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पंजाब: नई सुबह का आगाज़ करेगा सिखों का नया साल

आदित्य मेनन | Updated on: 5 February 2017, 7:54 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

पंजाब कभी ऐसा लाचार और मायूस नहीं था. जो जज्बा उसमें बुरे से बुरे वक्त में रहा, उसे आज की उसकी दानवी समस्याओं ने कुचल कर रख दिया है. वे अपने उस ऐतिहासिक गौरव और गरिमा को भूल गए लगते हैं, जिसकी याद में हर साल माघ महीने में मेला लगता है. माघ का मेला सिखों के लिए एक बहुत ही अहम धार्मिक मेला है, जिसका राष्ट्रीय महत्व भी है.

13 जनवरी से 11 फरवरी तक पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब में यह मेला उन 40 योद्धाओं के सम्मान में लगता है, जो 1705 में मुक्तसर के युद्ध में मुगलों से लड़ते हुए शहीद हुए थे. इन चालीस योद्धाओं ने पहले गुरु गोविंद सिंह का साथ छोड़ दिया था, पर एक वीरांगना माई भागो ने उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित किया, तो वे खिदराना में गुरु के पास लौटे. उन्होंने मुगलों का सफलतापूर्वक सामना किया, पर माई भागो और ये 40 योद्धा युद्ध में मारे गए. बाद में खिदराना के इस युद्ध का नाम मुक्तसर (मुक्त तालाब) रख दिया गया. 

पंजाब में कइयों के लिए माघ का महीना आजादी की इसी भावना का प्रतीक है. महज निरंकुश शासन से ही नहीं, बल्कि लाचारी की संस्कृति से भी मुक्ति के लिए. इस क्षेत्र ने विदेशी हमलावरों का सदियों से ही नहीं, हजारों सालों से सामना किया है. जब शायद पोरस की अलेक्जेंडर से लड़ाई हुई थी. 1947 के विभाजन की खौफनाक हिंसा और खालिस्तान-विद्रोह का भी वह साक्षी रहा है. और उसके बाद राज्य में कड़ी हिंसक कार्रवाई हुई. 

पिछले कुछ सालों में राज्य के लोग जिस तरह से मायूसी और लाचारी महसूस कर रहे हैं, शायद ही कभी हुए होंगे.

पर पंजाब हर बार संकट और हिंसा के दौर से उबरा, केवल यहां के लोगों के जज्बे की वजह से. आजादी के बाद भी पंजाब का हर क्षेत्र में योगदान रहा-सशस्त्र सेना, उद्योग, कृषि, शिक्षा, खेल, संस्कृति सभी में...कम संसाधनों के बावजूद बेइंतहा. पिछले कुछ सालों में राज्य के लोग जिस तरह से मायूसी और लाचारी महसूस कर रहे हैं, शायद ही कभी हुए होंगे. इस लाचारी के कारण आज उनमें वो जज्बा नहीं रहा है, जिस पर वे कभी गौरव किया करते थे. उनमें परिस्थितियों से लड़ने और बदलने की जबर्दस्त इच्छाशक्ति जाने कहां हवा हो गई. 

अकालियों का विश्वासघात

पंजाब जाएंगे तो महसूस करेंगे कि राज्य ड्रग्स, कर्ज, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से बहुत ज्यादा त्रस्त और बेतहाशा रोष में है. लोग इसके लिए राज्य की शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार को जवाबदेह मानते हैं. खासकर अकाली दल से बेहद नाराज हैं क्योंकि उन्हें उनमें विश्वासघात की बू आती है. 

यह वह पार्टी है, जो करीब एक सदी पहले बनी थी और उसका एकमात्र एजेंडा पंथ को बचाना था. जब उसने भाषा को लेकर पंजाबी सूबा आंदोलन चलाया, तब भी उसका मुख्य लक्ष्य पंथ को बचाना और प्रचार करना था. 1980 के दशक और 1990 के शुरुआती दशक में अशांति के दौर में भी वह अपनी यही भूमिका अदा करती रही. एक ओर देश था, तो दूसरी ओर खालिस्तानी चरमपंथी, दोनों के बीच समझौते की कोशिश करते हुए.   

शुरू से नरम पंथ की वकालत और बतौर राजनेता अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए, जिन्होंने सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री तक की यात्रा तय की, उन प्रकाश सिंह बादल ने 90 के दशक के मध्य में अकाली दल पर पूरा नियंत्रण करके अन्य सभी विरोधों पर विराम लगा दिया था. खालिस्तानी उपद्रव के बाद बादल ने पंजाब में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभाई और अकाली दल की उस पार्टी के तौर पर विश्वसनीयता बनाए रखी, जो हमेशा पंथ की हिफाजत करेगी.

