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झारखंड: सीएनटी-एसपीटी एक्ट में बदलाव के बहाने जोर आजमाइश का नया दौर

एन कुमार | Updated on: 25 November 2016, 8:24 IST
(निराला बिदेसिया/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • झारखंड की वर्तमान भाजपा सरकार ने सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव किया है. 
  • इस पर राज्यपाल ने चार माह पहले ही हस्ताक्षर कर दिया था, जिसके बाद यह केंद्र सरकार के पास रेफर हो गया था. 
  • मगर आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने साफ कह दिया कि चूंकि झारखंड पांचवीं अनुसूचि में आनेवाला इलाका है, इसलिए सीएनटी-एसपीटी एक्ट में किसी तरह का बदलाव ठीक नहीं.

22 नवंबर को झारखंड विधानसभा का स्थापना दिवस था. मुख्यमंत्री रघुवर दास और विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत लगभग सारे नेता समारोह में पहुंचे थे. इस समारोह में झामुमो विधायक और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री प्रोफेसर स्टीफन मरांडी को उत्कृष्ट विधायक के रूप में सम्मानित किया जाना था.

लेकिन समारोह का माहौल कुछ ही देर में तनाव में बदल गया, जब रघुवर और हेमंत सोरेन आमने-सामने एक दूसरे पर निशाना साधने लगे. हेमंत ने कहा, '23 नवंबर को क्या होगा, नहीं मालूम लेकिन सरकार समझ ले कि हाथापाई से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा.'

इस पर रघुवर दास ने कहा कि हम सदन में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन विधेयक पेश करेंगे. आप सदन में उस पर बहस कीजिए. हम नियम को सरल करने जा रहे हैं और आप भी सत्ता में रहते तो यही करते.

तनाव के बीच ही समारोह खत्म हुआ. यह तनाव एक दिन पहले से था. 22 को सदन की कर्यवाही सिर्फ नौ मिनट चलकर स्थगित हो गई थी. शाम होते-होते पूरी राजधानी में माहौल गरमा गया. राजधानी रांची में झामुमो ने मशाल जुलूस निकाल कर विरोध किया.

माले ने प्रति जलाई

झामुमो ने इस मशाल जुलूस में आह्वान किया कि 23 नवंबर को पूरे झारखंड में विरोध किया जाएगा. 22 को ही भाकपा मले ने भी अलग से रैली निकाल कर सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन की प्रति जलायी. राज्य के दूसरे हिस्सों से भी इसी तरह की खबरें आईं.

दो आदिवासी नेताओं ने तुरंत ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल से इस्तीफा भी दे दिया. कुल मिलाकर 22 और 23 तारीख का दिन टकराव का दिन रहा.

झामुमो के बंद के आह्वान से निपटने के लिए पूरे झारखंड में पुलिस और अर्ध सैनक बलों की तैनाती की गई थी. बाबूलाल मरांडी की पार्टी विधानसभा घेरने की ताक में थी. लेकिन सरकार किसी भी तरीके से विधानसभा में विधेयक पेश करना चाहती थी.

सदन की बजाय सड़क पर बवाल

बदली हुई स्थिति में झामुमो और झाविमो गलबहियां करने को तैयार हैं लेकिन वह हो नहीं पा रहा. यह सारा बवाल सीएनटी यानि छोटा नागपुर टिनेंसी एक्ट और एसपीटी यानि संथाल परगना टिनेंसी एक्ट में बदलाव के कारण हो रहा है. हालांकि यह बवाल सदन के अंदर होना चाहिए था लेकिन सदन बार-बार स्थगित हो रहा है और सारी लड़ाइयां या तो सड़क पर हो रही हैं या फिर जुबानी जंग हो रही है.

झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, 'हम लगातार तैयारी में लगे हैं, जो आंदोलन शुरू होगा, वह आगे भी जारी रहेगा.' दूसरी ओर बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा ने भी अलग से तैयारी कर रखी है. झाविमो के नेताओं ने झामुमो के नेताओं से सहयोग मांगा कि जरा समर्थन दें ताकि विधानसभा का मजबूती से घेराव हो सके. लेकिन दोनों की राह अलग ही रही.

यह आंदोलन इसलिए हो रहा है क्योंकि झारखंड की वर्तमान भाजपा सरकार ने सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव किया है. इस पर राज्यपाल ने चार माह पहले ही हस्ताक्षर कर दिया था, वहां से यह केंद्र सरकार के पास रेफर हो गया था. यहां आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने साफ कह दिया कि चूंकि झारखंड पांचवीं अनुसूचि में आनेवाला इलाका है, इसलिए सीएनटी-एसपीटी एक्ट में किसी तरह का बदलाव ठीक नहीं.

