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पंजाब में अमरिंदर की जीत से कांग्रेस को क्या सीखने की जरूरत है?

राजीव खन्ना | Updated on: 16 March 2017, 7:02 IST

अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने पंजाब में जो जीत हासिल की है, उसमें कांग्रेस को सीखने के लिए बहुत सारे सबक हैं अगर देश की यह सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर रखते आगे आने वाले राज्यों के विधानसभा के चुनावों में अपने को फिर से खड़ा करना चाहती है. कांग्रेस जितना जल्दी यह सबक याद कर ले उसके लिए उतना अच्छा होगा.

पंजाब के चुनावों का सबसे बड़ा सबक यह है कि कांग्रेस को मजबूत क्षेत्रीय नेताओं की पहचान कर चुनावों की कमान उनके हाथ सौंप देना चाहिए. पंजाब में ठीक इसी रणनीति के कारण कांग्रेस को ऐसे समय में भी सफलता मिल सकी है जबकि पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद पूरी तरह से लड़खड़ा चुकी थी और राज्य में नौसिखुआ आम आदमी पार्टी पिछले लोकसभा चुनावों में 4 सीटें जीतने के बाद अपना जनाधार फैला रही थी.

ऐसे समय में अमरिंद सिंह ने सबसे पहले राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में 2015 के उत्तरार्ध में अपनी वापसी सुनिश्चित की और फिर सबको साथ लेकर पार्टी के लिए एक रणनीति बनाने का का आरंभ किया. इस बीच में पार्टी हाईकमान के लिए उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट था. वह कम से कम हस्तक्षेप और पंजाब के मामलों के प्रबंधन में पूरी तरह से फ्री हैंड चाहते थे.

पंजाब चुनाव में जीत के बाद अमरिंदर सिंह ने यह कहा भी है कि राज्यों में क्षेत्रीय दलों का मुकाबला करने के लिए यह जरूरी है कि राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को प्रोमोट किया जाए. आगे उन्होंने यह भी कहा कि एक ऐसा चेहरा प्रोजेक्ट किया जाना जरूरी है जिससे क्षेत्र में स्थानीय लोग अपने को जोड़ सकें.

ठीक यही भावना राजनीतिक विश्लेषक जगतार सिंह ने भी व्यक्त की थी. जगतार सिंह के अनुसार पंजाब मॉडल कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है. उनके अनुसार अमरिंदर को महीनों तक लॉबिइंग करने के बाद पहले राज्य का अध्यक्ष बनने में सफलता मिली और फिर प्रत्येक स्तर पर राज्य के मामलों के प्रबंधन में फ्री हैंड मिला.

इस बार राज्य में जो उम्मीदवार खड़े किए गए वे मुख्य रूप से अमरिंदर सिंह की ही पसंद थे. कांग्रेस के क्षेत्रीयकरण के अभियान के मुख्य कैंपेनर अमरिंदर सिंह ही थे और इस मॉडल को अब सफलता भी मिल गई है.

 

अपने हाल के एक लेख में जगतार सिंह ने लिखा है कि कांग्रेस को बहुसांस्कृतिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय कैडर और क्षेत्रीय एजेंडा विकसित करना होगा. हाईकमान संस्कृति को तो विदा करना ही होगा. प्रत्येक स्तर पर पुनगर्ठन के बाद क्षेत्रीय इकाइयों को स्वायत्तता देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

इस मॉडल को सफल बनाने के लिए राहुल गांधी को भी अपनी कार्यशैली बदलनी होगी. क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कांग्रेस को प्रत्येक राज्य में क्षेत्रीयकरण को अपनाते हुए पुरानी कार्यशैली बदलनी होगी जिसमें दिल्ली में गांधी परिवार को घेर कर बैठी चौकड़ी ही शर्तें तय करती रही है.

एक और मुद्दा जिस पर कांग्रेस को तुरंत सोचना होगा वह यह कि राज्य के नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नियुक्त राज्य प्रभारियों के बीच बेहद सहयोगी संबंध होना चाहिए और प्रभारियों को राज्य में प्रभावशाली अभियान चलाने की दिशा में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाना होगा. साथ ही केंद्रीय नेतृत्व को राज्य प्रभारियों को नियुक्त करते समय सावधानीपूर्वक क्षेत्रीय संवेदनाओं को भी मद्देनजर रखना होगा.

कांग्रेस ने कमल नाथ को पंजाब का क्षेत्रीय प्रभारी नियुक्त कर अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी लेकिन बाद में इसे सुधारा गया जब कमल नाथ ने इस पद से इस्तीफा दे दिया और आशा कुमारी को राज्य प्रभारी बनाया गया. नाथ को राज्य प्रभारी बनाते ही 1984 के सिख विरोधी दंगों के भूत ने एक बार फिर सिर उठाना शुरू कर दिया था और विपक्षी दल इस मौके का इस्तेमाल अमरिंदर और पार्टी को रक्षात्मक मुद्रा में लाने के लिए कर रहे थे.

