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गुजरातः शराबबंदी पर सख़्त कानून, रूपानी का राजनीतिक दांव

राजीव खन्ना | Updated on: 18 December 2016, 8:22 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • राज्य सरकार ने कहा है कि शराब की खरीद-फरोख्त करते या इधर से उधर ले जाते पाए जाने पर दोषी को 10 साल की जेल होगी और 5 लाख रूपए का जुर्माना भरना होगा. 
  • अब तक केवल तीन साल की ही सजा का प्रावधान था लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी के नियम सख़्त करने से भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा और कुछ नहीं. 

गुजरात में शराबबंदी हमेशा से ही विवादास्पद मुद्दा रहा है. जब से यहां यह कानून लागू हुआ है, राज्य में कानून का व्यापक तौर पर उल्लंघन हुआ और शराब की वजह से हादसे बढ़े. इस बीच, हाल ही इस कानून को सख्त करने के लिए उठाया गया कदम पूरी तरह राजनीतिक है. साथ ही यह भी माना जा सकता है कि शराबबंदी की सरकार की नीति के वांछित परिणाम नहीं मिले. 

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक विजय रूपानी नीत भाजपा सरकार द्वारा राज्य में हुक्का बार बंद करने और शराबबंदी कानून को सख्त बनाने से भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा और कुछ नहीं. गुरूवार को राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर कहा कि शराब की खरीद-फरोख्त करते या इधर से उधर ले जाते पाए जाने पर दोषी को 10 साल की जेल होगी और 5 लाख रूपए का जुर्माना भरना होगा. अब तक केवल तीन साल की ही सजा का प्रावधान था.

इसी इसी प्रकार लिकर वैन चलाने वालों को भी 10 साल की जेल होगी और 1 लाख रूप्ए जुर्माना भरना होगा. शराब पीकर उत्पात मचाने और गाली गलौज करने पर एक से तीन साल की जेल हो सकती है, जो कि मौजूदा कानून में 1 से 3 माह की जेल की बात कही गई है. इसी प्रकार शराब तस्करी में लिप्त पुलिस अधिकारियों को भी 7 साल की जेल की सजा और एक लाख रूपए का जुर्माना भरना होगा.

चुनावी पैंतरा

अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने को हैं और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रूपानी के इस कदम के पीछे का मकसद भी चुनावी ही है. भाजपा पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मुकाबला कर रही है. नीतीश ने जब से राज्य में शराब बंदी लागू की है, सुर्खियों में बने हुए हैं. नीतीश भी राजनीतिक लाभ के लिए ही यह सब कर रहे हैं, उनकी नजर 2019  के लोकसभा चुनाव पर है और इधर भाजपा नहीं चाहती कि नीतीश ही सारी सुर्खियां बटोर ले जाएं.

हालांकि गुजरात में अंदरूनी हालात ने ही रूपानी को यह कदम उठाने पर मजबूर किया है. गौरतलब है 7 नवम्बर को ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने गांधी नगर में एक बड़ी रैली निकाल कर बिहार की ही तरह शराबबंदी पर सख्त कानून लाने की मांग की थी. यह अध्यादेश इसके बाद ही आया है. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने कथित तौर पर रैली का समर्थन किया. इससे सरकार सकते में आ गई.

ठाकोर पिछले छह माह से प्रदेश भर में शराब विरोधी अभियान चला रहे हैं. उन्होंने कहा, उनके समुदाय के युवा बड़े पैमाने पर शराब का उपभोग कर रहे हैं और अपराधों में लिप्त हैं.

ठाकोर के इस अभियान को ओबीसी के अलावा अनुसूचित जाति जनजाति का भी समर्थन मिला. यह गुटबंदी भाजपा के लिए महंगी पड़ सकती थी, क्योंकि राज्य की आधी आबादी ओबीसी है. साथ ही शराब विरोधी अभियान को महिलाओं का समर्थन मिलना तो लाजमी है. 

बंदी के बावजूद उपलब्ध है शराब

अहमदाबाद में एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया ‘सरकार के इस फैसले की एक वजह सामाजिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं. गुजराती समाज में शराब के सेवन पर जाति व वर्गों में अलग-अलग मत हैं. उच्च वर्ग के लिए यह जहां स्टेटस सिम्बल है, वहीं निम्न वर्गों में यह प्रतिबंधित है. चोरी-चकारी जैसे ज्यादातर अपराध समाज के निचले तबका के ही लोग करते हैं. इसलिए इसी वर्ग के प्रतिनिधि का शराब के खिलाफ सख्त कानून की मांग करना अहम माना जाना लाजमी है.’

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में रहते हुए बाहर से आने वाले निवेशकों और पर्यटकों के लिए इन कानूनों को थोड़ा लचीला बना दिया जाता था. आर्थिक पक्ष सर्वोपरि रखना है तो नैतिकता से समझौता करना ही पड़ता है. राज्य ने अपने निवासियों को भी स्वास्थ्य व अन्य आधार पर इस मामले में छूट दे रखी है.

इस पत्रकार ने कहा राज्य में शराब खरीदना कोई मुश्किल काम नहीं है. उसे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो यह कहे कि उसे शराब चाहिए थी और मिली नहीं. बस हाथ में पैसा और ब्रांड की फिक्र न हो तो आसानी से कोई भी शराब खरीद सकता है. 

सूत्रों के अनुसार रूपानी के इस कदम से भ्रष्टाचार कुछ इस प्रकार बढ़ेगा जैसे ‘पहले जब कभी पुलिस ने मुझे पकड़ा, मैंने 1000 रूपए का जुर्माना भरा और निकल पड़ा.’ अब पकड़े जाने पर तय है कि वे दस-बीस गुना ज्यादा राशि वसूलेंगे. शराब की तस्करी भी रूकने वाली नहीं है.  

पिछले 30 वर्षों से क्राइम बीट देख रहे एक अन्य पत्रकार ने कहा, बस इतना सा बदलाव आएगा कि अब लोग इधर-उधर घूमते हुए या पार्कों में पीने के बजाय घरों में बैठ कर पिएंगे. बाहर से आने वाले पर्यटक ऐसे दूसरे राज्यों में चले जाएंगे जहां शराब पर पाबंदी नहीं है. 

गुजरात में मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के अलावा केंद्र शासित प्रदेश दादरा व नागर हवेली और दमन दीव से शराब आती है. पंजाब और हरियाणा से भी यहां शराब लाई जाती है. जो लोग राज्य में शराब बंदी के खिलाफ हैं, उनका तर्क है कि अगर शराब को वैध करार दे दिया जाए तो इससे मिलने वाला आबकारी कर राजकीय कोष में ही जाएगा. फिलहाल यह चोर रास्ते से राजनेताओं और अधिकारियों की जेब में जा रहा है.

यह भी जगजाहिर है कि राजनीतिक संकट की स्थिति में पार्टियां अपने समर्थक राजनेताओं को पड़ोसी रज्यों में ले जाती हैं,जहां जमकर शराबबाजी होती है और उनका जीतना आसान हो जाता है. रूपानी अपने सख्त कानूनों के साथ सामाजिक तौर पर कितने सफल होते हैं; यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन राजनीतिक तौर पर उनका दांव सही है. 

First published: 18 December 2016, 8:22 IST
 
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