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गुजरात: एक बार फिर मुसलमान डर कर जी रहे हैं

राजीव खन्ना | Updated on: 11 April 2017, 10:33 IST

 

जैसे—जैसे विधानसभा के चुनाव करीब आते जा रहे हैं और सांप्रदायिक माहौल गरमाता जा रहा है, गुजरात के मुस्लिमों में डर को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है. भाजपा और दूसरे संघ परिवार के संगठन जैसे बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद अपने 182 में से 150 सीटों के टॉरगेट को हासिल करने के लिए अतिसक्रिय हो चुके हैं. मुस्लिम हाल के कुछ घटनाक्रम से चिंतित हैं और एक पैटर्न साफ महसूस किया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश के चुनावों में मिली भारी जीत के बाद संघ परिवार ने पूरे गुजरात में अपनी बाजी की संख्या बढ़ा दी है.

अहमदाबाद स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार “ लोग एक बार फिर राम मंदिर के नारे सुन रहे हैं. दीवारों पर रातों—रात संदेश दिखने लगे हैं जिनमें हिंदुओं को लव जिहाद से सावधान किया जा रहा है. यह सब करने का उद्देश्य राज्य में सांप्रदायिक तापमान को बनाए रखना है, जिससे ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिल सके.”

 

दीवारों पर इस तरह के संदेश में हाल में गुजरात की कुछ प्रमुख बस्तियों में देखे गए थे. मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता पिछले कुछ दिनों में राज्य में हुई घटनाओं की एक श्रृंखला की ओर इशारा करते हैं. पाटन जिले के वडावली गांव में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा के बाद सौराष्ट्र के अमरेली जिले में सावरकुंडला कस्बे में हिंसक झड़प हुई.


सूत्रों के अनुसार पाटन जिले में दंगा जहां हिंदू—मुस्लिम छात्रों के बीच बतकही से शुरू हुआ था वहीं सावरकुंडला में यह सब तब शुरू हुआ जब कुछ हिंदू युवाओं ने एक मुस्लिम युवा पर तब निशाना साधना शुरू किया जबकि वह एक हिंदू लड़की के साथ बैठा हुआ था. इन्होंने कैच को बताया कि गांव में लोग किसी भी छोटी से तकरार या लड़ाई के सांप्रदायिक रंग लेने और इसके बाद किसी तरह की जन—धन हानि की आशंका से डरे हुए हैं.


सामाजिक कार्यकर्ता रफीक मलिक के अनुसार, हम अपने समुदाय के लोगों को यही समझा रहे हैं कि किसी ताने या उपहास से उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया नहीं दें. युवाओं को कहा जा रहा है बहुसंख्यक समुदाय के किसी उकसावे का कोई जवाब न दें ओर सिर्फ अपने तक सीमित रहें. उत्तेजना को हिंसा में बदलना का रास्ता ध्रुवीकरण कें मौके तलाश रहे लोगों को रास आता है.

हाल में हुई हिंसा की सभी घटनाएं छोटी लड़ाइयों से ही शुरू हुई थीं. छोटी सी तकरार पहले पथरावबाजी का रूप लेती है और फिर इसके बाद बड़े स्तर पर आगजनी जैसी घटनाएं देखने में आती हैं. अहमदाबाद के एक्टिविस्ट वकार के अनुसार, यही वह पैटर्न है जो कि 2002 के चुनावों के पहले देखने को मिला था जबकि मुस्लिम इसके प्रति सतर्क—सचेत नहीं थे. शुक्र है कि अब वे समझ पा रहे हैं कि यह सब अब क्या हो रहा है.


वकार हाल में मडौसा में थे ऐसे ही एक मामले की पड़ताल करने के लिए. यहां यह खबर थी कि कुछ मुस्लिमों ने लड़ाई के डर से भाग कर अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ली है. यह लड़ाई दोनों समुदायों के बीच कथित रूप से छेड़छाड़ की घटना को लेकर शुरू हुई थी. इसी तरह से वे हिम्ममतनगर की एक अन्य घटना की ओर इशारा करते हैं जिसमें रामनवमी समारोह के मौके पर एक समूह ने एक मोबाइल की दुकान में तोड़फोड़ कर दी.

