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गोरखपुर से 15 किलोमीटर दूर आदिम युग में जी रहे 40,000 बंटानियां

अतुल चौरसिया | Updated on: 28 February 2017, 17:22 IST


गोरखपुर से महज 15-20 किलोमीटर दूर 23 गांवों में फैली करीब 40 हजार की आबादी पक्की सड़कों, बिजली, स्कूल और हॉस्पिटल से महरूम है. यहां बंटानियां जाति एक कुचक्र में फंस गई है.


गोरखपुर से महाराजगंज जाते समय एनएच-28 के दोनों तरफ अचानक से सागौन, जिसे स्थानीय भाषा में साखू भी कहा जाता है, का विराट घना जंगल दोनों तरफ से गुजरने लगता है. एक करीने से खड़े सागौन के पेड़ इस बात की गवाही देते हैं कि ये जंगल प्राकृतिक न होकर किसी व्यवस्थित दिशा-निर्देश के तहत खड़े हुए हैं. दूर-दूर तक जंगल ही जंगल.


इन जंगलों का इतिहास बेहद दिलचस्प है, और इसे लगाने वाली एक दलित जाति है जिन्हें स्थानीय लोग बंटानियां कहते हैं. बंटानियां शब्द का अपना छोटा सा इतिहास है. ब्रिटिश काल में बर्मा में सरकार जंगलों को लगाने की एक विधि का इस्तेमाल करती थी जिसे टोइयां कहते थे.

1920 के आस पास जब गोरखपुर में रेलवे पहुंची तो उसे पटरियों के स्लीपर के लिए बड़े पमाने पर लकड़ी की जरूरत पड़ी. तब अंग्रेजों ने कुछ स्थानीय आदिवासियों से बर्मा की तर्ज पर ही गोरखपुर-महाराजगंज के बीच भी जंगल लगाने का काम सौंपा. जंगल यानी वन और वन लगाने की विधि यानी टोइयां, दोनों मिलकर बंटानियां बन गए. और इस जाति को ही लोग बंटानियां बुलाने लगे.

 

ब्रिटिश राज से बेगाने

 

बंटानियां इन्हीं जंगलों पर निर्भर रहे. वे जंगल लगाते थे बदले में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें एक नियत मात्रा में खेती की जमीन इस्तेमाल करने की छूट दे रखी थी. जंगलों के बीच उनकी छोटी-छोटी बस्तियां हैं. अंग्रेज चले गए लेकिन बंटानियां इस इलाके में काम के नाम पर खेती करते और सीजन में (अमूमन बारिश का मौसम) जंगल लगाते रहे.


आज गोरखपुर और महाराजगंज के बीच करीब 55,000 एकड़ में बंटानियां समुदाय की चार-पांच पीढ़ियों द्वारा लगाए गए जंगल खड़े हैं. इस समय बंटानियां जाति के कुल 23 गांव इन्हीं जंगलों के बीच फैले हुए हैं. पांच गांव गोरखपुर क्षेत्र में आते हैं जबकि 18 गांव महाराजगंज जिले में आते हैं. इनकी कुल आबादी 40,000 के आसपास है. 21,000 हजार के करीब वोटर हैं.

 

बंटानियां की त्रासदी


अंग्रेज चले गए, देश में शासन बदल गया लेकिन बंटानियां जंगल लगाने के काम में लगे रहे. 1980 का दशक आते-आते देश में परिस्थितियां बदलने लगीं. देश में वन विभाग की ताकत बढ़ गई. कानून बनाकर वनों पर सरकार ने अधिकार कर लिया. वनों पर निर्भर तमाम समाजों की तरह ही बंटानियां भी जंगलों के लिए खतरा घोषित हो गए.


वो बंटानियां जो सिर्फ जंगलों को लगाने का काम करते थे, उन्हें जंगल के लिए खतरा मान लिया गया. उन्हें जंगलों से जलावन की लकड़ी, या किसी भी तरह की उपज लेने से रोक दिया गया. वे सिर्फ अपनी जमीनों पर खेती कर सकते थे, बाकी किसी भी गतिविधि को अपराध की श्रेणी में रख दिया गया.


