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पंजाब कैग रिपोर्ट: वित्तीय गड़बड़ियों का पिटारा आया सामने

राजीव खन्ना | Updated on: 1 April 2017, 9:30 IST

कैग (कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया) की जो रिपोर्ट पंजाब विधान सभा में पेश की गई है, उससे साफ जाहिर है कि अमरन्दिर सिंह सरकार को कैसी वित्तीय स्थिति विरासत में मिली है. रिपोर्ट में पूर्व राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर पोल खोलकर रख दी गई है। यह भी कहा गया है कि यह भयावह हालात मौजूद हैं और इसका बदतर होना जारी है जबकि पूर्व की शिरोमणि अकाली दल -भाजपा सरकार पंजाब में विकास और तरक्की के लम्बे-चौड़े वादे करती रही है.

 

इस रिपोर्ट से राज्य की वित्तीय वित्तीय और सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में किए गए प्रदर्शन की खराब छवि उभरी है. राज्य के वित्तीय हालात पर रिपोर्ट कहती है कि राज्य पर कर्ज का भार 01 लाख करोड़ रुपए से अधिक तक पहुंच गया है. सबसे चिन्ताजनक तथ्य तो यह है कि इस कर्ज का 60 फीसदी हिस्सा अगले सात सालों में चुकता किया जाना है. कैग रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह कर्ज 64,000 करोड़ रुपए (2011-12 ) से बढ़कर 1.03 लाख करोड़ रुपए (2015-16) तक पहुंच गया है. इसका सीधा अर्थ यही है कि कर्ज की राशि हर साल 10,000 करोड़ रुपए के हिसाब से बढ़ी है.

जबकि राजस्व प्राप्तियां 2011-12 में 26,234 करोड़ रुपए थी जो 8.86 फीसदी की वृद्धि के साथ 2015-15 में 41,523 करोड़ रुपए हो गई. राजस्व खर्च जिसमें वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान आदि शामिल है, वह सालाना लगभग 8.95 फीसदी की दर से बढ़ा है.

 

कर्ज जो 2011-12 में 64,000 करोड़ रुपए था वह 2015-16 में बढ़कर 1.03 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गय


प्रिंसिपल ऑडिटर जनरल पंजाब जगबंस सिंह कहते हैं कि पूर्व में हरियाणा को पंजाब की अपेक्षा कम अर्थव्यवस्था वाला राज्य समझा जाता था लेकिन हाल के हरियाण के बजट आंकड़ों से जाहिर है कि इस राज्य की इकोनॉमी पंजाब की अपेक्षा लगभग डेढ़ गुना ज्यादा है.

रिपोर्ट का एक रुचिकर पहलू यह है कि 31 मार्च 2016 को कैपिटल खर्च के लिए 2044.97 करोड़ रुपए के 976 ए.सी. बिलों का एडजस्टमेन्ट लम्बित है. सिंह यह भी कहते हैं कि कई मामलों में तो एडवांस लिए अधिकारी या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या फिर उनका निधन हो चुका है. इस कारण अब इन बिलों का एडजस्टमेन्ट व रिकवरी कड़ी चुनौती है.

 

हद से ज्यादा कुप्रबंधन

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र पर रिपोर्ट कहती है कि इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ा है. विभिन्न क्षेत्रों में कुप्रबंधन का यह उदाहरण है. सर्व शिक्षा अभियान के क्रियान्वयन के ऑडिट में नामुनासिब योजना और क्रियान्वयन में काफी खामियां देखने को मिली. निकटवर्ती स्कूलों और कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों से जुड़े आंकड़ों का अभाव था. इस असंगति की वजह से यूनीफॉर्म और किताबों की खरीद में 14.76 करोड़ रुपए ज्यादा खर्च कर दिए गए. वर्ष 2011-16 के दौरान सर्व शिक्षा अभियान के लिए पंजाब सरकार ने 1362.76 करोड़ रुपए कम जारी किए. पंजाब सरकार ने स्वयं के हिस्से का 48.48 करोड़ रुपए भी 2014-16 में जारी नहीं किया.

 

कुशल अध्यापकों की नियुक्ति भी बच्चों की संख्या के अनुसार नहीं है. बच्चों के कम ज्ञान के कारण इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था. राज्य में कुशल अध्यापकों की तैनाती के लिए स्थाई मानक भी नहीं बनाए गए. इस बीच 2011-16 के बीच बच्चों को यूनीफॉर्म का केवल एक ही सैट दिया गया जबकि दो सैट दिए जाने थे. इसके अलावा मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा तय मानकों के विरुद्ध किताबों की खरीद में 6.46 करोड़ रुपए ज्यादा खर्च किए गए.


शिक्षा क्षेत्र में हालात तो और बदतर हो गए. 1,170 प्राथमिक स्कूल एक ही अध्यापक के सहारे चल रहे हैं जबकि 572 उच्च प्राथमिक स्कूलों में तीन से भी कम अध्यापक हैं.