 

भगवा संगठन सक्रिय

 


सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार बजरंग दल और वीएचपी जमीनी स्तर पर सक्रिय हो चुके हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे संत सम्मेलनो में उनकी भूमिका रहती है. एक कार्यकर्ता के अुनसार इस तरह के भाषणों में मुस्लिमों के प्रति द्वेष भरा रहता है. उनकी रणनीति बहुत साफ है. वे अलग—अलग जातियों और समुदायों में अनुयायी रखने वाले विभिन्न पंथों के संतों को एक ही मंच पर लाते हैं. सामाजिक और साथियों के दबाव के चलते ग्रामीण इनमें जाने से रुक नहीं पाते. यहां वे हिंदू एकता से अपनी बात शुरू करते हैं जो कि अंत में मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदायिक आक्षेप पर जाकर खत्म होता है. गांव—गांव यही पैटर्न साफ देखा जा सकता है. उन्होंने हाल में धानसुरा, देहगाम और दूसरे अन्य स्थानों पर इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए हैं.


एक और सामाजिक कार्यकर्ता दक्षिणी गुजरात के बारडोली में आयोजित एक और रैली का उदाहरण देते हैं जिसमें रामनवमी के मौके पर हिंदुवादी संगठनों ने पाकिस्तान और कश्मीर पर कविताओं की रिकॉर्डिंग को लगातार बजाया जिससे मुस्लिमों को उकसाया जा सके. याद रहे कि दक्षिण गुजरात ही कुछ वर्ष पहले वीएचपी के घर वापसी अभियान का थियेटर रहा था. एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि गौ रक्षा एक और मुद्दा है जिसको दलित और मुस्लिमों को ध्रुवीकृत करने और उनकी परस्पर अंतरनिर्भरता खत्म करने के लिए बार—बार उठाया जा रहा है.

सामुदायिक नेता और इस्लामिक रिलीफ समिति के पूर्व अध्यक्ष शकील अहमद के अनुसार, मैं यह तो नहीं कहूंगा कि लोगों में डर है, पर हां चिंता अवश्य है. क्योंकि ऐसी स्थिति में एक दिन ऐसा आ सकता है जबकि मुस्लिम अपने बचे रहने के लिए संघर्ष करें और ऐसे में मजबूर होकर प्रतिक्रिया में कुछ भी हो सकता है, जो कि अच्छा नहीं होगा.


बात सिर्फ इतनी है अब उनके हाथ में सत्ता की ताकत है और इसका इस्तेमाल वे अपना एजेंडे को आगे बढ़ाने में कर रहे हैं. मुख्य मुद्दा यह है कि इस स्थिति में हम क्या कर सकते हैं और कितना कुछ कर सकते हैं ऐसी स्थितियों का सामना करने के लिए. उनमें ऐसे धर्मनिरपेक्ष नेताओं के प्रति आलोचना का भाव है जो अवसरवाद दिखाते हुए अब हिंदुत्व संगठनों में शामिल हो रहे हैं.

हालिया ध्रुवीकरण के लिए मुख्य संदर्भ बिंदु मार्च के अंत में अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान पर आयोजित वीएचपी की रैली है, जिसमें इसके अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया ने गुजरात में सांप्रदायिक माहौल को फिर से हवा दे दी. इस आयोजन में जैसे तोगड़िया ने अपने एक दशक के अज्ञातवास से बाहर आकर मुस्लिमों के खिलाफ जमकर जहर उगला.


इस बीच आरएसएस के सहयोगी संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने हाल में एक शर्मनाक घटनाक्रम में रिलीफ रोड पर अपना कार्यालय खोला. रिपोर्ट के अनुसार अपने साइनबोर्ड पर संगठन ने भारत का जो नक्शा दिखाया उसमें से जम्मू—कश्मीर का बड़ा भाग गायब था. रिपोर्ट के अनुसार यह जम्मू—कश्मीर का उत्तरी हिस्सा था जो कि लाइन ऑफ कंट्रोल के दूसरी ओर आता है. इसके बाद उन्होंने तुरंत ही इस बोर्ड को बदल दिया, जब इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलाया गया.

सामाजिक कार्यकर्ता मुख्तार अहमद का कहना है कि इन दिनों गांवों में हिंदू और मुस्लिम दोनों में नजदीकी आते चुनाव, बढ़ती हिंसा की घटनाएं और माहौल में सांप्रदायिक तनाव को पकने देने की रणनीति ही चर्चा के विषय बने हुए हैं. अलग—अलग स्थानों पर अल्पसंख्यकों में काफी डर देखा जा सकता है.

