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उत्तराखंड: कांग्रेस के सामने सत्ता और भाजपा के सामने ज़मीन बचाने की चुनौती

राजीव खन्ना | Updated on: 15 February 2017, 8:26 IST
कैच न्यूज़

पिछले एक साल से ज्यादा समय से राजनीतिक अशांति और असमंजस के दौर से गुजर रहे पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए जोर-शोर से कैंपेन हुआ, जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है. बुधवार को राज्य के 76 लाख से ज़्यादा मतदाता 10854 चुनाव केंद्रों पर अपना वोट देंगे.

70 सीटों के लिए 637 उम्मीदवार 34 पार्टियों से खड़े हुए हैं. इनमें स्वतंत्र उम्मीदवार भी हैं. ये 6 राष्ट्रीय पार्टियां, चार राज्य स्तरीय पार्टियां, और 24 गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों से हैं. 261 स्वतंत्र उम्मीदवार हैं. मतदाताओं का रुझान अब तक स्पष्ट नहीं है इसलिए किसका पलड़ा भारी रहेगा, कहना मुश्किल है.

कारण सीधा है. हरीश रावत की कांग्रेस सरकार का तख्ता पलट करने की असफल कोशिश के लिए पिछले साल कुछ कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे, और बाद में भाजपा ने उन्हें चुनावों में भी खड़ा किया था. बदले में कांग्रेस ने भाजपा के कुछ नेताओं को तोड़ लिया.

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष यश पाल आर्य और विपक्ष के पूर्व नेता हरक सिंह रावत जैसे सशक्त नेता, जो पिछले साल तक कांग्रेस का चेहरा थे, अब भाजपा में हैं. जबकि मतदाता उन्हें अब भी कांग्रेसी समझते हैं. यही बात भाजपा के कई नेताओं के लिए सच है. दल-बदलू की इस स्थिति से दोनों पार्टियों के भीतर विद्रोह की स्थिति तो है ही, साथ ही असमंजस भी बना हुआ है.

भाजपा: मोदी की आक्रामकता भारी पड़ेगी

भाजपा ने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के मॉडल के नाम पर कैंपेनिंग की है. पार्टी उम्मीदवार और उनके स्थानीय एजेंडे को महत्व नहीं दिया गया. बल्कि भाजपा ने अपने केंद्रीय मंत्रियों की रैलियों से राज्य को गुंजा दिया. वे ‘वन रैंक वन पैंशन’ , नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राइक्स और नोटबंदी के फायदे गिना रहे थे. लोगों की धारणा है कि भाजपा ने भ्रष्टाचार और अन्य बुराइयों का हवाला देते हुए हरीश रावत और कांग्रेस की खलनायक वाली तस्वीर बनाई. भाजपा का कहना है कि उनकी वजह से राज्य का नुकसान हुआ.

विडंबना है कि भाजपा ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाने में अति ही कर दी. उन्होंने 2012 की केदारनाथ की प्राकृतिक आपदा के लिए भी उसे भ्रष्ट ठहराया. बिना विचारे कि उस समय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा थे, जो फिलहाल भाजपा का अभिन्न हिस्सा हैं.

ऐसा कम ही हुआ कि भाजपा ने कभी मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का नाम नहीं बताया हो. इससे वह कई अन्य राज्यों में आमतौर पर कांग्रेस को पटकनी देती रही है. इस बार वह इसमें विफल रही. नतीजतन प्रकाश पंत, त्रिवेंद्र रावत और अजय भट्ट जैसे भाजपा के मूल सशक्त नेता और हरक सिंह रावत और विजय बहुगुणा जैसे कांग्रेस से शामिल हुए नेता, सभी मुख्यमंत्री के लिए सशक्त दावेदार नजर आ रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि इस वजह से भाजपा के कई शीर्ष नेता एक दूसरे को कमतर समझ रहे हैं. इससे पार्टी मुसीबत में आ सकती है.

एक और मुद्दा, जो गुपचुप भाजपा के लिए उलटा पड़ रहा है, वह है मोदी और अमित शाह का अपने विपक्ष के लिए भाषणों में आक्रामकता और कभी-कभी अपमानजनक स्वर और ऊंची आवाज. इसने पहाड़ी लोगों के कुछ वर्गों को खासतौर से नाराज किया है. अलमोड़ा जिले में लामगढ़ रहने वाली आशा रौतेला ने कहा, ‘हम शिष्टाचार की संस्कृति के लिए जाने जाते हैं. योगी आदित्यनाथ जैसे अन्य लोगों की भाषा पहाड़ी समाज में स्वीकार्य नहीं है. आलोचना अपशब्द की हद तक नहीं होनी चाहिए.’

कांग्रेस: सत्ता-विरोधी लहर

दूसरी ओर कांग्रेस की जिम्मेदारी हरीश रावत पर है. कई शीर्ष नेताओं के भाजपा में चले जाने से राज्य को दूसरी बार जिताने की जिम्मेदारी उन पर छोड़ी गई. और उन्होंने ना तो हाई कमान को निराश किया और ना ही अपने समर्थकों को. अपनी कुशल रणनीति को अपनाते हुए उन्होंने उधम सिंह नगर जिले में हरिद्वार (ग्रामीण) और किच्छा निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा होना तय किया.

कांग्रेस को मैदानी और तराई इलाके के इन दो जिलों में वापसी की उम्मीद है, जिसमें कुल 70 में से 20 सीटें हैं. उसे ज्यादातर सीटें कुमाऊं में जीतने की आशा है, जो रावत का गृह क्षेत्र है. ताकि वह गढ़वाल पहाडिय़ों में मोदी को बेअसर कर सके.

