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उत्तराखंड: पांव पसारती बसपा बन सकती है किंगमेकर

आकाश बिष्ट | Updated on: 8 February 2017, 7:59 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

एक कहावत है दो कुत्तों की लड़ाई में अक्सर बंदर रोटी ले उड़ता है. उत्तराखंड में चुनाव में सिर्फ नौ दिन बचे हैं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा अभी भी अपने बागी उम्मीदवारों से निपटने का फार्मूला नहीं ढूंढ़ पा रही हैं. दोनों प्रमुख दल फिलहाल इसी उधेड़बुन में लगे हुए. दोनों दलों को यह डर सता रहा है कि ये बागी उम्मीदवार उनका सारा गणित न बिगाड़ दें. नई सदी के आरंभ में गठित हुए इस राज्य में ये दोनों ही दल बारी-बारी से शासन करते आए हैं. 

इस चुनाव में इन दलों को स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहे बागी उम्मीदवारों से कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार किसी दल की राज्य में कोई लहर नहीं है और सभी सीटों पर मुकाबला कड़ा है, इसकी मुख्य वजह ये बागी उम्मीदवार ही हैं.

दलबदलुओं का स्वागत

राज्य में दोनों ही दलों ने दलबदलुओं को टिकट दिया है. भाजपा ने जहां 13 पूर्व कांग्रेसियों को टिकट दी है वहीं कांग्रेस ने सात पूर्व भाजपा नेताओं और दो बसपा बागियों को टिकट दी है. बाहरी नेताओं को टिकट देना राज्य के जमीनी नेताओं को रास नहीं आया है और वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव में कूद गए हैं. राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से लगभग 50 सीटों पर बागी उम्मीदवार पर चुनाव लड़ रहे हैं.

प्रदेश की इन पार्टियों में बगावत के हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि भाजपा अपने 50 स्थानीय नेताओं को निलंबित कर चुकी है और कांग्रेस अपने 30 पदाधिकारियों को हटा चुकी है. इनमें से अधिकांश नेता निर्दलीय के रूप में पर्चा दाखिल कर चुके हैं, जिनसे पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवारों को खतरा पैदा हो गया है.

दोनों पार्टियों ने खुलेआम स्थानीय नेताओं की उपेक्षा कर बाहरी या दलबदलू नेताओं को टिकट दिया है और अब बागी उम्मीदवारों का सामना कर रहे हैं, इसका सटीक अनुमान इन तीन सीटों से लग सकता है. ये सीटें हैं कोटद्वार, यमकेश्वर और चौबट्टाखाल.

कोटद्वार से भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत को टिकट दिया है, जिनकी हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने में प्रमुख भूमिका रही थी. हरक सिंह को कांग्रेस के मौजूदा एमएलए सुरेंद्र सिंह नेगी से कड़ी चुनौती मिल रही है. नेगी ने 2012 के चुनाव में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रहे बीसी खंडूरी को हराया था. 

अनेक स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भाजपा के इस कदम से खफा हैं कि भाजपा ने पूर्व एमएलए शैलेंद्र सिंह रावत की जगह एक बाहरी नेता को टिकट दी है. भाजपा के इस कदम से नाराज शैलेंद्र सिंह ने तुरंत कांग्रेस का दामन थाम लिया जिसने उन्हें यमकेश्वर से टिकट दे दी. लेकिन कांग्रेस को इसके लिए अपने मौजूदा विधायक रेनू बिष्ट को नजरअंदाज करना भारी पड़ा. 

रेनू अब इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं. रोचक यह है कि भाजपा ने इस सीट से बीसी खंडूरी की पुत्री रितु भूषण खंडूरी को टिकट दी है, जिसके कारण यहां से पूर्व विधायक विजया बड़थ्वाल ने बगावत कर दी है. भाजपा ने हालांकि अब बड़थ्वाल को इस बात के लिए मना लिया है कि वे अपना नामांकन वापस ले लें.

चौबट्टाखाल में भाजपा की और से पूर्व कांग्रेसी नेता सतपाल महराज मैदान में हैं और उनका मुकाबला भाजपा के ही एक बागी उम्मीदवार कवींद्र इष्टवाल से है. टिकट नहीं मिलने से कवींद्र निर्दलीय उम्मीदवार के रूप से मैदान में हैं. भाजपा की राज्य इकाई के पूर्व अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने भी टिकट न मिलने से बगावत कर दी थी, पर उन्हें भाजपा पार्टी में राष्ट्रीय सचिव का पद देकर मनाने में सफल रही. लेकिन सतपाल महाराज को टिकट देने से स्थानीय कार्यकर्ता अब भी नाखुश हैं और वे उनके खिलाफ भी काम कर सकते हैं.

माया की भूमिका

ऐसी स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा अथवा मायावती की बसपा के किंग मेकर की भूमिका में उभरने से इंकार नहीं किया जा सकता. यहां तक कि राज्य के बसपा नेतृत्व को भी उम्मीद है कि भाजपा के पास सत्ता की चाबी आ सकती है. बसपा राज्य में 2002 से चुनाव लड़ रही है और उसने 68 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर 7 सीटें तथा 11.2 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. 

2007 में बसपा का वोट शेयर बढ़कर 11.76 हो गया था और उसने आठ सीटों पर कब्जा जमाया था. 2012 के चुनाव में जरूर बसपा को सिर्फ 3 सीटें मिलीं पर उसका वोट शेयर बढ़कर 12.28 प्रतिशत हो गया था. राज्य में कम से कम एक दर्जन ऐसी मुस्लिम बहुलता वाली सीटें हैं जहां मुकाबला सीधे बसपा और कांग्रेस के बीच है. इसलिए अगर बसपा को ठीक-ठाक सीटें मिल जाती हैं तो बसपा ही राज्य में तय करेगी कि सरकार किसकी होगी. 

अभी पिछले दिनों असफल राष्ट्रपति शासन लागू होने के दौरान रावत सरकार को बचाने में बसपा के समर्थन ने ही निर्णायक भूमिका निभाई थी. नाम न बताने की शर्त पर राज्य में बसपा के वरिष्ठ नेता ने बताया कि राज्य में शासन कोई भी करे, पर उसकी चाबी बसपा के पास ही होगी. इस बारे में सभी निर्णय सिर्फ बहनजी ही लेंगी, लेकिन हमें ऐसी कोई संभावना नहीं दिख रही है कि भाजपा और बसपा में कोई गठबंधन हो सकता है.

First published: 8 February 2017, 7:59 IST
 
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