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क्या धर्मशाला हिमाचल की दूसरी राजधानी चुनावी पैंतरा है?

राजीव खन्ना | Updated on: 22 January 2017, 8:53 IST
(फ़ाइल फोटो )

हिमाचल प्रदेश में इसी साल चुनाव होने हैं. वीरभद्र सिंह सरकार ने लगता है चुनावी राजनीति की शुरूआत कर दी है. सरकार ने धर्मशाला को राज्य की दूसरी राजधानी घोषित कर दिया है. प्रदेश की राजधानी शिमला से 250 किलोमीटर दूर कांगड़ा जिले का यह प्रशासनिक केंद्र सर्दियों में विधानसभा सत्रों का आयोजन करता रहा है. अब यहां एक सचिवालय परिसर भी बना दिया गया है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनावों में हिमाचल के निचले क्षेत्र में जो जीत हासिल की थी; वह उसे बरकरार रखना चाहती है और इसी के मद्देनजर यह राजनीतिक दांव खेला गया है. इस क्षेत्र में कांगड़ा, उना, हमीरपुर और बिलासपुर के साथ ही मंडी और चंबा जिले शामिल हैं.

शहर का महत्व

धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी घोषित करते वक्त मुख्यमंत्री वीरभद्र ने धर्मशाला के ऐतिहासिक और वर्तमान महत्व के बारे में बात की. दुनिया भर से पर्यटक यहां घूमने आते हैं. धर्मशाला दलाईलामा की सीट है और यहां निर्वासित तिब्बत सरकार अस्तित्व में है. 

उन्होंने कहा, धर्मशाला के राजधानी बन जाने से यहां के लोगों को काफी फायदा होगा. अब यहां की जनता को अपने काम करवाने के लिए शिमला तक नहीं जाना पड़ेगा.

ऊपरी-निचली राजनीति

पारम्परिक रूप से कांग्रेस ऊपरी हिमाचल प्रदेश में मजबूत स्थिति में है तो भाजपा निचले हिमाचल प्रदेश में तेजी से उभर रही है. प्रदेश के कांग्रेस मुख्यमंत्री यशवंत परमार, ठाकुर रामलाल और वीरभद्र हिमाचल के ऊपरी जिलों सिरमौर और शिमला से, जबकि भाजपा के मुख्यमंत्री शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल कांगड़ा और हमीरपुर जिलों से हैं.

अकेले कांगड़ा में ही 15 विधानसभा सीटें हैं जबकि हिमाचल प्रदेश विधानसभा में कुल 68 सीटें हैं, जबकि पास ही के चंबा, उना, हमीरपुर से पांच-पांच  विधायक विधानसभा में हैं. 2007 के चुनावों में निचले हिमाचल में कांग्रेस ने 36 सीटों पर जीत हासिल कर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई. इन चुनावों में भाजपा को केवल 26 सीटें ही मिली थीं जबकि बाकी सीटें निर्दलीयों ने जीती थी.

वीरभद्र की दूरदर्शिता

धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी बना कर वीरभद्र ने दूरदर्शितापूर्ण चुनावी रणनीति का परिचय दिया है. 1994 में वीरभद्र सर्दियों में धर्मशाला ठहर कर जनता के साथ सम्पर्क करते और विकास कार्यों का जायजा लेते. तभी से वीरभद्र अपने हर कार्यकाल में शिमला से सत्ता का केंद्र हटाना चाह रहे थे.

पहले उन्होंने स्कूल शिक्षा बोर्ड को धर्मशाला शिफ्ट कर दिया. उसके बाद पी.डब्लू.डी, सिंचाई और पी.एच.ई.डी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को भी इसी इलाके में प्रतिनियुक्ति पर तैनात कर दिया गया है. टांडा में एक अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाने के लिए फंड दिया गया. उना में एक आईआईटी संस्थान खोला गया और चंबा व हमीरपुर में मेडिकल  कॉलेज खोले जाने की योजना है. नागरोटा बागवान में राजीव गांधी इंजीनियरिंग कॉलेज और फार्मेसी कॉलेज खोले जा चुके हैं.

इसके बाद 2005 में वीरभद्र ने राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र धर्मशाला में ही आयोजित करने शुरू कर दिए. इसके लिए तपोवन में एक विधानसभा भवन बनाया गया और 2006 में वीरभद्र ने स्वयं इसका शिलान्यास किया था. यह ऐसा राजनीतिक कदम है, जिसका भाजपा भी विरोध नहीं कर सकी. हालांकि 2007 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस हार गई थी लेकिन धूमल की भाजपा सरकार ने भी इस परम्परा का निर्वाह किया.

मंझा हुआ राजनीतिक दांव

अब इस घोषणा से वीरभद्र ने अपने विरोधियों को निरुत्तर कर दिया है. कांग्रेस के मंत्री, विधायक, बोर्डों और निगमों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष सभी ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है. वे कह रहे हैं कि धर्मशाला केवल जिला मुख्यालय ही नहीं है बल्कि यह आस-पास के जिलों के लोगों के लिए भी केंद्रीय स्थल है.

भाजपा प्रवक्ता गणेश दत्त ने कहा, 1998 में धर्मशाला में मुख्यमंत्री जन सुनवाई कार्यक्रम हमारी सरकार की पहल थी. चुनावी वर्ष में ऐसे निर्णय करके कांग्रेस क्षेत्रीय कार्ड खेलकर राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है.

First published: 22 January 2017, 8:53 IST
 
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