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ओडिशा: कांग्रेस के प्राण पखेरू उड़ने की कगार पर

आकाश बिष्ट | Updated on: 25 February 2017, 9:03 IST


उड़ीसा में पांचवें और अंतिम चरण के पंचायत चुनावों के नतीजों की घोषणा 25 फरवरी को की जाएगी. पिछले चरणों के चुनाव नतीजों से साफ जाहिर है कि बीजू जनता दल इन चुनावों में विजयी होगा. दूसरे नम्बर पर भाजपा होगी, जिसने शानदार प्रदर्शन करते हुए 2012 के चुनावों के मुकाबले अपनी स्थिति में 850 फीसदी सुधार किया है.


उड़ीसा में भाजपा का विस्तार बीजू जनता दल के लिए चिन्ताजनक है. बीजद पिछले 17 साल से उड़ीसा में राज करता आ रहा है. इसके अलावा ये चुनाव नतीजे एक तरह से कांग्रेस की आंखें खोलने वाले हैं, जिसका राजनीतिक भविष्य प्रदेश में दांव पर है. पंचायत चुनाव नतीजों को देखते हुए बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने पार्टी कार्यकर्ताओं व प्रभारियों को निर्देश दिए हैं कि वे इन संकेतों को गंभीरता से लें और जनता व जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ नए सिरे से जुड़ना शुरू करें.

 

कांग्रेस के लिए चेतावनी

 

अगर ये नतीजे बीजद के लिए चेतावनी भरे हैं तो कांग्रेस के लिए तो यह काफी गंभीर स्थिति है जो पिछड़कर तीसरे स्थान पर सिमट गई है जबकि भाजपा राज्य में प्रमुख विपक्षी दल बन कर उभरी है. भाजपा नेता कांग्रेस मुक्त उड़ीसा का नारा दे रहे हैं जो कि कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है.


राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आज की इस स्थिति के लिए कांग्रेस खुद जिम्मेदार है जो दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ सकी. अंदरूनी कलह का दंश झेल रही कांग्रेस के लिए 2004 के विधानसभा और आम चुनावों के बाद से ही राज्य में हालात विकट होते जा रहे हैं. 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 34.82 प्रतिशत वोटों के साथ 147 में से 38 सीटें जीतीं. 2009 मे यह प्रतिशत गिर कर 29.10 रह गया और 2014 में 25.71.इसी प्रकार 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत 40.43 प्रतिशत रहा जबकि 2009 में यह गिर कर 32.75 प्रतिशत रह गया और 2014 के चुनावों में 26.38 प्रतिशत.


यहां तक कि 2017 के पंचायत चुनावों में पार्टी केवल 66 सीटों पर सिमट कर रह गई जबकि 2012 के चुनावों में कांग्रेस को 129 सीटें मिली थी. एक कांग्रेस नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी 2011 के बाद से राज्य में चार अध्यक्ष बदल चुकी है. प्रदेश कांग्रेस का अपने विधायकों पर कोई नियंत्रण नहीं है और उसके अंदरूनी मतभेदों के चलते ही कांग्रेस के वोटरों ने भाजपा का रुख कर लिया और आज भाजपा प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल बन कर उभरी है. अगर इन मुद्दों का तुरंत समाधान नहीं किया गया तो इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस का राज्य से बिल्कुल सफाया हो जाए.


उन्होंने कहा, ‘‘2012 के मुकाबले भाजपा का 270 सीटें ज्यादा जीतना कांग्रेस के लिए तगड़ा झटका है. उड़ीसा में भाजपा के राजनीतिक स्तर पर मजबूत बन कर उभरने से कयास लगाए जा रहे हैं कि 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा बीजद को कड़ी टक्कर दे सकती है. अगर हमारे नेता इसी तरह आपस में उलझते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उड़ीसा के राजनीतिक पटल से कांग्रेस का नामो निशान गायब हो जाए.’’

 

अंदरुनी कलह

 

अक्टूबर 2016 में कांग्रेस के सभी 16 विधायकों ने पार्टी प्रमुख प्रसाद हरिचरण के खिलाफ बगावत कर दी और नतीजतन उन्हें पार्टी प्रमुख के पद से हटाना पड़ा. हालांकि नए प्रमुख के आ जाने के बाद से भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है और पार्टी विधायकों के बीच गहरा असंतोष व्याप्त है. नतीजे आने के थोड़ी देर बाद ही कांग्रेस ने माना कि पार्टी ने इन चुनावों को गंभीरता से नहीं लिया जबकि भाजपा का चुनाव प्रचार काफी अच्छा था.


प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा पार्टी के पास फंड की भी कमी रहती है. भाजपा के मुकाबले पार्टी अपने प्रत्येक उम्मीदवार को 20,000 रूपए नहीं देती. हमने अपने उम्मीदवारों को पैसा नहीं दिया जिसका नतीजा सामने नजर आ रहा है. अगर हमारे पास फंड होते तो हम भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते थे.

 

भाजपा की मेहनत


और तो और भाजपा की प्रदेश इकाई ने प्रदेश में अपना सांगठनिक आधार ठोस बनाने के लिए कड़ी मेहनत की है. पार्टी की प्रदेश इकाई के प्रभारी अरुण सिंह का कहना है कि पार्टी के सदस्यों की संख्या 3 लाख से बढ़ कर 36 लाख तक पहुंच चुकी है. दूसरी ओर सदस्यता के मामले में कांग्रेस के आंकड़े फीके पड़ते नजर आ रहे हैं और पार्टी के पारम्परिक मतदाता भी भाजपा के साथ हो लिए.


इसीलिए कालाहांडी, मयूरभंज और मलकानगिरि जेसे कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले जनजातीय इलाकों पर भी भाजपा ने इकतरफा जीत हासिल की. क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता ने भी कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है. प्रदेश कांग्रेस नेता दबे-छिपे स्वर में स्वीकारते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वरा नोटबंदी के फैसले ने उन्हें यहां की जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया है. इसके अलावा 9 लाख घरों में सब्सिडी पर कुकिंग गैस पहुंचाने वाली प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने भी राज्य में इसके मतदाता बढ़ाए हैं.


कुछ का मानना है कि यह योजना पूर्व में बीजद सरकार द्वारा घोषित कई जन कल्यानाकारी योजनाओं से ज्यादा लोकप्रिय साबित हुई हैं. ये सारे पहलू देखते हुए राज्य में कांग्रेस का भविष्य अधर में नजर आ रहा है और पार्टी को 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले अपना खोया आधार फिर से पाना होगा. अन्यथा कोई अचरज नहीं कि नई राजनीतिक ताकत बन कर उभर रही भाजपा उड़ीसा राज्य को कांग्रेस मुक्त करने के अपने नारे को सच कर दे.

 

First published: 25 February 2017, 9:03 IST
 
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