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उत्तराखंड: वामपंथियों की बढ़त से अलमोड़ा में खराब हुआ कांग्रेस का खेल

राजीव खन्ना | Updated on: 15 February 2017, 8:24 IST
कैच न्यूज़

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अलमोड़ा में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक असमंजस के हालात बन गए हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में दल बदल के अलावा और भी बहुत से मुद्दे हैं जो फिलहाल उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की कसौटी बने हुए हैं.

इस सीट से कांग्रेस के मौजूदा विधायक मनोज तिवारी जीत की तिकड़ी बनाने की आस लगाए बैठे हैं लेकिन हालात उनके पक्ष में नहीं हैं. उन्हें भाजपा के रघुनाथ सिंह चौहान से कड़ी टक्कर मिलने वाली है. वाम दल इस बार पहली बार इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. वे जनता की समस्याओं को केंद्र में रख कर चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (यूपीपी) भे चुनाव मैदान में हैं. राज्य के आंदोलन में इन पार्टियों के नेताओं द्वारा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के बावजूद ये पार्टियां ज्यादा चर्चा में नहीं रहीं.

सपा और बसपा के उम्मीदवारों के अलावा अलमोड़ा में चार निर्दलीय भी चुनाव मैदान में हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या 87,675 है. इनमें 42, 526 महिलाएं शामिल हैं. एक बात तो तय है कि तिवारी के लिए यह चुनाव आसान नहीं हैं. भेदभाव से ऊपर उठ चुकी भाजपा के लिए इस बार अच्छे अवसर हैं.

जातीय समीकरण

मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबी तिवारी ब्राह्मण समुदाय के मृदुभाषी नेता माने जाते हैं. वे विकास के मुद्दे पर यह चुनाव लड़ रहे हैं. साथ ही वे अलमोड़ा में मेडिकल कॉलेज का निर्माण शुरू करने और कोसी नदी पर बैराज बनाने की मांग पर भी वोट मांग रहे हैं. वे यह भी दावा कर रहे हैं कि वे अलमोड़ा के उदय शंकर सेंटर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट को उसकी खोई हुई गरिमा फिर से दिलाने के लिए काम कर रहे हैं.

दूसरी ओर ठाकुर समुदाय के चौहान हैं. वे नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं और भ्रष्टाचार स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दे सुलझाने का वादा कर रहे हैं. भाजपा कांग्रेस के दावे को खारिज करते हुए कहती है कि मेडिकल कॉलेज और कोसी बैराज दोनों को बनाने का निर्णय मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के शासन काल में लिया गया था. उदय शंकर अकादमी का शिलान्यास एनडीए सरकार के दौरान पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा किया गया था.

छोटी पार्टियां

माकपा कार्यकर्ता दिनेश पांडे दोनों ही उम्मीदवारों से सवाल पूछ रह हैं, जैसे मेडिकल कॉलेज के लिए शिक्षक कहां से आएंगे और राज्य सरकार द्वारा दो एमओयू पर हस्ताक्षर करने के बाद भी यह प्रोजेक्ट अटका ही हुआ है. वे यह भी कहते आ रहे हैं कि कोसी बैराज से पानी की कमी की समस्या हल नहीं हो सकता क्योंकि कोसी नदी का ग्लेशियर से नहीं निकलती, यह प्राकृतिक जल स्रोतों से निकलने वाली नदी है.

वे कहते हैं ‘‘एक के बाद एक सरकार सरयू पम्पिंग स्कीम को लागू करने में विफल क्यों रही. पांडे गांवों का दौरा कर रहे हैं और वे एक मुद्दा यह उठा रहे हैं कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले काम जैसे चारा लाना, ईंधन इकठ्ठा करना, खेतों में काम करना और पशु चराना मनरेगा के अन्तर्गत लाया जाएगा.

अलमोड़ा में सीपीएम की अहमियत इसलिए है क्योंकि अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महासचिव पी.सी. जोशी अलमोड़ा के ही निवासी थे. प्रसिद्ध नाटककार, थियेटर डायरेक्टर व संगीतकार मोहन उप्रेती भी अलमोड़ा निवासी थे, जिन पर जोशी का गहरा प्रभाव था. उनकी लोकप्रिय बंदिश ‘‘बेड़ू पाको बारह मासा’’ आज भी देश भर में बजाया जाता है.

स्थानीय जनता का कहना है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान कम्युनिस्ट नेताओं को पकड़े जाने के बाद यहां वाम आंदोलन को पीछे हटना पड़ा था और तुरंत ही आरएसएस ने उसकी जगह ले ली थी. पांडे कहते हैं सीपीएम यहां 1990 में सक्रिय हुई. अलमोड़ा विधानसभा क्षेत्र आधारभूत विकास की अत्यधिक जरूरत है. यहां समुचित सड़कें और सीवेज व्यवस्था नहीं है. गामीण क्षेत्रों में बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनका निराकरण किया जाना बाकी है. जंगली सुअरों और बंदरों से ग्रामीण त्रस्त हैं. पेयजल की कमी, सड़कों की समस्या, स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं का अभाव और बेरोजगारी की समस्या आम है.

यहां के ग्रामीण युवक ज्यादातर सेना में नौकरी करते हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में नौकरी कर रहे युवा नोटबंदी के बाद बेरोगार हो गए और गांव लौट आए. भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियां ग्रामीण इलाकों में इसी मुद्दे पर राजनीति कर रही हैं. ग्रामीण इलाकों में इन दोनों पार्टियों से लोगों का मोह भंग हो चुका है और दर्जनों ग्रामीणों ने चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा की है.

ग्रामीणों की एक शिकायत यह भी है कि उन्हें मनरेगा के तहत रोजगार नहीं मिल रहा.

ग्रामीणों की एक शिकायत यह भी है कि उन्हें मनरेगा के तहत रोजगार नहीं मिल रहा. उनका कहना है कि संभागीय स्तर
पर किसी अधिकारी की नियुक्ति नहीं किए जाने से इस योजना का क्रियान्वयन फीका पड़ गया है.

एक और मुद्दा यहां की ताम्ता जाति को लेकर है, जो अनुसूचित जाति की श्रेणी में आती है. इस जाति का आरोप है कि पूर्ववर्ती सरकारें केवल खोखले दावे करती रहीं कि तांबे के बर्तन बनाने वाले शहर अलमोड़ा को ‘कॉपर सिटी’ बनाया जाएगा लेकिन इस दिशा में कुछ खास नहीं किया गया. मैदानों में बनने वाले मशीनी बर्तनों से यहां के लोगों के लिए रोजगार संकट हो सकता है लेकिन इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किए गए.

यूकेडी और यूपीपी के अनुसार एक के बाद एक बनने वाली राज्य सरकारों ने पहाड़ी अर्थव्यवस्था और कृषि संबंधी समस्याएं सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया है. वे कहते हैं मुख्य राजनीतिक दलों ने जनता की अपेक्षाओं को नजरंदाज करते हुए पहाड़ी इलाकों को लूटा है.

First published: 15 February 2017, 8:24 IST
 
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