Home » राज्य » Why BJP leaders and bureaucrats supporting adani energy too much
 

अडाणी पॉवर: उर्जा के खेल में भाजपा नेता और सरकारी तंत्र इतनी उर्जा क्यों लगा रहे हैं?

एन कुमार | Updated on: 11 December 2016, 8:20 IST

‘पांच दिसंबर की शाम से ही हमारा इलाका पुलिस छावनी में बदल गया था. भारी संख्या में पुलिसवालों ने वहां घेराबंदी कर दी थी. ऐसा लगा कि कोई बड़ी घटना होनेवाली है. छह दिसंबर को सुबह से बड़ी संख्या में लोग पीले रंग का कार्ड लेकर वहां पहुंचने लगे. पुलिस उसी कार्ड देखकर ही लोगों को अंदर जाने दे रही थी. मैंने जानने की कोशिश की कि यह पीला कार्ड क्या है? पुलिसवालों ने बताया कि इसी कार्ड के आधार पर अंदर जनसुनावाई में जा सकते हैं.यह कार्ड किसने बंटवाया यह बताने वाला वहां कोई नहीं था. अंदर घुसे लोगों से फटाफट पूछा गया- क्या जमीन देना चाहते हैं अडाणी को? लोगों ने हां में जवाब दिया. सभा खत्म हो गई. जिनके पास कार्ड नहीं था उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया. वे लोग बाहर नारेबाजी करने लगे. पुलिसवालों ने लाठियां बरसानी शुरू कर दी. अफरा-तफरी में सभा समाप्त हुई. पीला कार्ड किसने और क्यों जारी किया था, यह पता नहीं चल सका.’

गोड्डा के रहनेवाले प्रदीप एक सांस में सारी बात कह जाते हैं. गोड्डा झारखंड के संथाल परगना में पड़ता है. बिहार से लगता सीमाई इलाका है. यहां प्रधानमंत्री के करीबी उद्योगपति गौतम अडाणी का पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव है. इसे लेकर गोड्डा में पिछले करीब एक साल से खींचतान चल रही है. धमकी से लेकर लालच तक, सारी कोशिशें जारी हैं. यहां पॉवर प्लांट लगाने के लिए राज्य की रघुबर दास सरकार ने नियमों में भी कई बदलाव किए हैं.

प्रदीप उसी पॉवर प्लांट के लिए जमीन देने के प्रस्ताव पर आयोजित हुई जनसभा का किस्सा सुना रहे थे. छह दिसंबर को मोतिया और बक्सरा, दो जगहों पर इस तरह की जनसुनवाई हुई. दोनों जगह भारी संख्या में पुलिसवाले तैनात थे. लेकिन अगले दिन मीडिया में यह ख़बर प्रायः गायब थी. प्रदीप कहते हैं, 'जब सरकार ही अड़ गयी है और मीडिया से लेकर प्रशासन तक उसके साथ है तो पावर प्लांट तो लग ही जाएगा. लेकिन उसके बाद जो सामाजिक तनाव और अंधकार की स्थिति बननेवाली है, उसकी भरपाई अडाणी के प्रस्तावित दो पावर प्लांट से निकलने वाली 1600 मेगावाट की बिजली भी नहीं कर पाएगी.'

अडाणी ग्रुप ने यूं काम बनाया

अडाणी ग्रुप ने पावर प्लांट लगाने के लिए जिस जगह को चुना है, उस इलाके को मोतिया डुमरिया कहते हैं. इस इलाके के अधिकांश निवासी बाहर रहते हैं और खुद से खेती नहीं करते. कंपनी की सोच है कि चूंकि वे खुद से खेती नहीं करते, इसलिए यहां आसानी से जमीन मिल जाएगी. लेकिन सच्चाई यह है कि इन जमीनों पर खेती कर जीवन यापन करने वाली एक बड़ी आबादी है. एक बड़ा इलाका उसी जमीन पर आश्रित है. अगर बाहर रहने वाले अपनी जमीन दे भी देते हैं तो बंटाईदारी पर खेत जोतनेवाले क्या करेंगे. उनकी आय और रोजीरोटी का स्रोत सिर्फ खेती ही है.

प्रदीप के मुताबिक मोतिया डुमरिया में रहने वाले कुछ लोगों को अडाणी समूह ने अपने साथ मिला लिया है. तभी से स्थानीय निवासियों और बंटाईदारों के बीच तनातनी बढ़ गई है.

मोतिया डुमरिया में लगने वाले पॉवर प्लांट के पीछे एक कहानी है. जानकारी के मुताबिक पहले यह पावर प्लांट जिंदल ग्रुप को लगाना था. जिंदल ने गोड्डा के ही सुंदर पहाड़ी इलाके में जमीन का अधिग्रहण किय था. इस पॉवर प्लांट को भारत सरकार से हुए करार के मुताबिक बांग्लादेश को बिजली देने के लिए स्थापित किया जाना है. पास ही के जीतपुर कोल ब्लॉक का आवंटन जिंदल के नाम हुआ लेकिन बाद में वह टेंडर रद्द हो गया.

इस बीच झारखंड में सत्ता बदल गई. भाजपा की सरकार बनी. कोल ब्लॉक का फिर से टेंडर हुआ. इस बार जीतपुर कोल ब्लॉक अडाणी के खाते में आ गया. इसी साल 17 फरवरी को रघुवर दास की उपस्थिति में अडाणी ग्रुप के एमडी राजेश अडाणी ने राज्य के तत्कालीन उर्जा सचिव एसकेजी रहाटे के साथ मिलकर करार किया कि अडाणी ग्रुप झारखंड में 1600 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए दो पॉवर प्लांट यूनिट लगायेगा.

