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पंजाब: भगत सिंह के गांव बंगा में बदलाव की बयार

राजीव खन्ना | Updated on: 29 January 2017, 8:51 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

‘उनकी पुण्यतिथि पर हर साल मेला लगता है. मेले में सभी उन्हें श्रद्धांजलि देने आते हैं. सभी पार्टियों ने उनकी विरासत को अपनाने की कोशिश की है, पर कोई उनके आसपास भी नहीं है. बल्कि पुलिस की तैनाती से उनकी याद में लगने वाले मेले को सरकारी जामा पहना दिया गया है. वे उन्हें माला पहनाते हैं, फूल चढ़ाते हैं, जो अगले कुछ घंटों में मुरझा जाते हैं,’ 70 साल के बुज़ुर्ग मोहन लाल का यह कहना है मशहूर क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके गांव बंगा के बारे में. 

बदलाव की चाहत

बंगा गांव जिस विधानसभा में आता है, वह आरक्षित है. इस गांव के राजनीतिक हालात से पंजाब के मतदाताओं का आम मूड जाहिर होता है. यहां कांग्रेस ने एक पूर्व बसपा नेता सतनाम सिंह कैंथ को चुनाव में खड़ा किया है. कैंथ जो पहले अकाली दल की भी सवारी कर चुके हैं जब इस सीट के तत्कालीन विधायक तरलोचन सिंह सूंध की जगह उन्हें टिकट दिया गया था. 

सूंध हाल ही में राज्य विधानसभा में सत्ता पक्ष की ओर जूता उछालने के लिए सुर्खियों में आए थे. नतीजतन, सूंध ने अपना नामांकन स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर भरा है और कांग्रेस के पुराने मतदाता बाहरी कैंथ को लाने के लिए पार्टी से नाराज हैं. इससे पार्टी के लिए सीट बरकरार रखने की बहुत कम उम्मीद है, जहां 5 उम्मीदवार हाशिए पर हैं.

आप के पक्ष में माहौल

पर जो शख्स यहां समस्यएं खड़ी कर रहा हैं, वह आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार हरजोत कौर हैं. वह आम आदमी पार्टी की तरफ से खड़ी की गईं सबसे छोटी महज 26 साल की उम्मीदवार हैं. वे अपने सभी विरोधियों को, जो 50 की उम्र से बड़े हैं, अच्छी-खासी टक्कर दे रही हैं. यहां के मतदाताओं का कहना है कि वे सद के डॉ. सुखविन्दर सुखी से सीधे मुकाबले में हैं. इस चुनावी जंग में पांचवे उम्मीदवार बसपा के राजेंदर सिंह ठेकेदार हैं.

दलित बहुल निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद, बसपा की मतदाताओं पर कोई पकड़ नहीं है. खटकड़ कलां गांव के ठेकेदार राज पाल कहते हैं, ‘लोग बसपा उम्मीदवारों से छला हुआ महसूस कर रहे हैं. उन्होंने हमेशा खुद को बेचा है. उन्होंने हमेशा सत्ता पक्ष का साथ दिया है और दलितों के मुद्दों को उठाने में विफल रहे हैं.’ उन्होंने सतनाम कैंथ की ओर इशारा किया, जो कभी बसपा विधायक थे और विपक्ष में नेता की रैंक में आ गए थे.

उन्होंने सुखी की ओर भी इशारा किया. वे भी पहले वरिष्ठ बसपा नेता थे. व्यापक मत है कि पिछले चुनावों में बसपा ने राज्य में कांग्रेस की हार सुनिश्चित करने के लिए अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. पर इस आरोप का बसपा नेतृत्व हमेशा खंडन करता रहा है.

आप का समर्थन क्यों?

मोहन लाल कहते हैं कि अब सवाल यह है कि यहां आप को समर्थन क्यों मिल रहा है? पहला जवाब है, ‘लोग बदलाव चाहते हैं. हमने सबको आजमा लिया है. तो इस बार नई सत्ता क्यों नहीं?’ एक छोटा दुकानदार और भी ज्यादा मुखर है. वह कहते हैं, ‘18 साल पहले एक दुर्घटना में मेरी टांग कट गई थी. पिछले साल तक मुझे हर महीने 250 रुपए की बहुत ही मामूली पेंशन मिल रही थी, जो बाद में दुगुनी कर दी गई. पर कई महीनों से वह नहीं मिल रही है. ताज्जुब है मुझे कि वे सस्ता आटा-दाल मुहैया कराने का वादा करते हैं, पर सबको रोजगार क्यों नहीं देते. उन्हें खुद आटा-दाल खरीदने लायक क्यों नहीं बनाते, भले ही महंगा हो. मैं इस उम्मीद के साथ परिवर्तन चाहता हूं कि नई सत्ता आने से चीजें सुधरेंगी.’

इस इलाक़े में आप के लिए वोट मांगने प्रवासी भारतीय अपने घर लौट आए हैं. बंगा के एक  व्यक्ति ने कहा, ‘वे मतदाताओं से आप को वोट देने के लिए बराबर कह रहे हैं. वे कुप्रबंध और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए कहते हैं कि भ्रष्ट अधिकारी प्रवासियों तक को नहीं बख्श रहे हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि हरजोत ने अन्य पार्टियों द्वारा अपने उम्मीदवारों की घोषणा से बहुत पहले घर-घर जाकर कैंपेन पूरी कर ली है.

आप के समर्थन की अन्य वजह यह है कि पूर्व महासचिव और एसजीपीसी सदस्य सुखदेव सिंह भौर हाल ही में पार्टी में शामिल हुए हैं. पंजाब में गुरु ग्रंथ साहब को अपवित्र करने की घटनाओं और ऐसा करने वाले षडयंत्रकारियों को गिरफ्तार करने में सरकार की विफलता के विरोध में उन्होंने अक्टूबर 2015 में सत्तासीन सद से इस्तीफा दे दिया था. उस समय वे एसजीपीसी के महासचिव थे.  शीर्ष अकाली नेता के करीबी विश्वस्त और एसजीपीसी के पूर्व अध्यक्ष गुरुचरण सिंह तोहरा, सुखदेव सिंह भौर इस इलाके में काफी लोकप्रिय हैं.

अकालियों ने किया है काम

फिर भी हरजोत के लिए जीतना आसान नहीं होगा क्योंकि सुखी अकाली काडर का साथ देकर उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं. वे लोगों के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को लेकर काफी लोकप्रिय हैं. सुखी के एक समर्थक ने कहा, ‘प्रवासी भारतीयों के कैंपेन से कुछ अंतर नहीं पड़ेगा. लोग जानते हैं कि ये एनआरआई महज अपने अनुमान के आधार पर हल्ला मचा कर लौट जाएंगे. यहां वे हैं, जिन्हें यहां काम करना है. इसका गलत प्रचार किया गया है कि एनआरआई कैंपेन के लिए आए हैं. वे हर साल लोहिड़ी और उसके बाद परिवार में होने वाली शादियों के लिए आते हैं.’

अकाली कार्यकर्ता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि सुखी ने अपने बसपा के दिनों में दलित मतदाताओं के साथ जो संबंध बनाए थे, उससे भी उन्हें मदद मिलेगी. एक अकाली कार्यकर्ता ने कहा, ‘इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि सद-भाजपा शासन के दौरान यहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में विकास हुआ है. यहां ये सडक़ें और सुविधाएं नहीं थीं. लोग विकास चाहते हैं, तो अकालियों को वोट करेंगे.’

First published: 29 January 2017, 8:51 IST
 
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