पंजाब से तीसरा सबक कांग्रेस को यह सीखना होगा कि यह समय आक्रामक राजनीति का है

पंजाब से तीसरा सबक कांग्रेस को यह सीखना होगा कि यह समय आक्रामक राजनीति का है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर नरम रुख जनता को रास नहीं आता. अमित शाह और नरेंद्र मोदी ब्रांड की राजनीति का सामना करने के लिए कांग्रेस के लिए यह जरूरी होगा कि उसके नेता राजनीतिक मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाएं और मुखर रहें, जैसा कि अमरिंदर सिंह ने पंजाब में करके दिखाया है.

अमरिंदर सिंह ने पंजाब चुनाव के दौरान मोदी-शाह के साथ-साथ राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और मनोहर पार्रिकर पर सीधे हमला बोला. अमरिंद सिंह ने ही लाइन ऑफ कंट्रोल के आर-पार अंजाम दी गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के माहौल में पंजाब की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे गांवों से लोगों को हटाने के झूठ का पर्दाफाश किया जिसके कारण युद्धोन्माद को फैलाया जा रहा था.

साथ ही अमरिंदर ने जेटली और मोदी को डिमोनेटाइजेशन के मुद्दे पर भी इस हद तक आड़े हाथों लिया कि उन्होंने जेटली को अमृतसर लोकसभा सीट से एक बार फिर उप—चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली जिससे मोदी सरकार द्वारा उठाए गए डिमोनेटाइजेशन जैसे कदम पर जनमतसंग्रह हो सके. साथ ही उन्होंने पंजाब के पानी को साझा करने के मुद्दे पर विधायकी से इस्तीफा देकर पार्टी के विधायकों के सामने एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया.

कैप्टन एक्स फैक्टर

जानकारों का यह भी कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व को मुद्दों पर एक स्पष्ट रुख अपनाना होगा और मध्यम मार्ग अपनाना छोड़ना होगा. दूसरे राज्यों, विशेषकर वे राज्य जहां आने वाले दिनों में चुनाव होने जा रहे हैं वहां कांग्रेस को हिंदुत्व पर नरम रुख अपनाने के बजाय बिल्कुल स्पष्ट तौर पर धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में सामने आना होगा. हिंदुत्व पर नरम और सख्त रुख जैसा कुछ नहीं होता. या तो धर्मनिरपेक्ष होते हैं या सांप्रदायिक.

अमरिंदर सिंह ने सहजधारी सिखों के समर्थन में आने की हिम्मत ऐसे समय में भी दिखाई जबकि उनकी पार्टी और विपक्षी दलों ने सरकार को सिख गुरुद्वारा संशोधन बिल चुपचाप पारित करने दिया जिसमें उनके शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव में मतदान करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

एक बार जब अमरिंदर खुलकर सहजधारी सिखों के समर्थन में आ गए तो सहजधारी सिख पार्टी ने कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी. पंजाब में लगभग 70 लाख सहजधारी सिख हैं जो बहुत गहराई से यह महसूस करते हैं कि उनसे उनके अधिकार छीन लिए गए हैं.

इसके अलावा कांग्रेस ने पंजाब चुनाव में कुछ नए तरीके भी आजमाए हैं जिसका उसे काफी फायदा मिला है. इसमें सबसे पहला था कि एक पार्टी से एक ही आदमी को टिकट दिया जाएगा और अमरिंदर ने इसकी शुरुआत अपने घर से ही की. अमरिंदर सिंह के घर से उनके अलावा किसी और को टिकट नहीं दिया गया. दूसरा मापदंड रखा गया कि उम्मीदवार को टिकट देने का पैमाना उसकी जीतने की संभावना हो न कि उसकी वफादारी अथवा जान पहचान.

तीसरा चुनाव से काफी पहले ही असहमत लोगों और विरोधी आवाजों से निपट लिया गया. इसमें एक तरीका था कि जिन लोगों को खुद टिकट नहीं मिल सका उनको बोर्ड और कॉरपोरेशन्स आदि में जगह दी जाए.

सबसे अंत में, पर यह सबसे कम जरूरी कतई नहीं है, कि अमरिंदर सिंह ने रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सहायता से कॉरपोरेट ब्रांडिंग शैली में अपना चुनाव अभियान चलाया. यह वही शैली जिसकी शुरुआत खुद मोदी ने अपने गुजरात के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल के दौरान की थी. और सबसे अंत में, कांग्रेस को यह समझना होगा कि चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से चुनाव के मैदान में राह आसान होती है.

First published: 16 March 2017, 7:02 IST
 
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