पिछले पांच सालों में लगता है अकाली दल एक ऐसी पार्टी बन गई, जिसने पंथ और पंजाबियत बचाने के नाम पर केवल अपना और बादल परिवार का हित साधा. पंजाब का हर क्षेत्र बादल के कुटुंब और उनके अंतरंग मित्रों के नियंत्रण में हो गया. गुरुद्वारा, नागरिक प्रशासन, व्यवसाय और, जैसा कि कुछ का आरोप है, राज्य में बढ़ता ड्रग्स का कारोबार. बादल और उनके कैरों और मजीठिया जैसे करीबी परिवारों का पंजाब की अर्थव्यवस्था के लगभग हर सेक्टर में शेयर है. पावर, नागर विमानन, परिवहन, मेहमानदारी, जमीन, शराब, केबल टेलीविजन, मीडिया आदि सभी में. 

पंजाब में एक मजाक प्रचलित है कि यहां कोई भी बादल की बस या हवाईजहाज से आ-जा सकते हैं, उनसे जुड़ी किसी कंपनी के होटल में ठहर सकते हैं, टीवी देख सकते हैं, जिसके लिए बिजली और केबल कनैक्शन बादल के कुटुंब की कंपनी के हैं. अकाली नेता बिक्रम मजीठिया, दीप मल्होत्रा या शिव लाल डोडा की बनाई शराब के घूंट लेते हुए उनका पीटीसी चैनल देख सकते हैं.  

बादल और उनके उत्पादक संघ का पंजाब की अर्थव्यवस्था में जिस तरह का नियंत्रण है, ऐसा भारत में और कहीं नहीं सुना. सबसे दयनीय बात यह है कि उन्होंने अपने कारोबार को तब बढ़ाया है, जब पूरे पंजाब के किसान कर्ज में डूबे हैं और राज्य के युवा बेरोजगारी और नशे के चंगुल में फंसे हैं. हां, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि अकालियों ने पंजाब को स्थिरता दी और राज्य के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाया. पर उनकी नीतियों ने व्यापक स्तर पर असमानताएं बढ़ाईं और कर्ज, ड्रग्स, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की चार दानवी समस्याएं दीं. इन्हीं सबने पंजाब के जज्बे को मार दिया. 

गांव दर गांव, यहां तक कि प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल के खुद के गांवों तक में लोग बार-बार कह रहे हैं कि ‘बादलां ने पिंडाच लोका नू कित्ता है’ (गांवों में बादल ने कष्ट दिए हैं) या यह कि उन्होंने पंजाब के युवाओं में नशे की लत डाल दी है. जट्ट सिख समुदाय में ज्यादा रोष है, जिनका अकाली दल को मूल सहयोग रहा है. 

उनकी जो अंतिम खूबी थी कि वे पंथ के रक्षक हैं, उस पर भी उन्होंने पानी फेर दिया, जब वे गुरु ग्रंथ साहिब को अपमान से नहीं बचा सके और डेरा सच्चा सौदा के साथ मिल गए. 

कांग्रेस या आप?

पंजाब में हाल के विधानसभा चुनाव का केवल एक मकसद है-सद-भाजपा सरकार से पंजाब की मुक्ति. सर्वे और चर्चाएं इस का प्रमाण हैं कि पंजाब में अकाली-विरोधी लहर है. पर सवाल यह है कि इससे कौन फायदा उठाएगा-कांग्रेस या आप?

जवाब इस पर निर्भर है कि जिन वोटर्स ने 4 फरवरी को वोट दिया है, वे नई सरकार चाहते हैं या नई व्यवस्था. कांग्रेस और आप ने पिछले कुछ महीनों में अपने-अ्पने नजरिए को रखते हुए शानदार कैंपेनिंग की है. 

वह राज्य, जहां दशकों से 5-6 परिवारों का राजनीति पर वर्चस्व रहा है, कांग्रेस ने पंजाब के शासक वर्ग से कैप्टन अमरिंदर सिंह को खड़ा किया है. कैंपेन मे 75 साल के अमरिंदर की एक मजबूत नेता की छवि बनाई गई है, जो बादल को हरा सकते हैं अैर राज्य को फिर से  पटरी पर ला सकते हैं. ‘कैप्टन डे नाउ नुक्ते’ की अवधारणा बताती है कि अमरिंदर वे शख्स हैं, जिनके पास पंजाब की समस्याओं के समाधान के लिए एकदम सटीक नीतियां हैं. 

दूसरी ओर आप उस इच्छा का प्रतिनिधित्व कर रही है, जो ना केवल बादल परिवार, बल्कि उन सभी लोगों से मुक्ति दिलाना चाहती है, जो भ्रष्ट और अपराधी माने जाते हैं. बादल ने आप और उसके भगवंत मान जैसे नेताओं को हटाया, पर इससे पंजाब में अकाली-विरोधी प्रवक्ता के तौर पर उनकी स्थिति मजबूत ही हुई है. 

चाहे कैसे भी हो, पंजाब बदलाव चाहता है. चुनाव भी माघ के महीने में हुए हैं. डेढ़ महीने बाद सिख के नर्व वर्ष की संध्या पर नतीजे आ जाएंगे. यह नया साल निश्चित रूप से पंजाब में एक नई सुबह का आगाज करेगा.

First published: 5 February 2017, 7:54 IST
 
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