एनएच 28 से सटी बंटानियां बस्ती रजई काले के रहने वाले चौधरी देवी प्रसाद बताते हैं, 'इतना बड़ा जंगल हमारे बाप-दादों ने लगाया और अब हमे वन विभाग यहां से एक दातून तक नहीं तोड़ने देता. वन विभाग वनों का विकास करने के लिए बना था, लेकिन जब से हमें वनों से बेदखल किया गया है, एक एकड़ भी अतरिक्त वन इस इलाके में नहीं लगाया है इन लोगों ने. सब हमी लोगों द्वारा लगाया गया.'


बंटानियां की दूसरी त्रासदी यह रही कि उनकी बस्तियां या गांव जंगलों के बीच थी. उन्हें आज तक सरकार ने नॉन रेवेन्यु गांव घोषित कर रखा है. नॉन रेवेन्यु गांव होने के कारण इनकी बस्तियों में किसी भी तरह की सरकारी योजना पहुंच ही नहीं पाती है.

1995 में पहली बार बंटानियां को विधानसभा और लोकसभा में वोट देने का अधिकार मिला. पंचायत में वोट देने का अधिकार इन्हें सिर्फ दो साल पहले 2015 में दिया गया. वोटिंग का अधिकार मिलने के बाद यह उम्मीद बनी कि अब इनके गांवों को बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी. पर ऐसा नहीं हुआ.


इनके गांव जंगलों के बीच में हैं. और वहां तक किसी भी सरकारी योजना को लागू करने की राह में वन विभाग अटक जाता है. वह वनों के भीतर किसी भी तरह का निर्माण या सुविधा देने के खिलाफ खड़ा हो जाता है. इस अड़चन की आड़ में नेता भी आते हैं और वन विभाग का रोना रोकर चले जाते हैं.


देवी लाल बताते हैं, 'दो बार योगीजी (आदित्यनाथ) आकर कह चुके हैं कि अबकी जीतेंगे तो बंटानियां का उद्धार कर देंगे, पर कुछ नहीं हुआ. आप देखिए, हमारे घर से सौ मीटर की दूरी से बिजली का तार जा रहा है लेकिन हम अपने गांव में बिजली का इस्तेमाल नहीं कर सकते.' यह पूछने पर कि इस चुनाव में कोई नेता आया था, देवी लाल कहते हैं, 'सपा के एक नेता आए थे, पर इस बारे में उन्होंने कोई बात नहीं की.'

 

उपेक्षा की वजह लापरवाही


क्या नेता और स्थानीय जनप्रतिनिधि इतने असहाय हैं. ऐसा नहीं है. साल 2006 में बने वनाधिकार कानून के तहत वनों पर आश्रित समुदायों के लिए तमाम रियायतें दी गई हैं. लेकिन यहां पर ज्यादातर जन प्रतिनिधियों को या तो इन प्रावधानों की जानकारी नहीं है या फिर वे जानबूझकर इस सवाल को टाल देते हैं. मसलन देश के अलग-अलग हिस्सों में वनाधिकार कानून का बहुत सकारात्मक इस्तेमाल और असर देखा गया है.


गोरखपुर के स्थानीय संस्कृतिकर्मी और प्रतिरोध का सिनेमा के संचालक मनोज सिंह कहते हैं, 'बंटानियां गावों में बिजली, पानी, सड़क जैसी चीजें बहुत आसानी से पहुंच सकती है. योगी आदित्यनाथ खुद वन विभाग के साथ इसकी पहल कर सकते हैं. एक बैठक में इसका निपटारा हो जाएगा. पर हर नेता इस मुद्दे को सिर्फ टालता जा रहा है. यह 2017 के गोरखपुर का एक सच है.'


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में गांव-गांव बिजली पहुंचाने का दावा करते हैं. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार-बार उत्तर प्रदेश में 24 घंटे बिजली आपूर्ति की बात करते हैं. लेकिन 23 गांव में रहने वाली 40,000 हजार की आबादी हर बुनियादी सुविधा से महरूम है. यह सच पूर्वोत्तर या बस्तर के दूरदराज के जंगलों का नहीं है, प्रधानमंत्री के खास योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र में है, गोरखपुर से महज 15-20 किलोमीटर दूर.

 

First published: 28 February 2017, 9:30 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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