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तमिलनाडु: शशिकला का रक्तहीन तख्तापलट

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 February 2017, 8:53 IST

चार दिसंबर, 2016 को जब तमिलनाडु की 'अम्मा' अस्पताल में मृत्यु शैय्या पर पड़ी थीं उस वक्त आईसीयू से लेकर उनकी अंतिम यात्रा तक उनकी परछायी बनी रही शशिकला. एक-एक काम उनकी मर्जी से हो रहा था. वहां मौजूद रहकर वो किसे जयललिता से मिलना है, अंतिम संस्कार किस तरह होगा आदि पर निर्णय कर रही थीं. मंत्री और विधायक उनके इशारे पर काम कर रहे थे.

जयललिता के खास रहे ओ पनीरसेल्वम तीन बार 'स्टैंड बाई' मुख्यमंत्री बने. लेकिन जयललिता की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके के प्रमुख के तौर पर शशिकला की ताजपोशी के बाद किसी राजनीतिक पंडितों और जानकारों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

जयललिता की मृत्यु के बाद दक्षिणी सूबे के इस दल में एक किस्म की अस्थिरता देखने को मिल रही थी. पार्टी के अंदर भी सवाल मथ रहा था कि उनकी राजनीतिक विरासत कौन संभालेगा.

विरासत का फैसला जनता को आकर्षित करने और चुनाव में वोट लाने से तय होता है. फिलहाल जयललिता जितना लोकप्रिय न तो शशिकला नजर आती हैं न ही ओ पन्नीरसेल्वम. वोट जुटाने की दोनों की क्षमता परखी जानी अभी शेष है. लेकिन हर किसी को इसका अंदाज़ा था कि एक न एक दिन पार्टी और सरकार की कमान शशिकला अपने हाथों में ले लेंगी.

जयललिता के निधन के बाद से ही शशिकला के राज्य की बागडोर संभालने के कयास लगाए जाने लगे थे. लेकिन शशिकला ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. उन्होंने सबसे पहले पार्टी महासचिव का पद हासिल किया. इससे पहले यह पार्टी बनने के बाद से लगातार जयललिता के पास रहा था. शशिकला ने इसके जरिए पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत की. पार्टी में अपने संभावित विरोधियों को नियंत्रित किया.

मुख्यमंत्री का पद जरूरी क्यों?

जयललिता ने कभी भी अपने उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा नहीं की थी. इस लिहाज से देखा जाय तो तीन बार स्टैंड बाइ मुख्यमंत्री बने पनीरसेल्वम ही पार्टी के अंदर प्रशासन को लेकर सबसे अनुभवी व्यक्ति थे. हालांकि नेपथ्य से शशिकला भी जयललिता के रहते कथित तौर पर प्रशासन के कार्यों में हस्तक्षेप करती थीं लेकिन कभी भी वो किसी पद पर नहीं रही.

जब आय से अधिक संपत्ति के आरोप में जयललिता को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी तब पनीरसेल्वम ने ही सरकार की बागडोर संभाली थी. पन्नीरसेल्वम ने जयललिता का भरोसा कभी नहीं तोड़ा. दोबारा जब जब जयललिता लौटी, समर्पित सेवक की तरह उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें सौंप दी. जयललिता के निधन से पार्टी के अंदर एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया था. यह एक व्यक्ति केंद्रित पार्टी का नुकसान है.

लिहाजा एआईएडीएमके बहुत शिद्दत से किसी ऐसे नेतृत्व की जरूरत महसूस कर रही थी जो पार्टी को संगठित करने के साथ ही पूरे कैडर में नया जोश भर सके. पार्टी को इस खालीपन का अहसास था. कम से कम शशिकला इसे एक हद तक भर सकती है.

द्रविड़ पार्टियां एआईडीएमके हो या डीएमके, इनका संस्तागत ढांचा कम्युनिस्ट पार्टियों के तर्ज पर बना है. लिहाजा इनमें पार्टी प्रमुख सरकार के मुखिया से ज्यादा महत्व रखता है और पार्टी कैडरों का सरकार में काफी प्रभाव होता है.

लेकिन एआईडीएमके के मामले में यह बात देखनी होगी कि शशिकला के पार्टी प्रमुख और फिर मुख्यमंत्री बनने से पार्टी कैडर कितने खुश या नाराज हैं. एक आम बात तमिलनाडु से यह सुनने को मिलती रही है कि जयललिता को आंख बंद कर चाहने वाला उसका समर्थक वर्ग शशिकला को बिल्कुल पसंद नहीं करता. लिहाजा आगे शशिकला को भी कदम-कदम पर परीक्षाएं देनी होंगी.

