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'बर्ख़ास्त जज प्रभाकर ग्वाल के फ़ैसले अच्छे मगर गुण घातक और भाषा असंसदीय'

राजकुमार सोनी | Updated on: 1 May 2017, 12:12 IST


बस्तर के माओवाद प्रभावित सुकमा जिले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रहे प्रभाकर ग्वाल को बीते साल एक अप्रैल 2016 को उच्च न्यायालय की अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ के विधि विभाग ने 'जनहित' में बर्खास्त कर दिया था. नेताओं और अफसरों के खिलाफ दिए गए सख्त फैसलों के चलते सुर्खियों में रहे इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी के बाद यह बहस चल पड़ी थी कि जनहित ही उनकी बर्खास्तगी की वजह थी या कुछ और?

 

इधर बर्खास्तगी के एक साल बाद 10 अप्रैल 2017 को उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार की ओर से लिखे गए गोपनीय प्रतिवेदन में कहा गया है कि ग्वाल के भीतर न्यायिक कार्य को लेकर जो गुण होना चाहिए वह मौजूद हैं, लेकिन उनके द्वारा माननीय उच्च न्यायालय से जो भी पत्राचार किया गया है उसकी भाषा और शब्दावली असंसदीय है. इसके अतिरिक्त उनमें और भी जो गुण है वह न्याय जगत, संस्था और हम सभी के लिए घातक है.

 

देर रात दी गई सूचना


ग्वाल फिलहाल महासमुंद जिले की तहसील सरायपाली के एक गांव नानकपाली में न्यायिक सेवा के लिए अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को टयूशन देकर गुजर-बसर कर रहे हैं. उन्होंने बताया जब उन्हें बर्खास्त किया गया था तब उसकी एकमात्र वजह जनहित बताई गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार की तरफ से जो गोपनीय प्रतिवेदन उन्हें भेजा गया है उसमें साफ कहा गया है कि न्यायिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त गुण मौजूद हैं.

 

उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब उनके द्वारा सारे फैसले जनहित में लिए गए हैं तो फिर जनहित में उनकी बर्खास्तगी कैसे हो सकती है? उन्होंने बताया कि बर्खास्तगी के एक साल बाद 15 अप्रैल को न्यायालय का एक कर्मचारी देर रात उनके घर डाक लेकर पहुंचा था. वे घर पर मौजूद नहीं थे, लेकिन परिजनों ने जो पत्र रिसीव किया उसमें 10 अप्रैल की तिथि अंकित है.

 

कौन सा अपराध?


ग्वाल ने बताया कि जब छत्तीसगढ़ में पीएमटी पर्चा लीक कांड हुआ था तब भाजपा के एक विधायक रामलाल चौहान ने उनके कक्ष में यह कहकर धमकाया था कि उन्हें किसी झूठे मामले में फंसा दिया जाएगा. पर्चालीक कांड में उनके द्वारा रायपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा की भूमिका को भी संदिग्ध बताते हुए न केवल तल्ख टिप्पणी की गई थी बल्कि फैसले की एक कॉपी पुलिस महानिदेशक को भेजते हुए पुलिस अधीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को लिखा गया था.

सीबीआई का विशेष मजिस्ट्रेट रहने के दौरान जब उन्होंने बिलासपुर के तात्कालीन पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा की मौत के मामले में मृतक के रिश्तेदारों, विवेचक और घटनास्थल पर मौजूद गवाहों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया तब बहुत से लोग बौखला गए थे. 21 अक्टूबर 2014 बिलासपुर जिले के भदौरा इलाके के एक जमीन घोटाले में जब उन्होंने पटवारी, उपसरपंच समेत तीन आरोपियों को सश्रम कारावास की सजा सुनाई तब भी भाजपा के एक कद्दावर मंत्री की भूमिका उजागर हुई.

ग्वाल ने बताया कि कभी उन्हें निर्णय बदलने के लिए प्रलोभन दिया गया तो कभी बाहुबली और ताकतवर लोगों ने कहा कि उनके फैसले सरकार को खटक रहे हैं. उन्हें अपनी जान का खतरा बना हुआ था जो अब है. ऐसे में अगर उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं के पास किसी तरह की शिकायत की है तो कौन-सा अपराध कर दिया है?

 

कैसे ख़त्म हो माओवाद


ग्वाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में नेताओं और अफसरों का खतरनाक गठजोड़ साफ दिखाई देता हैं. यह गठजोड़ आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और माओवादी मोर्चे पर कायम है. उन्होंने बताया उन्हें बतौर सजा बस्तर के माओवाद जिले सुकमा में भेजा गया था, लेकिन वहां पर पदस्थ रहने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि माओवाद के नाम पर हर रोज बेगुनाह आदिवासियों को फंसाया जा रहा था. उनकी अदालत में हर रोज ऐसे आदिवासी लाए जाते थे जो सीधे-सादे ग्रामीण होते थे. जो बंदूक और हथियारों के बारे में नहीं जानते पुलिस उन्हें माओवादी बताने में तुली रहती थी.


जब उन्होंने बेगुनाह आदिवासियों को बचाने का काम किया तब वहां की पुलिस ने कहा कि मैं उनके काम में अडंगे डाल रहा हूं. सुकमा के कलक्टर ने तो यहां तक कहा कि किसी भी तरह का फैसला लेने से पहले मैं उनसे पूछ लिया करूं. बस्तर में माओवाद की समस्या सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो रही है क्योंकि नेता और अफसर दोनों ही नहीं चाहते हैं कि इस समस्या का कोई समाधान हो. ग्वाल ने बताया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार फिलहाल उन्हें यह जानने का हक तो है कि उनके कौन-कौन से पत्र की भाषा गंदी और भद्दी है? वे यह भी जानना चाहेंगे कि उनका कौन-सा गुण समाज के लिए घातक हैं?

 

First published: 1 May 2017, 12:12 IST
 
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