परसपानी पावर प्लांट

यह बिजली बांग्लादेश को दी जानी है. राज्य की उर्जा नीति के तहत उत्पादन का 25 प्रतिशत बिजली राज्य को देना जरूरी है. इसके लिए अडाणी समूह ने नया रास्ता निकाला. तय हुआ कि अडाणी समूह अपने दूसरे पावर प्लांट से तय मात्रा में बिजली झारखंड को देगा.

तय हुआ कि यह पावर प्लांट परसपानी नामक जगह पर लगेगा. कंपनी ने 2,200 एकड़ जमीन लेने की तैयारी की. झारखंड विकास मोर्चा के विधायक प्रदीप यादव ने इसका विरोध शुरू कर दिया. विधानसभा में भी हंगामा हुआ.

अडाणी समूह के एक अधिकारी प्रभाकर झा ने कहा कि यह प्रोजेक्ट गुजरात के कच्छ के मुंद्रा में लगना था लेकिन जीतपुर कोल ब्लॉक मिलने के बाद इसे झारखंड में लगाने का फैसला लिया गया ताकि कोयले की ढुलाई में ज्यादा खर्च न हो और झारखंड का विकास भी हो. कंपनी ने इलाके के लिए कई योजनाएं तैयार की हैं. जिनकी भी जमीन जाएगी, उन्हें उचित मुआवजा तो मिलेगा ही, साथ ही 40 साल से कम उम्रवालों को नौकरी भी दी जाएगी और आसपास के इलाके के विकास में मुनाफे का सुनिश्चित हिस्सा भी खर्च होगा.

झाविमो के विधायक प्रदीप यादव कहते हैं कि मेरे विरोध के कारण ही परसपानी से अडाणी की यह परियोजना हटी लेकिन अब फिर से सरकार मोतिया-डुमरिया में वही खेल कर रही है. प्रदीप यादव राज्य सरकार पर आरोप लगाते हैं कि अडाणी को फायदा पहुंचाने और उसे झारखंड में जमाने के लिए सरकार सारे नियमों की अनदेखी कर रही है. सरकार के इस कदम से राज्य के राजस्व में हर साल 2000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलने को तैयार है.

झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि सबलोग एक साल से देख रहा हैं कि कैसे कंपनी से ज्यादा सरकार के लोग अडाणी समूह को स्थापित करने में अपनी उर्जा लगाये हुए हैं. तमाम नेता विरोध की बात तो करते हैं लेकिन लेकिन एक सीमा के बाद कोई कुछ नहीं बता पाता.

मुआवज़ा 1932 के मुताबिक

गोड्डा के पत्रकार पल्लव, जो इस मुद्दे को लगातार कवर कर रहे हैं, कहते हैं कि अडाणी समूह को लेकर संथाल परगना दो हिस्से में बंट गया है. कंपनी लगातार कुछ लोगों को फायदा पहुंचाकर अपने पक्ष में काम करने के लिए खड़ा कर रही है. भाजपा और अन्य दलों के भी नेता इस काम में लगे हुए हैं. इसलिए वे ज्यादा विरोध नहीं कर रहे हैं.

पल्लव बताते हैं, 'कंपनी 1932 के खतियान के आधार पर जमीन को तीन श्रेणियों में बांटकर मुआवजा देना चाहती है. जमीन का तीन श्रेणी में बंटवारा 90 साल पहले हुआ था, जिसे उबाल, धानी और टिकर तीन नाम दिया गया था. उबाल वह हुआ, जो श्रेष्ठ जमीन है. धानी जो खेतीहर जमीन है और टिकर वह, जो टिले जैसा है, बंजर है.'

पल्लव के मुताबिक जमीनों की ये श्रेणियां 1932 में बनी थीं. बीते करीब नौ दशकों के दौरान लोगों ने अपनी जरूरत के मुताबिक इन जमीनों में बदलाव किए हैं. बंजर जमीनों को खेती योग्य बनाया गया है.

मोतिया-डुमरिया इलाके को प्लांट के लिए चुने जाने के पीछे पल्लव अडाणी समूह की सोची समझी चाल बताते हैं. अडाणी समूह रैयतों और खेती पर जीनेवाले समाज को आसानी से बांट रही है और इसी बंटवारे के आधार पर वह जमीन भी ले लेगी.

राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि यह देश का पहला नमूना होगा, जब किसी एक समूह को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार, पार्टी, मशीनरी सब इस तरह से लग गयी है. हालांकि वे अअपना नाम उजागर नहीं करना चाहते. वो बताते हैं कि गोड्डा में अडाणी के प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द अमलीजामा पहवनाने के लिए सरकार ने एक के बाद एक कई जिलाधिकारियों को बदला ताकि वो इस काम को अंजाम दे सके.

अधिकारी के मुताबिक जिस तरह से रघुवर दास सीएनटी / एसपीटी एक्ट में संशोधन की जिद पर अड़े हैं उसके पीछे भी एक बड़ी वजह अडाणी का पॉवर प्लांट ही है. कंपनी और रैयत खुद डील करेंगे, बीच से सरकार हट जाएगी और फिर अडाणी जैसे समूह के लिए रास्ते खुल जाएंगे. इसी योजना पर पूरे झारखंड में काम हो रहा है.

First published: 11 December 2016, 8:20 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी