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पंजाब: वोटिंग के बाद भी पिक्चर अभी बाक़ी है

राजीव खन्ना | Updated on: 8 February 2017, 8:14 IST
(कैच न्यूज़)

पंजाब में वोट पड़ चुके हैं. अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस और आप, तीनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों को नतीजों का इंतजार है. हार-जीत का फैसला 11 मार्च को हो जाएगा. इसी पर उनका भविष्य निर्भर है. पर इन पार्टियों के जेहन में महज जीतने की बेचैनी नहीं है. अपने भविष्य को लेकर कुछ और भी सवाल हैं, जिन पर उन्हें विचार करना है.

पुरानी पार्टी कांग्रेस से शुरुआत करें, तो सबसे ज्यादा मुश्किलें कांग्रेस के सामने हैं. पंजाब में ही नहीं, बल्कि केंद्र में भी पार्टी के नेताओं का मानना है कि यदि पार्टी पंजाब में जीत जाती है, तो इससे उसे राष्ट्रीय फलक पर उभरने का मौका मिलेगा. पार्टी को इसकी बेहद जरूरत है. 

पंजाब में जीत से पार्टी का मनोबल बढ़ेगा, जिसकी कि उसे काफी जरूरत है. यदि कांग्रेस की योजना सफल होती है, यह उसके नए सिद्धांतों का अनुमोदन होगा, जिसे कैंपेन के दौरान पार्टी के नेता बड़े साहस के साथ कहते रहे हैं. उनमें प्रमुख ‘एक टिकट, एक फैमिली’ शासन भी है. कई क्षेत्रों में इसे लेकर संशय था, इसके बावजूद पार्टी अंतिम टिकट दिए जाने तक अपने इस आदर्श के साथ सफलता से जुड़ी रही.

कई वरिष्ठ नेताओं के बच्चों और रिश्तेदारों को टिकट के लिए इनकार कर दिया गया, तो वे दबी जुबान में कुनमुना रहे थे. इसका फैसला पहली बार पार्टी के नेतृत्व ने लिया था. यह कांग्रेस की पारंपरिक संस्कृति से हटकर उठाया गया कदम था. पार्टी ने दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रखी थी कि चुनाव से पहले वह मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार की घोषणा नहीं करेगी. पर उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कैंपेन के अंत में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह के नाम की घोषणा कर दी. पार्टी के कार्यकताओं ने कहा कि इससे गलत मिसाल कायम हुई है.

उन्होंने कहा कि सभी जानते थे कि कांग्रेस के जीतने की स्थिति में अमरिंदर मुख्यमंत्री होंगे क्योंकि सारी कैंपेनिंग उनके इर्द-गिर्द हुई थी. पार्टी हाई कमान को इसकी घोषणा में देरी नहीं करनी चाहिए थी. उन्होंने आगे कहा कि इससे विपक्ष, खासकर आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल अंत समय तक कांग्रेस को अनायास निशाना बनाते रहे. इसने कांग्रेस कैंपेन की मशीनरी को कमजोर बनाया, जिसे मीडिया को समय-समय पर खुलासा करना होता है. 

यह भी पहली बार हुआ है कि कांग्रेस ने प्रोफेशनल चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर और आईपीएसी की उनकी टीम की सहायता से चुनाव लड़ा. किशोर और उनकी टीम कैंपेनिंग के कई गुर लाए और उन्हें बुनियादी स्तर पर क्रियान्वित करने में मदद की. 

अधर में कांग्रेस?

ये सब सिद्धांत जारी रह सकते हैं यदि कांग्रेस चुनाव जीते. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह भारत के राजनीतिक परिदृश्य में और हाशिए पर आ जाएगी. यह आरएसएस के ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत के मकसद की दिशा में बहुत बड़ा कदम होगा. यह इसलिए क्योंकि कांग्रेस उत्तराखंड, मणिपुर, और हो सकता है हिमाचल प्रदेश में जीत भी जाती है, तो भी ये राज्य बहुत छोटे हैं और इनका राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक महत्व बहुत कम होगा.