हरीश रावत खुद को भाजपा की तख्ता पलट की योजना का शिकार भी सफलता से बता रहे थे. किच्छा में रावत के कैंपेन प्रभारी तस्सवुर अली खान कहते हैं, ‘पहले तो आप हमारे विधायकों को गलत तरीके से हासिल करते हैं, फिर राष्ट्रपति शासन लागू करते हैं, हाउस में हमारी सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश करते हैं और विफल रहने के बाद हमें सीबीआई जांच की धमकी देते हैं. क्या आप सोचते हैं कि जनता अंधी या बेवकूफ है?’ हरीश ने भी केदारनाथ आपदा के बाद हुए पुनरुत्थान के कार्य को भुनाने की कोशिश की. कांग्रेस, हरीश रावत के अधीन पांच साल चलने वाली एक स्थाई सरकार देने के नारे पर चुनाव लड़ रही है.

पर जो रावत के विपरीत रहेगा, वह है सत्ता-विरोधी लहर. पिछले 30 महीनों में वादे पूरे नहीं करने के कारण लोग उनसे नाराज हैं. कई सीटों से भी उन्हें विरोध का सामना करना पड़ रहा है. भाजपा गढ़वाल में काफी हद तक गढ़वाल-कुमाऊं के विभाजन में सफल रही है.

बसपा: हाथी उत्तराखंड की पहाड़ियों पर कब चढ़ेगा?

बसपा मैदानों और तराई की कुछ सीटों पर दुर्जेय रही है. इन सीटों में काफी संख्या में मुसलमान और दलित मतदाता हैं. जो सवाल एक बार फिर अनुत्तरित रह सकता है, वह यह कि, ‘उनका हाथी उत्तराखंड की पहाडिय़ों पर कब चढ़ेगा?’

हर विधानसभा चुनाव के साथ पार्टी की सीटें कम होती जा रही हैं. पिछले चुनावों में 3 सीटें जीती थीं. वह स्थिति सुधारने की कोशिश कर रही हैं. लोगों को याद है कि बसपा सुप्रीमो ने उत्तराखंड के तीन जिले बनाए थे, जब वह उत्तरप्रदेश का हिस्सा था-रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और उधम सिंह नगर.

अन्य क्षेत्रीय दल: अस्तित्व की लड़ाई

राज्य की सबसे पुरानी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल खुद को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रही है. इसने 59 उम्मीदवार खड़े किए हैं और इच्छित परिणाम के लिए उनके पास द्वाराहाट से पुष्पेश त्रिपाठी हैं. पिछले विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर जो नई क्षेत्रीय पार्टी अस्तित्व में आई, वह है उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी. यह भी अपना खाता खोलने की पूरी कोशिश कर रही है. ये दोनों पार्टियां महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दों को उठा रही हैं. उनका आरोप है कि दोनों मुख्य पार्टियां राज्य-निर्माण के मकसद में विफल रही हैं.

वामपंथी: अवाम की आवाज

पहली बार तीन वामपंथी दल-सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई (एमएल) अपने अस्तित्व के लिए 12 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने भाजपा और कांग्रेस का विरोध करने के लिए जनता के मुद्दे उठाएं हैं. सीपीएम राज्य सचिव राजेंद्र सिंह नेगी ने कहा, ‘हमारा मकसद लोगों को बताना है कि हम किसलिए हैं और किस तरह की जन-केंद्रित राजनीति हम करते हैं. राज्य विधानसभा में हमारी मौजूदगी अवाम की आवाज को मजबूत ही करेगी.’ सीपीआई (एमएल) उम्मीदवार इंद्रेश मईखुरी कर्णप्रयाग के निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं के बीच जगह बनाने में काफी सफल हुए हैं.

विकास के मुद्दे

लोगों के जेहन में विकास का मुद्दा मुख्य है. लोग ऐसी सरकार चाहते हैं, जो ये सब कर सके-सडक़ से सही जुड़ाव, बच्चों के लिए सही शिक्षा, पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल और इन सबसे ऊपर साफ-सुथरा प्रशासन. जब से राज्य बना तब से ही ये सब चीजें टाल दी गईं. पहाड़ों की डिस्पेंसरियां और अस्पतालों में चिकित्सक नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं.

पिथौरागढ़ में नाचनी जैसी कई जगहों पर गांव वालों को संकट के समय सडक़ तक कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. संवाददाता ने हाल ही में देखा कि जो खैरना-अल्मोड़ा सडक़ 2010 की प्राकृतिक आपदा में टूट गई थी, अब भी पूरी नहीं बनी है.

ऐसे कई उदाहरण हैं. पहाड़ों में अब भी मनीआर्डर की अर्थव्यवस्था होने से यहां नोटबंदी मुद्दा नहीं है, पर नोटबंदी के बाद मैदानों में काम छूट जाने से कई युवा घर जरूर लौट आए हैं. उधम सिंह नगर के गांवों में, जो एशिया का सबसे बड़ा मटर उत्पादक है, किसान इस साल अपनी फसल की कटाई नहीं कर सके क्योंकि कीमतें काफी गिर गई थीं.

गांव वाले जंगली जानवरों से भी परेशान हैं, जो उनकी फसल खराब जाते हैं. कई बार लोगों को कहते सुना गया, ‘हम तब ज्यादा अच्छे थे जब उत्तरप्रदेश का हिस्सा थे. अधिकारी हमारी बात सुनते थे, यह सोचते हुए कि हम दूर पहाड़ों से आए हैं. यहां हमारे खुद के लोग हमसे बुरा व्यवहार करते हैं. ’ और वे पूरी तरह गलत नहीं हैं. देखना यह है कि बुधवार को अपने मताधिकार का उपयोग करते समय ये सब बातें उनके जेहन में कितनी रहती हैं.

First published: 15 February 2017, 8:26 IST
 
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