आसान नहीं राह

सुभाष कश्यप जैसे संविधान विशेषज्ञों ने साफ कहा था कि राज्यपाल को जब राष्ट्रपति को भेजना था तो हस्ताक्षर नही करना चाहिए था. इसी तरह के कई और सवाल उठे थे. नतीजा यह हुआ था कि राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी नहीं दी थी. राष्ट्रपति ने अगर मंजूरी दे दी होती तो यह अध्यादेश उसी दिन से लागू हो जाता.

अब झारखंड की सरकार इसे कैबिनेट में पास कर सदन में विधेयक बनाकर पेश कर संशोधन को पारित करवाना चाहती है लेकिन यह झारखंड की सरकार के लिए इतना आसान नहीं हो पा रहा.

इस राह में आ रही अड़चन की बड़ी वजह विपक्ष का आंदोलन नहीं है. भाजपा की सरकार राज्य में बहुमत में है और उस पर विरोध का ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला. मुश्किल यह है कि सत्ता में शामिल आजसू भी इसके खिलाफ है और भाजपा के भी कई आदिवासी विधायक अंदर ही अंदर इसके खिलाफ हैं.

जो संशोधन प्रस्ताव है, वह अगर पारित होता है तो कई नियम बदल जाएंगे. इसमें प्रमुख है कि बगैर अपना स्वामित्व बदले जमीन का लैंडयूज बदल कर आदिवासी उसका गैर कृषि उपयोग कर सकेंगे. आदिवासियों की जमीन आधारभूत संरचना के लिए भी ली जाएगी, जो जमीन ली जाएगी अगर उसमें पांच साल में प्रोजेक्ट नहीं लगाए गए तो जमीन वापस हो जाएगी. लेकिन मुआवजा नहीं मिलेगा. इसके अलावा और भी कई प्रावधान हैं, जिसमें सरकार बदलाव करना चाहती है.

अगर संशोधन के प्रस्तावों को गौर से देखें तो झारखंड की सरकार एक ऐसा फैसला लेने जा रही है जिससे आनेवाले दिनों में कई तरह के असर पड़ने वाले हैं लेकिन मुश्किल यह है कि विपक्षी दल ठीक से इसका विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं.

झाविमो के नेता बंधु तिर्की कहते हैं, 'सरकार संसदीय परंपरा निभाये. जब हाउस व्यवस्थित नहीं है तो ऐसे प्रस्ताव को लाने का कोई मतलब नहीं. कारपोरेट घरानों को खैरात में जमीन देने के लिए राज्य की सरकार जबर्दस्ती इसे पास करना चाहती है. हम ऐसा नहीं होने देंगे. भले ही सरकार हेलीकॉप्टर से कितना भी परचा बंटवा ले.'

सरकार की मंशा पर सवाल

बंधु की तरह ही और भी कई विपक्षी नेता सरकार की इस जिद पर सवाल उठाते हैं कि जब राष्ट्रपति ने मंजूरी नहीं दी तो फिर राज्य की सरकार क्यों अड़ी हुई है. इसका जवाब भाजपा के नेता भी अपने तरीके से देते हैं. भाजपा नेता प्रवीण प्रभाकर कहते हैं, 'विपक्षी दल सड़क पर क्यों हंगामा कर रहे हैं. जो कहना है आकर सदन मंे बहस करें.' प्रभाकर कहते हैं कि खुद बाबूलाल मरांडी और हेमंत सोरेन ने कहा था कि सीएनटी और एसपीटी एक्ट में समय के अनुसार बदलाव होना चाहिए लेकिन अब जब हो रहा है तो विरोध कर रहे हैं.

सच यही है कि हेमंत और बाबूलाल अतीत में कह चुके हैं कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में समय के अनुसार बदलाव जरूरी है लेकिन अब वे विरोध कर रहे हैं. वे पुराने दिनों में बदलाव की पैरवी किये जानेवाले सवाल का जवाब नहीं देते. 

इसका जवाब राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास देते हैं. वे कहते हैं, 'बाबूलाल और हेमंत जैसे नेताओं को डर लग रहा है कि अगर भाजपा इस संशोधन को लागू कर देगी तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी. हमारे संशोधन में आदिवासियों की जमीन से मालिकाना हक कभी नहीं जाएगा. कोई मुआवजा देकर भी मालिकाना हक नहीं ले सकेगा. अब नियमों में इतना सरलीकरण कर रहे हैं कि विपक्षी दलों को लग रहा है कि ऐसा हुआ तो फिर वे राजनीति किस बात पर करेंगे.'

रघुवर दास अपनी बात कहते हैं, विपक्षी दल अपनी. अंजाम क्या होगाए अभी किसी को नहीं पता. विपक्ष में बिखराव की स्थिति है इसलिए सरकार विपक्ष से घबरा नहीं रही. उसे परेशानी सिर्फ अपनों से है.

First published: 25 November 2016, 8:24 IST
 
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