आप का क्या होगा?

पंजाब में आप जीतती है, तो यह इसका राष्ट्रीय स्तर पर आगमन होगा. इससे केजरीवाल को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभारने में मदद मिलेगी. पंजाब के अलावा आप को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी जीतने की बड़ी उम्मीदें हैं, जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं.

लोगों का मानना है कि पंजाब में जीत से काफी अच्छा असर होगा. हिमाचल प्रदेश में वह काफी अच्छा हासिल कर सकती है, जहां मतदाताओं का भाजपा और कांग्रेस से मोहभंग हो चुका है और वे तीसरे विकल्प की तलाश में हैं. पंजाब में जीत का मतलब होगा आप के लिए पूरे राज्य पर शासन करने का पहला टर्म. यहां उनका दिल्ली से उलट सभी चीजों पर पूरा नियंत्रण होगा. दिल्ली में पुलिस जैसे विभाग केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास हैं. 

यह आप को अन्य राज्यों के लिए विकास का नया मॉडल देने का मौका देगा, जहां वे अपनी जड़ों का विस्तार करना चाहते हैं और 2019 में लोकसभा चुनावों की तैयारी करना चाहते हैं. 

मंथन मूड में अकाली?

अकाली के लिए हारने की आशंका ज्यादा है, हालांकि अभी नतीजे नहीं आए हैं. उनके लिए चुनाव के बाद का समय वैचारिक मंथन का होगा कि पार्टी प्रकाश सिंह बादल के अधीन एक परिवार के प्रभुत्व के अधीन रहेगी या किसी और की तरफ रुख करेगी. पार्टी के परंपरागत समर्थकों ने कैंपेन के दौरान खुलासा किया कि नाराजगी सद से नहीं, बादल और उनके मंत्रियों की मंडली से है.

सद के समर्थकों का आरोप था कि अकाली दल अपने मूल सिद्धांतों को भूल गया है, चाहे वे धार्मिक थे या राजनीतिक. राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि सद की राजनीति पर सुखबीर बादल का वर्चस्व रहेगा. वे कहते हैं कि पिछले पांच सालों में सुखबीर ने अपने समर्थकों को वो जगह दी, जो पार्टी को बनाए रखने के लिए जरूरी है. 

गठबंधन का मसला

भाजपा के लिए भी चुनाव के बाद का यह समय कुछ अहम मुद्दों पर विचार करने का है. उनमें सबसे अहम यह है कि वे अकालियों के साथ गठबंधन जारी रखें या नहीं. पार्टी के कई लोग महसूस करते हैं कि यदि सद-भाजपा मिलकर हार जाते हैं या भाजपा को कम सीटें मिलती हैं, तो यह अकाली-विरोधी लहर के कारण होगा.

भाजपा का बड़ा वर्ग मानता है कि पार्टी को गठबंधन से बाहर निकल जाना चाहिए. पंजाब में आगे बढऩा है, तो उसे अकेले आना चाहिए, खासकर ग्रामीण पंजाब में. पार्टी काडरों की बड़ी संख्या कहती रही है कि निवर्तमान सरकार के शासन में अकाली उनके नेताओं को काम नहीं करने दे रहे थे. उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा नेताओं के साथ उनका व्यवहार ठीक नहीं था और वे कुछ नहीं कर सके क्योंकि भाजपा हाई कमान गठबंधन को बिगाडऩा नहीं चाहता था.  

इसलिए चुनाव के नतीजों के अलावा ऐसे बहुत से मुद्दे हैं, जिन पर आने वाले महीनों में मंथन आवश्यक है. इसके मायने यह है कि नई सरकार के सत्ता में आने के बाद ये तीनों प्रमुख पार्टियां काफी व्यस्त रहेंगी.  

First published: 8 February 2017, 8:14 IST
 
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