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महाराष्ट्र: बेबुनियाद हैं शिक्षा पर खर्च बढ़ने की बातें

अश्विन अघोर | Updated on: 14 January 2017, 8:32 IST
(फ़ाइल फोटो )

नीति निर्माताओं और आम लोगों के बीच शिक्षा सबसे अधिक बहस का विषय है, लेकिन जब फंड आवंटन की बारी आती है जो शिक्षा के हिस्से उपेक्षा ही हाथ लगती है. यह और बात है कि सरकार दावा करती है कि उसने शिक्षा सेक्टर में सुधार लाने तथा हर बच्चे को लाभ पहुंचाने के लिए कई कदम उठाए हैं. 

राज्य सरकार ने हाल में उन बच्चों का सर्वेक्षण किया था जो कि स्कूल से बाहर हैं और हरेक बच्चे को स्कूल लाने के लिए अभियान भी चलाया था. केंद्र सरकार ने 2002 में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया था. लेकिन लगता नहीं है कि राज्यों ने इसको उतनी गंभीरता से लिया, जितना कि लिया जाना था. महराष्ट्र सरकार का दावा है कि हरेक बच्चे को स्कूल लाने के लिए चलाए अभियान के अंतर्गत उसने अनेक कदम उठाए हैं लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं.

एनजीओ चाइल्ड राइट एंड यू (क्राइ) और सेंटर फॉर बजट, गवर्नेंस एंड एकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए) की स्टडी से यह उजागर हुआ है कि शिक्षा पर सरकार का बजटीय खर्च पिछले चार साल से बिल्कुल नहीं बढ़ा है. इसके मुताबिक स्कूली शिक्षा पर सरकार का खर्च राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में पिछले चार साल (2012—13 से 2015—16) में जीडीपी के 2.7 प्रतिशत पर स्थिर बना हुआ है. जबकि महाराष्ट्र सरकार का बजटीय खर्च ग्रॉस स्टेट डॉमेस्टिक प्रोड्यूस (जीएसडीपी) के 2.3 प्रतिशत पर स्थिर बना हुआ है. 

चार साल में बजट जस का तस

बजटीय खर्च के समग्र परिप्रेक्ष्य में किए गए इस अध्ययन में, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों का फंड शामिल था, कक्षा एक से बारह तक की स्कूली शिक्षा पर किया गया खर्च समाहित रहा. यह अध्ययन बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में किया गया था. 

अध्ययन के मुताबिक महाराष्ट्र में स्कूली शिक्षा पर किया गया खर्च इन राज्यों में सबसे अधिक कुल बजटीय आवंटन के 18 प्रतिशत जरूर रहा, लेकिन चिंता की बात यह है कि यह पिछले चार साल से लगभग इसी स्तर पर बना हुआ है. 

क्राइ के क्रियाने रबादी, क्षेत्रीय निदेशक, पश्चिम के अनुसार महाराष्ट्र सरकार अपने प्रति छात्र पर 28,630 रुपये खर्च करती है जबकि केंद्रीय विद्यालय अपने प्रति छात्र पर 32,263 रुपये खर्च करता है. रबादी के अनुसार महाराष्ट्र सरकार को शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत बुनियादी ढांचा, शिक्षण तथा शिक्षा की गुणवत्ता संबंधी मानकों पर मौजूदा फासले को पाटते हुए वांछित लक्ष्यों को हासिल करना होगा. 

चौंकाने वाला फ़ासला

हालांकि महाराष्ट्र सरकार शिक्षा सेक्टर में स्थिति को सुधारने के लिए काफी फंड दे रही है, पर राज्य में सरकारी सेकेंडरी और उच्चतर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या चिंताजनक रूप से कम है. रबादी ने कहा राज्य में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच जो भारी फासला है वह स्तब्ध करने वाला है. अगर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर ड्राप ऑउट की समस्या से निपटना है तो इस फासले को पाटने की जरूरत है. यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे अपनी सेकेंडरी स्कूल की शिक्षा पूरी करें. 

इस अध्ययन के मुताबिक प्रारंभिक शिक्षा देने में सरकारी स्कूलों का हिस्सा 70 प्रतिशत है जबकि निजी स्कूलों का हिस्सा 30 प्रतिशत. लेकिन जब सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी शिक्षा में हिस्सेदारी की बात आती है तो सरकारी स्कूल क्रमश: 8 प्रतिशत और 5 प्रतिशत  के आंकड़े पर ही टिके नजर आते हैं. जबकि निजी स्कूलों की हिस्सेदारी बढ़कर क्रमश: 92 और 95 प्रतिशत हो जाती है. इस तरह इस स्तर पर निजी स्कूलों का पूर्ण प्रभुत्व नजर आता है. छात्रों की तरह शिक्षकों पर भी सरकार की इस उदासीनता का असर देखा जा सकता है. 

ठेका प्रथा में बढ़ोतरी

इससे स्पष्ट है कि सरकार स्कूली शिक्षा के बजट का मात्र 0.4 प्रतिशत ही प्रशिक्षण पर खर्च करती है. सीबीजीए के निदेशक सुब्रत दास का कहना है कि प्रारंभिक शिक्षा में ठेका शिक्षकों का अनुपात जहां 2009-10 में 1.8 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 6 प्रतिशत हो गया, वहीं ऐसे शिक्षकों का प्रतिशत जिन्होंने अपने सेवा काल में प्रशिक्षण प्राप्त किया 2009-10 की अवधि में 32 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 7.6 प्रतिशत तक पहुंच गया.

दास आगे कहते हैं कि महाराष्ट्र में स्कूल जाने वाले बच्चों के उम्र वर्ग में सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर यानी कि एससी-एसटी समुदाय के छात्रों की संख्या 24 प्रतिशत है जबकि ऐसे हाशिये पर मौजूद छात्रों के लिए बनाई गईं विशेष योजनाओं पर सरकार का खर्च स्कूली शिक्षा के बजट का मात्र 1.9 प्रतिशत है.

रबादी का कहना है कि महाराष्ट्र में 1979 से सहयोगी संगठनों के साथ काम करने का हमारा अनुभव यही कहता है कि सरकारी स्कूलों में सुधार लाने के लिए बुनियादी ढांचा, शिक्षा और शिक्षण इन सभी स्तरों पर कहीं अधिक निवेश करना होगा. रबादी आगे कहती हैं कि हमें गहरे उतरकर यह देखना होगा कि वे कौन से खाली जगह हैं जहां कि स्पष्ट रूप से फंड की कमी देखी जा रही है.

ज़रूरत स्कूलों की

रबादी के अनुसार एक प्रगतिशील राज्य के रूप में महाराष्ट्र में कहीं अधिक सरकारी सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों की जरूरत है. साथ ही हाशिये पर मौजूद कमजोर वर्ग के छात्रों तक भी पहुंचने के लिए कहीं सघन प्रयासों की दरकार होगी. साथ ही शिक्षकों की भर्ती, प्रशिक्षण और उनकी क्षमताएं बढ़ाने के प्रयासों पर भी काफी निवेश किए जाने की जरूरत है.

वहीं दास के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर बजट में शिक्षा पर जो राशि खर्च की जा रही है वह अपर्याप्त है. सिर्फ इसलिए नहीं कि दशकों पहले कोठारी कमीशन द्वारा सुझाए गए निवेश मानकों पर भी खरा नहीं उतरती, बल्कि इसलिए भी कि स्कूली शिक्षा की लगभग सभी जरूरी मदों पर हमारा खर्च बहुत कम है.

First published: 14 January 2017, 8:32 IST
 
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