 

बीमारू ढांचा


राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और रिप्रोडेक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (आरसीएच) के बारे में ऑडिट रिपोर्ट कहती है कि हालांकि स्वास्थ्य केन्द्रों पर फैसेलिटी सर्वे तो कराया गया, पर ढांचागत और मैनपावर की भावी योजना अभी तैयार की जानी है. एनआरएचएम की योजना प्रक्रिया की यह खराब हालत है.


रिपोर्ट यह भी कहती है कि 2011-16 के दौरान इस कार्यक्रम के लिए आवंटित धन का 23 फीसदी धन उपयोग में ही नहीं लाया गया. उप केन्द्रों और जन स्वास्थ्य केन्द्रों पर रिप्रोडेक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ का भी अच्छा हाल नहीं था. सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और जन स्वास्थ्य केन्द्रों पर अल्ट्रा साउण्ड, ब्लड बैंक, सुरक्षित गर्भपात और निर्धारित दवाएं तक नहीं थीं.

इतना ही नहीं, कुल स्वीकृत पदों के विरुद्ध मेडिकल और पैरामेडिकल के स्टाफ में 62 फीसदी की कमी है, जबकि कुछ संवर्ग में यह कमी 100 फीसदी तक है. इस बीच 11 से 20 फीसदी गर्भवती महिलाओं को मूलभूत सुविधाएं जैसे कि आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां नहीं उपलब्ध कराई गईं, नियमित चेकअप भी नहीं हुआ. अस्पतालों में डिलीवरी के बजाए घर पर ही डिलीवरी हुईं, 8 से लेकर 22 फीसदी तक.

खेलों में भी नियम विरुद्ध खर्च


पूर्ववर्ती सरकार राज्य में खेलों में बढ़ावा देने के बढ़-चढ़ कर दावे करती रही है लेकिन ऑडिट रिपोर्ट अलग ही कहानी बयां करती है. रिपोर्ट के अनुसार खेलों को लेकर भावी या वार्षिक योजना नहीं बनाई गई, वित्तीय प्रबंधन भी खराब था, नियम विरुद्ध खर्च और फंड जारी करने में अनियमितत के भी उदाहरण सामने आए हैं. पंचायत युवा खेल अभियान त्रुटिपूर्ण रहा, जबकि कुछ ग्राम पंचायतें उपलब्ध कराए गए धन को खर्च ही नहीं कर सकीं. कुछ ब्लॉक पंचायतों ने जो खर्च किया, उसका फायदा नहीं मिला.

रिपोर्ट में फर्जी बिलों के भी भुगतान किए जाने के उदाहरण हैं. विश्व कप कबड्डी कप के दौरान 1.78 करोड़ रुपए का खर्च नियमों के विरुद्ध किया गया जिसमें जाली बिलों पर की गई 2 लाख रुपए की अदायगी भी शामिल है

नशा मुक्ति केन्द्रों का कुप्रबंधन


कैग रिपोर्ट राज्य के नशा मुक्ति केन्द्रों के कुप्रबंधन पर भी सवाल खड़े करती है. पिछले कई सालों से पंजाब की राजनीति में ड्रग का सेवन बड़ा मुद्दा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार नशा मुक्ति केन्द्रों और पुनर्वास केन्द्रों को भी अच्छी तरह चलाने में सरकार विफल रही है. रिपोर्ट आगे कहती है कि 35 नशामुक्ति एवं पुनर्वास केन्द्र लाइसेंस के बिना संचालित हो रहे थे. पांच नशामुक्ति एवं पुनर्वास केन्द्रों को 6.93 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित किया गया था, लेकिन कर्मचारियों एवं उपकरणों की कमी के चलते उनका संचालन नहीं पाया. नशा मुक्ति वाली दवा खरीदने पर 2.40 करोड़ रुपए का अत्यधिक खर्च हुआ.

 

कठिन राह


वर्तमान सरकार के लिए इस गड़बड़ी की सफाई करना आसान काम नहीं है. कैप्टन ने घोषणा की है कि राज्य के खराब वित्तीय हलात पर जल्द ही एक श्वेत पत्र लाया जाएगा और पंजाब के खराब हालात के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं, उनकी एकाउंटिबिलटी तय की जाएगी. उन्होंने दावा कि यह लोगों की आंखें खोलने वाला होगा कि किस तरह से शिअद-भाजपा सरकार के एक दशक के 'कुशासन' के दौरान कुप्रबंधन और कुप्रशासन रहा.

इस बीच एक अलग रुख अपनाते हुए आम आदमी पार्टी और लोक इंसाफ पार्टी गठबंधन ने मांग की है कि पूर्व सरकार द्वारा की गई वित्तीय और अन्य अनियमितताओं की जांच के लिए सरकार एक जांच आयोग का गठन करे. राज्य विधान सभा में विपक्ष के नेता एच एस फूलका ने मांग की है कि श्वेत पेपर में 20 साल के लेखे-जोखे को कवर किया जाना चाहिए ताकि लोग इस अवधि में सभी सत्तारूढ़ दलों के कार्यों, उपलब्धियों का विश्लेषण कर सकें.

First published: 1 April 2017, 9:30 IST
 
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