विधायकों का समर्थन होना एक बात है और पार्टी कैडर का समर्थन होना दूसरी बात है. इसकी एक वजह यह रही है कि उन्होंने लंबे समय से टिकटों के बंटवारे में भूमिका निभाई है. एक सच्चाई यह भी है कि पिछले साल जब जयललिता अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती थीं तब पार्टी कैडर उनकी भतीजी दीपा जयकुमार के घर के बाहर नारे लगाकर उनसे राजनीति में शामिल होने की मांग कर रहे थे.

पन्नीरसेल्वम ने खाली की कुर्सी

एआईएडीएमके सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने पार्टी के विधायकों के साथ बैठक में अगले मुख्यमंत्री के तौर पर शशिकला के नाम का प्रस्ताव खुद ही किया और सबने इस पर अपनी सहमति जता दी.

इसके जवाब में शशिकला ने विधायकों को संबोधित करते हुए कहा कि पन्नीरसेल्वम ने उनसे सरकार का नेतृत्व करने की अपील की है लिहाजा वे इस जिम्मेदारी को संभालेंगी.

लेकिन बात शायद उतनी सीधी नहीं है. जयललिता के निधन के बाद से ही पन्नीरसेल्वम और शशिकला के बीच रिश्ते गड़बड़ चल रहे थे. पिछले दिनों एक कार्यक्रम में शशिकला को जब मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने अभिवादन किया तो शशिकला ने उसका जवाब तक देने की जहमत नहीं उठाई. तभी से ये माना जाने लगा था कि दोनों के बीच का रिश्ता जल्द ही कुछ नया रंग दिखाएगा.

शशिकला और महत्वाकांक्षा

शशिकला के पति एम नटराजन हैं. दरअसल पहली बार नजराजन ने ही शशिकला की मुलाक़ात जयललिता से करवाई थी. उस वक्त वो पार्टी की प्रचार शाखा की सचिव थीं और एमजी रामचंद्रन राज्य के मुख्यमंत्री थे. तमिलनाडु में नटराजन की छवि हरफनमौला की है. नटराजन जो कि सरकार में पीआरओ थे उन्होंने आईएएस अधिकारी चंद्रलेखा की मदद से शशिकला को जयललिता से मिलवाया.

नटराजन काफी मंझे हुए व्यक्ति थे. उन्होंने जयललिता की मुलाकात दिल्ली के नेताओं से करवाई. जब एमजीआर (एमजी रामचंद्रन) की मौत हुई तब जयललिता पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए जूझ रही थीं. बाद में जयललिता और नटराजन के रिश्ते भी खराब हो गए. हालांकि जयललिता की मृत्यु के बाद वे शशिकला और उनके परिवार के साथ नजर आए.

शशिकला के रास्ते में एक अड़चन यह भी है कि वो भी जयललिता की तरह ही आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में अभियुक्त हैं. इस मामले में कोर्ट का फ़ैसला आना अभी बाक़ी है. अगर फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ आया तो क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी.

थेवर समुदाय से ताल्लुक रखने वाली शशिकला अपने पति के सहयोग से जल्द ही जयललिता के करीब पहुंच गईं. स्वभाव से बेहद महत्वाकांक्षी शशिकला को जयललिता ने बेहद करीब होते हुए भी हमेशा सत्ता से दूर ही रखा. लेकिन अब जब जयललिता नहीं हैं तब शशिकला ने तमिलनाडु की सत्ता के शिखर की ओर कदम बढ़ा दिया है.

शशिकला पर हमेशा जयललिता के पीठ पीछे राजनीति करने के आरोप लगते रहे. कहते हैं कि एमजीआर की मौत के बाद जब जयललिता को पार्टी से दूर कर दिया गया था. इस कठिन घड़ी में शशिकला उनके पास आईं और फिर सबसे करीबी होती चली गईं.

जयललिता ने सियासत में एन नटराजन की सक्रियता को देखते हुए उन्हें खुद से दूर कर दिया. लेकिन अब जबकि जयललिता इस दुनिया में नहीं हैं तब शशिकला के तेज-तर्रार पति फिर सक्रिय हो गए हैं. कहा जा रहा है कि सशिकला के परिवार के करीब डेढ़ दर्जन लोग सत्ता की इस बंदरबांट में शामिल हैं.

शशिकला की कहानी में सस्पेंस, थ्रिलर, ड्रामा, साजिश सबकुछ है. जयललिता इन्हीं कहानियों में उलझी रहीं, शायद इसीलिए अपने जीते जी उन्होंने सबसे करीबी होने के बावजूद कभी अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया. अब एक रक्तहीन तख्तापलट कर शशिकला उस मुकाम पर पहुंच गई हैं जहां वो जयललिता के होते हुए सोत भी नहीं सकती थीं.

First published: 6 February 2017, 8:53 IST
 
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