 

 


सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार बजरंग दल और वीएचपी जमीनी स्तर पर सक्रिय हो चुके हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे संत सम्मेलनो में उनकी भूमिका रहती है. एक कार्यकर्ता के अुनसार इस तरह के भाषणों में मुस्लिमों के प्रति द्वेष भरा रहता है. उनकी रणनीति बहुत साफ है. वे अलग—अलग जातियों और समुदायों में अनुयायी रखने वाले विभिन्न पंथों के संतों को एक ही मंच पर लाते हैं. सामाजिक और साथियों के दबाव के चलते ग्रामीण इनमें जाने से रुक नहीं पाते. यहां वे हिंदू एकता से अपनी बात शुरू करते हैं जो कि अंत में मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदायिक आक्षेप पर जाकर खत्म होता है. गांव—गांव यही पैटर्न साफ देखा जा सकता है. उन्होंने हाल में धानसुरा, देहगाम और दूसरे अन्य स्थानों पर इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए हैं.


एक और सामाजिक कार्यकर्ता दक्षिणी गुजरात के बारडोली में आयोजित एक और रैली का उदाहरण देते हैं जिसमें रामनवमी के मौके पर हिंदुवादी संगठनों ने पाकिस्तान और कश्मीर पर कविताओं की रिकॉर्डिंग को लगातार बजाया जिससे मुस्लिमों को उकसाया जा सके. याद रहे कि दक्षिण गुजरात ही कुछ वर्ष पहले वीएचपी के घर वापसी अभियान का थियेटर रहा था. एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि गौ रक्षा एक और मुद्दा है जिसको दलित और मुस्लिमों को ध्रुवीकृत करने और उनकी परस्पर अंतरनिर्भरता खत्म करने के लिए बार—बार उठाया जा रहा है.

सामुदायिक नेता और इस्लामिक रिलीफ समिति के पूर्व अध्यक्ष शकील अहमद के अनुसार, मैं यह तो नहीं कहूंगा कि लोगों में डर है, पर हां चिंता अवश्य है. क्योंकि ऐसी स्थिति में एक दिन ऐसा आ सकता है जबकि मुस्लिम अपने बचे रहने के लिए संघर्ष करें और ऐसे में मजबूर होकर प्रतिक्रिया में कुछ भी हो सकता है, जो कि अच्छा नहीं होगा.


बात सिर्फ इतनी है अब उनके हाथ में सत्ता की ताकत है और इसका इस्तेमाल वे अपना एजेंडे को आगे बढ़ाने में कर रहे हैं. मुख्य मुद्दा यह है कि इस स्थिति में हम क्या कर सकते हैं और कितना कुछ कर सकते हैं ऐसी स्थितियों का सामना करने के लिए. उनमें ऐसे धर्मनिरपेक्ष नेताओं के प्रति आलोचना का भाव है जो अवसरवाद दिखाते हुए अब हिंदुत्व संगठनों में शामिल हो रहे हैं.

हालिया ध्रुवीकरण के लिए मुख्य संदर्भ बिंदु मार्च के अंत में अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान पर आयोजित वीएचपी की रैली है, जिसमें इसके अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया ने गुजरात में सांप्रदायिक माहौल को फिर से हवा दे दी. इस आयोजन में जैसे तोगड़िया ने अपने एक दशक के अज्ञातवास से बाहर आकर मुस्लिमों के खिलाफ जमकर जहर उगला.


इस बीच आरएसएस के सहयोगी संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने हाल में एक शर्मनाक घटनाक्रम में रिलीफ रोड पर अपना कार्यालय खोला. रिपोर्ट के अनुसार अपने साइनबोर्ड पर संगठन ने भारत का जो नक्शा दिखाया उसमें से जम्मू—कश्मीर का बड़ा भाग गायब था. रिपोर्ट के अनुसार यह जम्मू—कश्मीर का उत्तरी हिस्सा था जो कि लाइन ऑफ कंट्रोल के दूसरी ओर आता है. इसके बाद उन्होंने तुरंत ही इस बोर्ड को बदल दिया, जब इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलाया गया.

सामाजिक कार्यकर्ता मुख्तार अहमद का कहना है कि इन दिनों गांवों में हिंदू और मुस्लिम दोनों में नजदीकी आते चुनाव, बढ़ती हिंसा की घटनाएं और माहौल में सांप्रदायिक तनाव को पकने देने की रणनीति ही चर्चा के विषय बने हुए हैं. अलग—अलग स्थानों पर अल्पसंख्यकों में काफी डर देखा जा सकता है.

 

 

First published: 11 April 2017, 10:33 IST
 
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