम और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा के पैर जमाने के कारण वह बैकफुट पर आ चुकी है. सूत्रों की मानें तो मेतई समुदाय का राज्य में दबदबा है. राज्य की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मेतई समुदाय की है. लगता है कि यह समुदाय आने वाले चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने जा रहा है. इससे भगवा पार्टी में उदासीनता सी है.

इम्फाल में चुनाव प्रचार करने आए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को उभरा. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करते समय मणिपुर के लोगों को अकॉर्ड पर नहीं लिया गया. यहां तक कि मुख्यमंत्री इबोबी सिंह से भी चर्चा नहीं की गई. किसी को कुछ भी नहीं मालुम है कि समझौते में क्या है?

क्या हुआ है समझौता

राहुल ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री ने इस सिलसिले में इबोबी सिंह को भी नहीं बताया. उनके मंत्रियों को भी समझौते के तथ्यों को लेकर कुछ नहीं मालुम है. किसी को भी इस फैसले का पता नहीं लगा. सब कुछ प्रधानमंत्री ही जानते हैं. उन्होंने सवाल किया कि मोदी जी ने दस्तखत करने से पहले चर्चा क्यों नहीं की. युवा नेता ने मांग की कि मोदी ने शांति समझौते पर जो दस्तखत किए हैं, उन तथ्यों को जनता के सामने लाया जाए.

भाजपा के रणनीतिकार भी यह महसूस करते हैं कि नगा शांति समझौते से जो दूरी बनी है, उससे पार्टी बैकफुट पर आई है लेकिन साथ ही वे यह भी आरोप लगाते हैं कि मुख्यमंत्री लोगों के बीच दरार डाल रहे हैं. यही वह वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य की अपनी पहली नावी रैली में लोगों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि उनमें समझौते को लेकर थोड़ा भय है. मोदी ने कहा कि समझौते में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जो मणिपुर के लोगों के खिलाफ हो. उनके हितों के खिलाफ हो.

मोदी ने इबोबी सिंह पर हमला करते हुए कांग्रेस पर शांति समझौते के बारे में लोगों को गलत तथ्यों की जानकारी देने का आरोप लगाया. मोदी ने कहा कि समझौते में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो मणिपुर के खिलाफ जाता हो. मणिपुर की सीमा के साथ कोई समझौता नहीं हुआ है. मुख्यमंत्री सत्ता में बने रहने के लिए लोगों को बांट रहे हैं, उन्हें फिर से सत्ता में आने का कोई अधिकार नहीं है. प्रधानमंत्री ने इबोबी सिंह का नाम लिए बिना उन पर चुनाव से पहले इस मुद्दे को उभराने पर निशाना साधा. पीएम ने सवाल किया कि क्या आप पिछले डेढ़ साल से सो रहे थे.

इबोबी ने भी इस पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया दी. कहा कि शांति समझौते में लोगों के अधिकारों के बारे में जब ऐसा कुछ भी नहीं है तो फिर क्यों समझौते के कंटेंट को रहस्यमय बनाकर रखा गया है. उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर के लोग राज्य की सीमाई सीमा के संरक्षण के बारे में प्रधानमंत्री के मौखिक आश्वासनों पर भरोसा नहीं कर सकते.

इबोबी का मास्टर स्ट्रोक

चुनाव से लगभग छह महीने पहले ऐसी रिपोर्ट्स आई थी कि भाजपा की हिन्दुओं के मेतई समुदाय के बीच लोकप्रियता बढ़ रही है. उसे सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और एंटी-इनकम्बेंसी का संयुक्त रूप से लाभ मिलेगा. इससे भाजपा में उम्मीद बंधी थी कि उत्तर-पूर्व में कांग्रेस के एक और गढ़ में वह अपना रास्ता तैयार कर रही है. कांग्रेस और इबोबी की वजह से यह सूत्र बिगड़ गया.

तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे 68 साल के इबोबी ने एक मास्टरस्ट्रोक दिया. उन्होंने नगा बाहुल्य जिलों में से सात नए जिले बनाने की घोषणा कर दी. ऐसे में नगा समुदाय सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध कर रहा है. इसे नगाओं की आबादी वाली भूमि की सीमाई एकता वाले समझौते के प्रयास के रूप में देखा गया.

इबोबी ने नगा बहुल इलाकों वाले पहाड़ी जिलों में विभाजन कर सदर पहाड़ी जिला बनाया है, ऐसे में वह कूकी समुदाय को भी खुश रखने में सफल हुए हैं. यह कूकी समुदाय की काफी पुरानी मांग थी. इस कदम से केवल नगा ही खुश हुए जबकि अन्य सभी समुदायों ने एंटी-इनकम्बेंसी रूख के बावजूद कांग्रेस सरकार का पक्ष लेना शुरू कर दिया.

नए जिलों के गठन के फैसले की घोषणा के तुरन्त बाद ही नगा समर्थित संगठनों ने दावा किया कि उनसे इस बारे में कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया. उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग 2 और 37 पर आर्थिक नाकेबंदी लागू कर दी जिससे इम्फाल घाटी में आवश्यक सामग्री की आपूर्ति बाधित हो गई.

आवश्यक वस्तुओं के न पहुंच पाने से यहां के नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया और महंगाई आसमान छूने लगी. महंगाई ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं. इससे भी मेतई लोगों में रोष बढ़ा. मेतई समुदाय के लोग नगाओं पर स्थिति को सामान्य करने में बाधा डालने का आरोप भी लगाते हैं.

इबोबी और कांग्रेस इस फूट को अपने फायदे के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. मणिपुर पहले से ही विभाजित समाज है. पहाड़ों में बसे आदिवासियों विशेषकर नगा लोगों का हमेशा ही घाटी के मेतई समुदाय से झगड़ा रहा है. कांग्रेस ने उनके इस विरोध को और गहरा करने का काम किया. वह भाजपा पर आरोप लगा रही है कि उसने मणिपुर के हितों के खिलाफ नगाओं और नेशनल सोशलिस्ट ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा गुट) से हाथ मिला लिया है.

वापसी के आसार

इस चाल से राजनीतिक कहानी बदल गई और अचानक ही, कांग्रेस जिसके सत्ता से बाहर हो जाने की बात कही जा रही थी, फिर से मैदान में आ खड़ी हुई. दूसरी और, भाजपा जो खुद को बेहतर स्थिति में पा रही थी, वह मेतई समुदाय के दूर न हो जाने के भय से नए जिलों के गठन का विरोध नहीं कर सकी. कहीं नगा शांति प्रक्रिया भी खतरे में न पड़ जाए, इसलिए भी वह आर्थिक नाकेबंदी पर जोखिम वाला रुख नहीं अपना सकी.

ऐसे में केवल भ्रष्टाचार और एंटी-इनकम्बेंसी जैसे चुनावी मुद्दे ज्यादा समय तक प्रासंगिक नहीं रहने वाले हैं. कोई आश्चर्य नहीं, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को मणिपुर में इबोबी पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर हमला बोला है. लेकिन वह मोदी की तरह ही नए जिलों के गठन पर कुछ नहीं बोले. इस गतिविधि से तो उत्तर-पूर्व के इस राज्य में भगवा पार्टी के पैर जमाने में सम्भवत: अवरोध ही आ सकता है.

वैसे इबोबी ने नए जिले के गठन को जनभावनाओं से जोड़ दिया है. इस राज्य में भाजपा जो शून्य से शुरू कर सत्ता पर काबिज होने की दौड़ में शामिल हैं, ने पूरी ताकत झोंक रखी है. जाहिर है टक्कर कांटे की है.

First published: 2 March 2017, 7:52 IST
 
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